उझ परियोजना को प्राथमिकता से पूरा करने का प्रस्ताव, हरपाल चीमा ने जनकल्याणकारी योजनाएं जारी रखने की बात कही; मिड-डे मील और राणा गुरजीत के राजनीतिक बयान भी चर्चा में रहे
चंडीगढ़। पंजाब विधानसभा के विशेष सत्र के अंतिम दिन मंगलवार को राज्य के जल अधिकारों, पड़ोसी राज्यों को दिए जा रहे पानी के भुगतान और जनकल्याणकारी योजनाओं को लेकर कई महत्वपूर्ण प्रस्ताव पेश किए गए। सिंचाई मंत्री बरिंदर कुमार गोयल ने राजस्थान को दिए जा रहे पानी की कीमत पंजाब को दिलाने, पाकिस्तान की ओर जा रहे पानी का अधिकतम उपयोग सुनिश्चित करने के लिए उझ बहुउद्देशीय परियोजना को प्राथमिकता के आधार पर पूरा करने और यमुना नदी के पानी पर पंजाब के दावे को लेकर केंद्र सरकार से हस्तक्षेप की मांग की। उन्होंने स्पष्ट किया कि पंजाब खुद जल संकट का सामना कर रहा है, ऐसे में राज्य के जल संसाधनों के उपयोग और उनके बदले मिलने वाले आर्थिक लाभ के सवाल को गंभीरता से उठाया जाना चाहिए।
सदन में पेश प्रस्तावों में पंजाब के पानी पर राज्य के अधिकारों और उपलब्ध जल संसाधनों के बेहतर इस्तेमाल पर जोर दिया गया। सरकार ने राजस्थान को पानी की आपूर्ति के बदले भुगतान सुनिश्चित करने की मांग उठाई, जबकि यमुना के पानी के मामले में कानूनी विकल्प अपनाने की बात भी कही। इसके साथ ही वित्त मंत्री हरपाल सिंह चीमा ने महिलाओं, किसानों, मरीजों और अन्य वर्गों के लिए चल रही योजनाओं को जारी रखने तथा इनके लिए बजट में प्रावधान करने का प्रस्ताव पेश किया। विशेष सत्र के अंतिम दिन जल विवादों के अलावा शिक्षा, राजनीतिक बयानबाजी और सरकारी योजनाओं से जुड़े मुद्दे भी चर्चा में रहे।
राजस्थान से पानी की कीमत वसूलने की मांग
सिंचाई मंत्री बरिंदर कुमार गोयल ने सदन में कहा कि पंजाब का पानी लंबे समय से राजस्थान को दिया जा रहा है, लेकिन इसके बदले राज्य को पर्याप्त आर्थिक लाभ नहीं मिल रहा। उन्होंने तर्क दिया कि सतलुज, रावी और ब्यास नदियां राजस्थान से होकर नहीं गुजरतीं, इसलिए राजस्थान इन नदियों के संदर्भ में रिपेरियन राज्य नहीं है। इसके बावजूद पंजाब के जल संसाधनों का उपयोग राजस्थान में किया जा रहा है।
गोयल ने कहा कि पंजाब खुद गंभीर जल संकट से जूझ रहा है। भूजल स्तर में गिरावट और कृषि क्षेत्र की पानी संबंधी जरूरतों के बीच राज्य के जल संसाधनों का उचित प्रबंधन जरूरी है। ऐसे में पंजाब से दूसरे क्षेत्रों को दिए जा रहे पानी के बदले भुगतान का मुद्दा महत्वपूर्ण हो जाता है।
प्रस्ताव में मांग की गई कि राजस्थान सरकार पंजाब को दिए जाने वाले पानी की कीमत अदा करे। इसके साथ ही केंद्र सरकार से यह सुनिश्चित करने का आग्रह किया गया कि भविष्य में राजस्थान को आपूर्ति किए जाने वाले पानी का भुगतान हर साल पंजाब को मिले।
सरकार का तर्क है कि यदि पंजाब के जल संसाधनों का इस्तेमाल दूसरे राज्यों में किया जा रहा है, तो इसके आर्थिक पहलू पर भी विचार किया जाना चाहिए। हालांकि, पानी के बंटवारे और भुगतान से संबंधित व्यवस्था का अंतिम निर्धारण मौजूदा समझौतों, कानूनी प्रावधानों और संबंधित पक्षों के बीच निर्णयों के अनुसार होगा।
पाकिस्तान जा रहे पानी को रोकने के लिए उझ परियोजना पर जोर
सदन में रावी नदी के रास्ते पाकिस्तान की ओर जा रहे पानी का अधिकतम उपयोग सुनिश्चित करने के लिए उझ बहुउद्देशीय परियोजना को प्राथमिकता के आधार पर पूरा करने की मांग भी उठाई गई। सिंचाई मंत्री ने कहा कि जम्मू-कश्मीर से निकलने वाली उझ, तरनाह और बसंतर नदियों का पानी माधोपुर हेडवर्क्स के नीचे रावी नदी में मिलता है। पंजाब के पास इस पानी को पर्याप्त मात्रा में संग्रहित करने के लिए आवश्यक ढांचा उपलब्ध नहीं है।
गोयल ने कहा कि यदि उझ बहुउद्देशीय परियोजना को समयबद्ध तरीके से पूरा किया जाता है, तो पानी के भंडारण और उसके बेहतर इस्तेमाल की संभावनाएं बढ़ सकती हैं। प्रस्ताव में केंद्र सरकार से आग्रह किया गया कि इस परियोजना को प्राथमिकता दी जाए, ताकि उपलब्ध पानी को रणजीत सागर बांध की ओर मोड़ने और पंजाब में सिंचाई सहित अन्य जरूरतों के लिए इस्तेमाल करने की व्यवस्था विकसित की जा सके।
पंजाब के लिए यह मुद्दा इसलिए महत्वपूर्ण है, क्योंकि कृषि क्षेत्र में पानी की मांग लगातार बनी हुई है। राज्य के कई हिस्सों में भूजल पर निर्भरता और जल स्तर में गिरावट चिंता का विषय हैं। ऐसे में नदियों से उपलब्ध पानी का अधिकतम उपयोग करने के लिए भंडारण, वितरण और सिंचाई से जुड़ा बुनियादी ढांचा विकसित करना आवश्यक माना जाता है।
हालांकि, उझ परियोजना के निर्माण, पानी के प्रवाह को मोड़ने और उसके इस्तेमाल से जुड़े तकनीकी तथा अंतरराज्यीय पहलुओं पर संबंधित एजेंसियों के स्तर पर निर्णय लेना होगा। परियोजना को प्राथमिकता देने की मांग के साथ सरकार ने केंद्र से इस दिशा में तेजी से कदम उठाने का आग्रह किया है।
यमुना के पानी पर अधिकार के लिए ट्रिब्यूनल गठित करने की मांग
पंजाब सरकार ने यमुना नदी के पानी पर अपने दावे को लेकर भी केंद्र सरकार से हस्तक्षेप की मांग की। बरिंदर कुमार गोयल ने कहा कि पंजाब का यमुना के पानी पर ऐतिहासिक और कानूनी अधिकार है। उन्होंने वर्ष 1966 में पंजाब के पुनर्गठन से पहले की स्थिति का उल्लेख करते हुए कहा कि उस समय यमुना अविभाजित पंजाब में बहती थी।
सदन में पेश प्रस्ताव के माध्यम से केंद्र सरकार के जल शक्ति मंत्रालय से आग्रह किया गया कि 25 अप्रैल 2025 को पंजाब की ओर से दायर शिकायत पर जल्द निर्णय लिया जाए। इसके साथ ही पानी के विवाद के समाधान के लिए वाटर डिस्प्यूट ट्रिब्यूनल गठित करने की मांग भी रखी गई।
गोयल ने कहा कि यदि केंद्र सरकार इस मामले में कोई निर्णय नहीं लेती, तो पंजाब सरकार को अपने अधिकारों की रक्षा के लिए तुरंत सुप्रीम कोर्ट का रुख करना चाहिए। इस प्रस्ताव के जरिए सरकार ने संकेत दिया कि यमुना के पानी से संबंधित दावे को आगे बढ़ाने के लिए कानूनी विकल्प अपनाने पर भी विचार किया जा रहा है।
पानी के बंटवारे से जुड़े विवादों में संबंधित राज्यों के दावों, ऐतिहासिक व्यवस्थाओं और लागू कानूनी प्रावधानों की अहम भूमिका होती है। ऐसे में पंजाब की मांग पर आगे क्या निर्णय लिया जाता है, यह केंद्र सरकार की कार्रवाई और जरूरत पड़ने पर न्यायिक प्रक्रिया पर निर्भर करेगा।
जनकल्याणकारी योजनाएं जारी रखने का प्रस्ताव
विशेष सत्र के अंतिम दिन वित्त मंत्री हरपाल सिंह चीमा ने राज्य में चल रही प्रमुख जनकल्याणकारी योजनाओं को जारी रखने का प्रस्ताव पेश किया। इसमें मुख्यमंत्री माताएं-धीयां योजना, हर महीने 300 यूनिट मुफ्त बिजली, खेतीबाड़ी के लिए मुफ्त बिजली, मुख्यमंत्री सेहत योजना, आम आदमी क्लीनिक, महिलाओं के लिए मुफ्त बस सेवा, तीर्थ यात्रा योजना और डेयरी क्षेत्र से जुड़ी वित्तीय योजनाओं को जारी रखने की बात कही गई।
प्रस्ताव में इन योजनाओं के लिए पंजाब के बजट में आवश्यक वित्तीय प्रावधान रखने पर जोर दिया गया। सरकार का पक्ष है कि विभिन्न वर्गों को राहत देने वाली योजनाओं को आगे भी जारी रखा जाना चाहिए, ताकि महिलाओं, किसानों, मरीजों और अन्य लाभार्थियों को उनका लाभ मिलता रहे।
मुफ्त बिजली की व्यवस्था घरेलू उपभोक्ताओं और कृषि क्षेत्र से जुड़ी है, जबकि मुख्यमंत्री सेहत योजना तथा आम आदमी क्लीनिक का उद्देश्य स्वास्थ्य सेवाओं तक लोगों की पहुंच बढ़ाना है। महिलाओं के लिए मुफ्त बस सेवा और तीर्थ यात्रा योजना भी सरकार की जनकल्याणकारी पहलों में शामिल हैं। डेयरी क्षेत्र से जुड़ी योजनाओं के माध्यम से संबंधित कारोबार और लाभार्थियों को वित्तीय सहायता देने का प्रावधान है।
हरपाल सिंह चीमा ने इन योजनाओं को जारी रखने के लिए बजट में प्रावधान की जरूरत पर बल दिया। प्रस्ताव में कांग्रेस, भाजपा और शिरोमणि अकाली दल की ओर से की गई टिप्पणियों की निंदा भी की गई। इससे सदन में जनकल्याणकारी योजनाओं को लेकर सरकार और विपक्ष के बीच राजनीतिक मतभेद भी सामने आए।
राणा गुरजीत के बयान से राजनीतिक चर्चाओं को हवा
विधानसभा सत्र के दौरान कांग्रेस विधायक राणा गुरजीत सिंह का बयान भी चर्चा में रहा। भाजपा या शिरोमणि अकाली दल में शामिल होने की अटकलों को लेकर पूछे गए सवाल पर उन्होंने व्यंग्यात्मक अंदाज में कहा, “एक बात तो मानते हो कि मित्रां दा न चलदा है।”
मीडिया ने उनसे पूछा था कि उनके भाजपा या अकाली दल में जाने की चर्चाएं क्या वह खुद चलवाते हैं या इसके पीछे कोई और है। इस पर राणा गुरजीत सिंह ने भाजपा के वरिष्ठ नेता से मुलाकात के सवाल पर पलटकर पूछा, “भाजपा का सीनियर लीडर है कौन?”
उन्होंने अपने बेटे का उल्लेख करते हुए कहा कि वह स्वतंत्र है, लेकिन उसकी सोच कांग्रेस वाली है। उन्होंने यह भी कहा कि किसी को गलतफहमी में नहीं रहना चाहिए। राणा गुरजीत सिंह ने तंज कसते हुए यह टिप्पणी भी की कि उनके अपने कांग्रेस के लोगों को भी खुशी हुई है कि वह जा रहे हैं।
उनके बयान के बाद पार्टी बदलने की चर्चाओं को लेकर राजनीतिक गलियारों में अटकलों का दौर जारी रहने की संभावना है। हालांकि, उनके इस बयान से किसी दूसरी पार्टी में शामिल होने की पुष्टि नहीं होती। फिलहाल उन्होंने अपने अंदाज में सवालों का जवाब देकर इस मुद्दे को चर्चा में बनाए रखा।
नर्सरी और एलकेजी के बच्चों को मिड-डे मील नहीं मिलने का मुद्दा
सदन में आम आदमी पार्टी के विधायक कुलवंत सिंह ने नर्सरी और एलकेजी में पढ़ने वाले विद्यार्थियों को मिड-डे मील नहीं मिलने का मुद्दा उठाया। उन्होंने कहा कि मिड-डे मील की व्यवस्था यूकेजी से आठवीं कक्षा तक के विद्यार्थियों के लिए है, जबकि नर्सरी और एलकेजी के बच्चे भी उन्हीं स्कूलों में पढ़ते हैं।
उन्होंने इस स्थिति की ओर ध्यान दिलाते हुए कहा कि भोजन के समय संबंधित कक्षाओं के बच्चों को अलग व्यवस्था का सामना करना पड़ता है। लंच के दौरान दो कक्षाओं की छुट्टी हो जाती है और बाकी विद्यार्थियों को भोजन के लिए बुलाया जाता है। ऐसे में छोटे बच्चों को भोजन की सुविधा से बाहर रखने का सवाल उठता है।
इस पर संबंधित मंत्री ने बताया कि प्री-प्राइमरी वन और प्री-प्राइमरी टू की व्यवस्था की गई है, लेकिन केंद्र सरकार की ओर से नियमों में बदलाव के कारण परेशानी आ रही है। उन्होंने कहा कि पहले केंद्र सरकार अपना हिस्सा देती थी और इसके बाद राज्य सरकार भुगतान करती थी। अब व्यवस्था से जुड़ी दिक्कतों के कारण इस मामले में कठिनाई आ रही है।
मंत्री ने स्पष्ट किया कि सरकार की कोशिश है कि सभी बच्चों को भोजन उपलब्ध कराया जाए। इस मुद्दे ने सरकारी स्कूलों में प्री-प्राइमरी स्तर के विद्यार्थियों के पोषण और भोजन संबंधी सुविधाओं पर ध्यान केंद्रित किया। छोटे बच्चों के लिए भोजन की उपलब्धता उनके पोषण और स्कूल में नियमित उपस्थिति के लिहाज से महत्वपूर्ण मानी जाती है।
विशेष सत्र के अंतिम दिन पानी और जनकल्याण पर रहा जोर
पंजाब विधानसभा के विशेष सत्र के अंतिम दिन राज्य के जल अधिकारों और जनकल्याणकारी योजनाओं को लेकर सरकार ने अपना पक्ष रखा। राजस्थान को पानी की कीमत दिलाने, उझ बहुउद्देशीय परियोजना को प्राथमिकता देने और यमुना के पानी पर दावे के लिए केंद्र से कार्रवाई की मांग प्रमुख रही।
इसके साथ ही हरपाल सिंह चीमा ने विभिन्न कल्याणकारी योजनाओं को जारी रखने और उनके लिए बजट में प्रावधान करने का प्रस्ताव पेश किया। सदन में मिड-डे मील की व्यवस्था पर भी सवाल उठे, जबकि राणा गुरजीत सिंह के बयान ने राजनीतिक चर्चाओं को गर्म रखा।
पानी के मुद्दे पर सरकार की अगली रणनीति केंद्र के रुख, संबंधित राज्यों के साथ व्यवस्थाओं और कानूनी प्रक्रिया पर निर्भर करेगी। वहीं, जनकल्याणकारी योजनाओं के लिए बजट में प्रावधान और प्री-प्राइमरी विद्यार्थियों को भोजन उपलब्ध कराने के सवाल पर आगे की कार्रवाई महत्वपूर्ण होगी।




