हरियाणा के 12 हजार अतिथि अध्यापकों को झटका, नियमितीकरण का दावा खारिज

हरियाणा के 12 हजार अतिथि अध्यापकों को झटका, नियमितीकरण का दावा खारिज

21 साल की सेवा के बावजूद नहीं मिलेगा नियमित शिक्षक का दर्जा, शिक्षा विभाग ने कानूनी प्रावधानों का हवाला देकर जारी किया स्पीकिंग ऑर्डर; अब हाईकोर्ट में चुनौती देने का विकल्प

हरियाणा में लंबे समय से नियमितीकरण की मांग कर रहे करीब 12 हजार अतिथि अध्यापकों को प्रदेश सरकार के फैसले से बड़ा झटका लगा है। लगभग 21 साल से सरकारी स्कूलों में सेवाएं दे रहे इन शिक्षकों को उम्मीद थी कि लंबी सेवा अवधि और अदालतों के निर्देशों के बाद उन्हें नियमित शिक्षक का दर्जा मिल सकेगा। हालांकि, स्कूल शिक्षा विभाग ने उनके नियमितीकरण के दावे को खारिज कर दिया है। विभाग ने अपने निर्णय के समर्थन में नियुक्ति प्रक्रिया, नियमितीकरण नीतियों की निर्धारित शर्तों और विभिन्न न्यायिक फैसलों का हवाला दिया है।

शिक्षा विभाग की ओर से जारी स्पीकिंग ऑर्डर में स्पष्ट किया गया है कि अतिथि अध्यापकों की नियुक्तियां नियमित भर्ती के निर्धारित मानकों के अनुरूप नहीं हुई थीं। ऐसे में उन्हें वर्ष 2014 में जारी नियमितीकरण नीतियों का लाभ देना संभव नहीं है। सरकार का तर्क है कि लंबे समय तक सेवा देना अपने आप में नियमितीकरण का अधिकार पैदा नहीं करता। इसके लिए संबंधित नीति में निर्धारित सभी पात्रता शर्तों को पूरा करना आवश्यक है।

सरकार के इस फैसले से अतिथि अध्यापकों और शिक्षा विभाग के बीच लंबे समय से चल रहा विवाद एक बार फिर तेज होने की आशंका है। नियमितीकरण की मांग को लेकर आंदोलन कर रहे शिक्षकों के सामने अब कानूनी लड़ाई का विकल्प प्रमुख हो गया है। यदि अतिथि अध्यापक इस आदेश को पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट में चुनौती देते हैं, तो विभाग की ओर से दिए गए तर्कों और संबंधित कानूनों की न्यायिक समीक्षा हो सकती है।

हाईकोर्ट के निर्देशों के बाद जारी हुआ आदेश

शिक्षा विभाग ने यह आदेश सुखविंदर सिंह बनाम हरियाणा राज्य मामले में पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट के निर्देशों के अनुपालन में जारी किया है। इस मामले में हाईकोर्ट की एकल पीठ ने 25 मई 2026 को संबंधित याचिकाकर्ताओं के नियमितीकरण के दावे पर विचार करने के निर्देश दिए थे। इसके बाद राज्य सरकार ने इस मामले में अपील की।

छह अगस्त 2026 को हाईकोर्ट की खंडपीठ ने मामले में व्यवस्था दी कि नियमितीकरण के दावे का निपटारा उपलब्ध तथ्यों और कानून के स्थापित सिद्धांतों के आधार पर किया जाए। अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि यदि संबंधित कर्मचारी नियमितीकरण नीति के तहत पात्र पाए जाते हैं, तो उन्हें नियमानुसार लाभ दिया जाए। वहीं, यदि उनका दावा नीति की शर्तों के अनुरूप नहीं बनता है, तो सरकार उचित कारणों का उल्लेख करते हुए स्पीकिंग ऑर्डर जारी कर सकती है।

स्पीकिंग ऑर्डर ऐसा आदेश होता है, जिसमें संबंधित अधिकारी को अपने निर्णय के पीछे के कारणों और कानूनी आधारों को स्पष्ट करना होता है। शिक्षा विभाग ने इसी प्रक्रिया के तहत अतिथि अध्यापकों के दावे पर विचार किया और नियमितीकरण से इनकार कर दिया।

सरकार का कहना है कि उसने अदालत के निर्देशों का पालन करते हुए उपलब्ध तथ्यों, नियुक्तियों की प्रकृति और संबंधित नीतियों का परीक्षण किया है। विभाग के अनुसार, नियमितीकरण के लिए केवल सेवा अवधि को आधार नहीं बनाया जा सकता, बल्कि नियुक्ति के समय अपनाई गई प्रक्रिया और निर्धारित पात्रता शर्तों को भी देखना जरूरी है।

वर्ष 2005 से शुरू हुई व्यवस्था को नियमित भर्ती नहीं मानता विभाग

अतिथि अध्यापकों के नियमितीकरण की राह में शिक्षा विभाग ने उनकी नियुक्ति प्रक्रिया को सबसे बड़ी बाधा बताया है। विभाग के अनुसार, वर्ष 2005 से सरकारी स्कूलों में शिक्षकों की कमी को दूर करने के लिए अतिथि अध्यापकों की सेवाएं ली जाने लगी थीं। उस समय स्कूलों में शिक्षकों की उपलब्धता सुनिश्चित करने के लिए स्थानीय जरूरत के आधार पर उन्हें प्रति पीरियड भुगतान की व्यवस्था के तहत लगाया गया था।

विभाग का तर्क है कि इन नियुक्तियों का उद्देश्य स्कूलों में तत्काल शिक्षण व्यवस्था बनाए रखना था। संबंधित स्कूलों के प्राचार्यों, मुख्याध्यापकों और अन्य अधिकारियों ने अपनी जरूरत के अनुसार अतिथि अध्यापकों की सेवाएं ली थीं। यह प्रक्रिया नियमित शिक्षकों की भर्ती से अलग थी।

नियमित भर्ती में आम तौर पर निर्धारित चयन प्रक्रिया, केंद्रीकृत चयन व्यवस्था, परीक्षा या निर्धारित मानकों के आधार पर मेरिट तैयार करने और आरक्षण संबंधी नियमों का पालन किया जाता है। इसके विपरीत, विभाग के अनुसार, अतिथि अध्यापकों की नियुक्तियों में इन सभी प्रक्रियाओं का उसी तरह पालन नहीं हुआ था।

इसी आधार पर सरकार ने कहा है कि इन नियुक्तियों को नियमित भर्ती के समान नहीं माना जा सकता। विभाग का मानना है कि नियुक्ति की प्रकृति में अंतर होने के कारण अतिथि अध्यापकों को नियमित कर्मचारियों के बराबर मानकर नियमितीकरण का लाभ देना कानूनी रूप से उचित नहीं होगा।

2014 की नीतियों में निर्धारित शर्तें बनीं बाधा

सरकार ने अपने आदेश में 16 और 18 जून 2014 को जारी नियमितीकरण नीतियों का भी उल्लेख किया है। विभाग के अनुसार, इन नीतियों के तहत नियमितीकरण का लाभ पाने के लिए कर्मचारियों को निर्धारित अवधि तक सेवा देने के साथ-साथ अन्य जरूरी शर्तें भी पूरी करनी होती हैं।

इन शर्तों में निर्धारित सेवा अवधि, आवश्यक शैक्षणिक योग्यता, स्वीकृत रिक्त पद और नीति के तहत निर्धारित अन्य पात्रता मानक शामिल हैं। सरकार का कहना है कि किसी कर्मचारी की लंबी सेवा अवधि उसे इन शर्तों से स्वतः छूट नहीं दिला सकती।

विभाग के अनुसार, नियमितीकरण नीति का लाभ केवल उन्हीं कर्मचारियों को दिया जा सकता है, जो उसके दायरे में आते हों। यदि किसी कर्मचारी की नियुक्ति निर्धारित प्रक्रिया से अलग तरीके से हुई है या वह नीति की अन्य जरूरी शर्तों को पूरा नहीं करता, तो केवल लंबे समय से काम करने के आधार पर उसे नियमित नहीं किया जा सकता।

सरकार ने यह भी स्पष्ट किया है कि वर्ष 2014 की नीतियों के अस्तित्व और उनकी वैधता का अर्थ यह नहीं है कि उनके तहत तय की गई पात्रता शर्तें समाप्त हो जाती हैं। विभाग के अनुसार, किसी नीति का लाभ लेने के लिए उसमें निर्धारित मानकों का पालन करना अनिवार्य है।

सुप्रीम कोर्ट के फैसलों का दिया हवाला

शिक्षा विभाग ने अपने निर्णय में सुप्रीम कोर्ट के विभिन्न फैसलों का भी सहारा लिया है। इनमें उमा देवी मामले में दिया गया निर्णय प्रमुख है। इस फैसले में सार्वजनिक रोजगार में नियमित नियुक्तियों, अस्थायी नियुक्तियों और नियमितीकरण से जुड़े सिद्धांतों को स्पष्ट किया गया था।

सरकार ने इसी कानूनी दृष्टिकोण के आधार पर कहा है कि लंबे समय तक सेवा देने मात्र से किसी कर्मचारी को नियमित नियुक्ति का अधिकार नहीं मिल जाता। सार्वजनिक पदों पर नियुक्ति निर्धारित नियमों और प्रक्रियाओं के अनुरूप होनी चाहिए।

विभाग ने मदन सिंह मामले में सुप्रीम कोर्ट के फैसले का भी उल्लेख किया है। सरकार के अनुसार, वर्ष 2014 की नियमितीकरण नीतियों की वैधता को स्वीकार किए जाने का यह अर्थ नहीं निकाला जा सकता कि उन नीतियों के तहत तय पात्रता की शर्तों को नजरअंदाज कर दिया जाए।

इस प्रकार सरकार ने नियमितीकरण के दावे का परीक्षण करते समय सेवा अवधि के साथ नियुक्ति प्रक्रिया और नीति की पात्रता को भी महत्वपूर्ण माना है। विभाग का कहना है कि कानूनी प्रावधानों के विपरीत जाकर किसी वर्ग को नियमितीकरण का लाभ नहीं दिया जा सकता।

2019 के कानून से सेवा सुरक्षा, नियमित दर्जा नहीं

हरियाणा अतिथि अध्यापक सेवा अधिनियम, 2019 भी शिक्षा विभाग के निर्णय का एक प्रमुख आधार है। अतिथि अध्यापकों को उम्मीद थी कि इस कानून के माध्यम से उनकी सेवाओं को मिली सुरक्षा नियमितीकरण की मांग को मजबूत करेगी। हालांकि, विभाग ने इस कानून की व्याख्या अलग तरीके से की है।

सरकार के अनुसार, वर्ष 2019 के कानून का उद्देश्य अतिथि अध्यापकों की सेवा निरंतरता और उनके कार्यकाल को सुरक्षा प्रदान करना है। इसका अर्थ यह नहीं है कि उन्हें नियमित शिक्षक का दर्जा, नियमित कर्मचारियों के समान वेतनमान या नियमित नियुक्ति से जुड़े सभी लाभ स्वतः मिल जाएंगे।

विभाग ने सेवा सुरक्षा और नियमितीकरण को दो अलग-अलग विषय माना है। उसके अनुसार, किसी कर्मचारी को सेवा में बने रहने की सुरक्षा मिलना और उसे नियमित कर्मचारी का दर्जा दिया जाना कानूनी रूप से अलग-अलग स्थितियां हैं। नियमितीकरण के लिए संबंधित नियमों और नीतियों के तहत निर्धारित पात्रता पूरी करना जरूरी है।

आदेश में अनुभव के आधार पर नियमितीकरण से संबंधित जग्गो बनाम भारत संघ मामले का भी उल्लेख किया गया है। हालांकि, विभाग ने इस फैसले को अतिथि अध्यापकों के पक्ष में स्वतः लागू मानने से इनकार किया है। सरकार का तर्क है कि किसी अन्य मामले में दिए गए फैसले का लाभ तभी दिया जा सकता है, जब संबंधित तथ्यों और कानूनी परिस्थितियों में समानता हो तथा लागू नियम इसकी अनुमति देते हों।

लंबे आंदोलन के बावजूद मांग पूरी नहीं

अतिथि अध्यापक पिछले कई वर्षों से नियमितीकरण की मांग उठाते रहे हैं। उनका कहना है कि वे लंबे समय से सरकारी स्कूलों में विद्यार्थियों को पढ़ा रहे हैं और शिक्षा व्यवस्था में महत्वपूर्ण योगदान दे रहे हैं। करीब 21 साल की सेवा के बाद भी नियमित शिक्षक का दर्जा नहीं मिलना उनके लिए निराशाजनक है।

अतिथि अध्यापकों की मांग का प्रमुख आधार उनकी लंबी सेवा अवधि, स्कूलों में उनकी जरूरत और सेवा में निरंतरता रहा है। उनका मानना है कि इतने लंबे समय तक काम लेने के बाद उनके भविष्य और रोजगार को लेकर स्थायी समाधान निकाला जाना चाहिए।

दूसरी ओर, सरकार ने अपने आदेश में सेवा की अवधि के बजाय नियुक्ति प्रक्रिया और लागू नीतियों की शर्तों को निर्णायक माना है। यही दोनों पक्षों के बीच विवाद का मुख्य बिंदु बन गया है। जहां अतिथि अध्यापक लंबे अनुभव को अपने दावे का आधार मान रहे हैं, वहीं विभाग नियमित भर्ती के नियमों और कानूनी पात्रता पर जोर दे रहा है।

आंदोलन में गुटबाजी से चुनौती और बढ़ी

नियमितीकरण के मुद्दे पर अतिथि अध्यापकों के बीच भी अलग-अलग रणनीतियां सामने आती रही हैं। एक गुट मांगों को लेकर उग्र प्रदर्शन और दबाव की राजनीति के पक्ष में रहा है, जबकि दूसरा गुट शांतिपूर्ण तरीके से बातचीत और कानूनी प्रक्रिया के माध्यम से मांग मनवाने का समर्थन करता रहा है।

सरकार के ताजा आदेश के बाद आंदोलन की दिशा तय करना अतिथि अध्यापक संगठनों के लिए चुनौती बन सकता है। नियमितीकरण का दावा खारिज होने से आंदोलन को फिर से तेज करने की मांग उठ सकती है, जबकि कानूनी लड़ाई के पक्षधर इस आदेश को अदालत में चुनौती देने की तैयारी कर सकते हैं।

आदेश के बाद शिक्षकों के सामने सबसे बड़ा सवाल यह है कि वे आगे किस रणनीति के साथ अपनी मांग उठाएंगे। यदि मामला दोबारा हाईकोर्ट पहुंचता है, तो अदालत यह देख सकती है कि शिक्षा विभाग ने अपने निर्णय में कानूनी प्रावधानों की सही व्याख्या की है या नहीं और संबंधित याचिकाकर्ताओं के दावों पर विचार करते समय सभी जरूरी तथ्यों को ध्यान में रखा गया है या नहीं।

अब अदालत की समीक्षा पर टिकी निगाहें

शिक्षा विभाग के स्पीकिंग ऑर्डर से फिलहाल अतिथि अध्यापकों के नियमितीकरण की उम्मीदों को झटका लगा है। हालांकि, इससे कानूनी प्रक्रिया का रास्ता पूरी तरह बंद नहीं होता। संबंधित शिक्षक आदेश को चुनौती देने का विकल्प अपना सकते हैं। ऐसी स्थिति में अदालत विभाग के तर्कों, वर्ष 2014 की नीतियों, वर्ष 2019 के कानून और पहले दिए गए न्यायिक निर्देशों के आधार पर मामले की समीक्षा कर सकती है।

फिलहाल सरकार ने अपने आदेश में स्पष्ट कर दिया है कि वह केवल लंबी सेवा अवधि के आधार पर नियमितीकरण का लाभ देने के पक्ष में नहीं है। दूसरी ओर, अतिथि अध्यापकों की मांग है कि उनकी वर्षों की सेवा और शिक्षा व्यवस्था में निभाई गई भूमिका को ध्यान में रखते हुए उनके भविष्य का समाधान निकाला जाए।

करीब 12 हजार अतिथि अध्यापकों के लिए यह फैसला केवल नौकरी के दर्जे का सवाल नहीं, बल्कि लंबे समय से चली आ रही सेवा संबंधी मांगों और भविष्य की सुरक्षा से भी जुड़ा है। अब देखना होगा कि शिक्षक संगठन सरकार के फैसले के खिलाफ अदालत का रुख करते हैं या नियमितीकरण के मुद्दे पर बातचीत और आंदोलन के जरिए समाधान तलाशने की कोशिश करते हैं।