मजीठिया का आरोप- ड्रग मनी से चल रही पंजाब की आप सरकार, नशा तस्कर को जमानत दिलाने के लिए पुलिस ने जानबूझकर की देरी

मजीठिया का आरोप- ड्रग मनी से चल रही पंजाब की आप सरकार, नशा तस्कर को जमानत दिलाने के लिए पुलिस ने जानबूझकर की देरी

लवप्रीत सिंह की गिरफ्तारी और डिफॉल्ट जमानत को लेकर सरकार पर साधा निशाना, बोले- 80 करोड़ की हेरोइन बरामदगी को घटाकर 4.5 किलो दिखाया; एसएचओ का तबादला और चालान में देरी पर उठाए सवाल

चंडीगढ़। पंजाब में नशे के मुद्दे को लेकर राजनीतिक टकराव एक बार फिर तेज हो गया है। शिरोमणि अकाली दल के वरिष्ठ नेता बिक्रम सिंह मजीठिया ने आम आदमी पार्टी की सरकार पर गंभीर आरोप लगाते हुए दावा किया है कि प्रदेश में सरकार का संचालन ड्रग मनी के सहारे हो रहा है। उन्होंने आरोप लगाया कि नशा तस्करों के खिलाफ कार्रवाई करने के बजाय उन्हें कानूनी राहत दिलाने के लिए पुलिस और प्रशासनिक स्तर पर जानबूझकर लापरवाही बरती जा रही है। मजीठिया ने एक नशा तस्करी के मामले में आरोपी को मिली डिफॉल्ट जमानत का हवाला देते हुए कहा कि यह घटना सरकार और नशा कारोबार से जुड़े लोगों के बीच कथित मिलीभगत की ओर इशारा करती है।

चंडीगढ़ में आयोजित प्रेस कांफ्रेंस के दौरान मजीठिया ने लवप्रीत सिंह नामक आरोपी की गिरफ्तारी, उसके खिलाफ दर्ज मामले और बाद में मिली जमानत को लेकर कई सवाल उठाए। उन्होंने दावा किया कि लवप्रीत सिंह आम आदमी पार्टी का कार्यकर्ता होने के साथ-साथ सरकार के नशे के खिलाफ चलाए जा रहे अभियान ‘युद्ध नशे के विरुद्ध’ में वरिष्ठ पदाधिकारी की भूमिका भी निभा रहा था। मजीठिया के अनुसार, जिस व्यक्ति को नशे के खिलाफ अभियान से जुड़ा बताया जा रहा था, उसी को भारी मात्रा में हेरोइन के साथ गिरफ्तार किया गया था।

अकाली नेता ने आरोप लगाया कि इस मामले में शुरुआत से ही कई ऐसे घटनाक्रम सामने आए, जिनसे पुलिस की कार्रवाई पर संदेह पैदा होता है। उनका कहना था कि आरोपी की गिरफ्तारी के बाद पुलिस ने जिस तरह से मामले को आगे बढ़ाया, उससे ऐसा प्रतीत होता है कि उसे कानूनी राहत दिलाने के लिए परिस्थितियां तैयार की गईं। उन्होंने दावा किया कि यह केवल एक आरोपी को जमानत मिलने का मामला नहीं है, बल्कि इससे पंजाब में नशे के खिलाफ सरकार की कार्रवाई और उसकी वास्तविक गंभीरता पर सवाल खड़े होते हैं।

80 करोड़ की हेरोइन के साथ गिरफ्तारी का दावा

मजीठिया ने प्रेस कांफ्रेंस में बताया कि लवप्रीत सिंह को इसी वर्ष 18 मार्च को गिरफ्तार किया गया था। उनके मुताबिक, आरोपी के कब्जे से आठ किलो हेरोइन बरामद की गई थी, जिसकी अंतरराष्ट्रीय बाजार में कीमत करीब 80 करोड़ रुपये बताई गई थी। उन्होंने आरोप लगाया कि गिरफ्तारी के बाद बरामद हेरोइन की मात्रा को घटाकर 4.5 किलो कर दिया गया।

अकाली नेता ने सवाल उठाया कि इतनी बड़ी बरामदगी के मामले में जांच की प्रक्रिया पारदर्शी क्यों नहीं रही और बरामदगी की मात्रा में अंतर कैसे सामने आया? उन्होंने कहा कि मादक पदार्थों की तस्करी से जुड़े मामलों में बरामदगी की मात्रा और उससे संबंधित दस्तावेज बेहद महत्वपूर्ण होते हैं। ऐसे मामलों में किसी भी तरह का बदलाव या विरोधाभास जांच की विश्वसनीयता को प्रभावित कर सकता है।

उन्होंने सरकार से इस पूरे घटनाक्रम पर स्पष्टीकरण देने की मांग की। मजीठिया का कहना था कि यदि आरोपी के खिलाफ गंभीर आरोप थे और इतनी बड़ी मात्रा में हेरोइन बरामद हुई थी तो पुलिस को मामले की जांच तेजी से पूरी करके अदालत में समय पर चालान पेश करना चाहिए था। इसके विपरीत, उनके अनुसार, मामले में ऐसी देरी हुई जिसका सीधा लाभ आरोपी को मिला।

आरोपी को राहत दिलाने के लिए पुलिस पर दबाव का आरोप

मजीठिया ने दावा किया कि लवप्रीत सिंह को जेल से बाहर निकालने के लिए पुलिस अधिकारियों पर दबाव बनाया गया था। उन्होंने आरोप लगाया कि सबसे पहले आरोपी को गिरफ्तार करने वाले थाना प्रभारी (एसएचओ) का तबादला कर दिया गया। इसके बाद मामले की जांच और चालान पेश करने की प्रक्रिया में भी देरी हुई।

उन्होंने कहा कि किसी गंभीर नशा तस्करी के मामले में जांच अधिकारी और संबंधित पुलिस अधिकारियों की जिम्मेदारी होती है कि सभी जरूरी साक्ष्य जुटाकर निर्धारित समयसीमा के भीतर अदालत में चालान पेश किया जाए। लेकिन इस मामले में घटनाक्रम इसके उलट दिखाई दिया।

अकाली नेता ने सवाल उठाया कि यदि पुलिस के पास आरोपी के खिलाफ पर्याप्त सबूत और बड़ी मात्रा में हेरोइन की बरामदगी थी तो फिर चालान पेश करने में इतनी देरी क्यों हुई? उन्होंने कहा कि एसएचओ का तबादला और उसके बाद चालान पेश करने की प्रक्रिया में हुई देरी को अलग-अलग घटनाओं के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए। इन सभी घटनाक्रमों की निष्पक्ष जांच होनी चाहिए, ताकि यह स्पष्ट हो सके कि कहीं आरोपी को लाभ पहुंचाने के लिए पुलिस की कार्यप्रणाली को प्रभावित तो नहीं किया गया।

180 दिन की समयसीमा खत्म होने से पहले मांगा गया अतिरिक्त समय

प्रेस कांफ्रेंस में मजीठिया ने डिफॉल्ट जमानत मिलने की कानूनी प्रक्रिया का भी उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि कानून के तहत निर्धारित 180 दिनों की अवधि के भीतर पुलिस को चालान पेश करना होता है। यदि जांच एजेंसी निर्धारित समय में चालान दाखिल नहीं कर पाती तो आरोपी को कानूनी प्रावधानों के तहत डिफॉल्ट जमानत मांगने का अधिकार मिल जाता है।

मजीठिया के अनुसार, इस मामले में पुलिस ने 180 दिनों की निर्धारित अवधि समाप्त होने से केवल तीन दिन पहले अदालत से चालान पेश करने के लिए अतिरिक्त समय मांगा था। उन्होंने दावा किया कि ये तीन दिन छुट्टियों के कारण अदालत से समय बढ़ाने की अनुमति नहीं मिल सकी और निर्धारित समयसीमा के भीतर चालान दाखिल नहीं होने का लाभ आरोपी को मिला।

उन्होंने कहा कि पुलिस को पहले से पता था कि मामले में 180 दिनों की समयसीमा पूरी होने वाली है। इसके बावजूद समय रहते चालान पेश करने की व्यवस्था क्यों नहीं की गई? यदि जांच में कोई महत्वपूर्ण प्रक्रिया बाकी थी तो उसे पहले पूरा करने के लिए कदम क्यों नहीं उठाए गए?

मजीठिया ने आरोप लगाया कि पुलिस की इस देरी ने आरोपी को अदालत से डिफॉल्ट जमानत हासिल करने का अवसर दे दिया। उन्होंने इसे सामान्य प्रशासनिक चूक मानने से इनकार करते हुए पूरे मामले की गहराई से जांच कराने की मांग की।

एफएसएल रिपोर्ट लंबित होने को बनाया गया देरी का आधार

अकाली नेता ने कहा कि अदालत में अभियोजन पक्ष की ओर से चालान पेश करने में देरी का कारण फॉरेंसिक साइंस लैबोरेटरी (एफएसएल) की रिपोर्ट लंबित होना बताया गया था। उन्होंने इस दलील पर सवाल उठाते हुए कहा कि जब एफएसएल विभाग भी गृह विभाग के प्रशासनिक नियंत्रण में आता है तो रिपोर्ट समय पर क्यों उपलब्ध नहीं करवाई गई?

मजीठिया ने कहा कि पंजाब के गृह मंत्री की जिम्मेदारी होती है कि पुलिस और उससे संबंधित जांच व्यवस्था प्रभावी ढंग से काम करे। यदि किसी बड़े नशा तस्करी मामले में एफएसएल रिपोर्ट समय पर नहीं मिलती तो यह प्रशासनिक व्यवस्था की कार्यप्रणाली पर सवाल खड़े करता है।

उन्होंने पूछा कि क्या सरकार को इस बात की जानकारी नहीं थी कि रिपोर्ट लंबित रहने के कारण आरोपी को कानूनी लाभ मिल सकता है? यदि जानकारी थी तो रिपोर्ट समय पर हासिल करने के लिए आवश्यक कदम क्यों नहीं उठाए गए? उन्होंने आरोप लगाया कि जांच एजेंसियों की कथित ढिलाई ने आरोपी के पक्ष में परिस्थितियां तैयार कीं।

मजीठिया के अनुसार, एफएसएल रिपोर्ट जांच का महत्वपूर्ण हिस्सा होती है और ऐसे मामलों में इसे समय पर हासिल करना पुलिस की प्राथमिकता होनी चाहिए। उन्होंने कहा कि रिपोर्ट लंबित होने को चालान में देरी का कारण बताना कई सवाल खड़े करता है, जिनका जवाब सरकार को देना चाहिए।

नशा तस्करी के मामलों को कमजोर करने का लगाया आरोप

बिक्रम सिंह मजीठिया ने आरोप लगाया कि पंजाब में नशा तस्करी से जुड़े मामलों को कथित तौर पर इसी तरह कमजोर किया जा रहा है। उन्होंने दावा किया कि जिन मामलों में पुलिस के पास मजबूत साक्ष्य होते हैं, उनमें भी जांच और कानूनी प्रक्रिया के स्तर पर ऐसी कमियां छोड़ी जाती हैं, जिनका लाभ आरोपियों को मिल जाता है।

उन्होंने गंभीर आरोप लगाते हुए कहा कि नशा तस्करी के मामलों को कमजोर करने के बदले करोड़ों रुपये आम आदमी पार्टी के नेतृत्व तक पहुंचाए जा रहे हैं। उनके अनुसार, ड्रग मनी और राजनीतिक संरक्षण का यह कथित गठजोड़ पंजाब के लिए बेहद खतरनाक है। हालांकि, उन्होंने इन आरोपों के समर्थन में सार्वजनिक रूप से कोई स्वतंत्र दस्तावेजी प्रमाण प्रस्तुत नहीं किया।

मजीठिया ने कहा कि यदि सरकार वास्तव में नशे के खिलाफ गंभीर है तो उसे सबसे पहले उन लोगों के खिलाफ कार्रवाई करनी चाहिए जो नशा कारोबार से जुड़े हैं। इसके साथ ही पुलिस और प्रशासन के भीतर किसी भी तरह की मिलीभगत को भी उजागर किया जाना चाहिए। उन्होंने कहा कि नशे के खिलाफ अभियान केवल प्रचार और राजनीतिक घोषणाओं तक सीमित नहीं रहना चाहिए, बल्कि कार्रवाई के परिणाम भी दिखाई देने चाहिए।

‘युद्ध नशे के विरुद्ध’ अभियान पर भी उठाए सवाल

मजीठिया ने लवप्रीत सिंह का आम आदमी पार्टी से कथित जुड़ाव और ‘युद्ध नशे के विरुद्ध’ अभियान में उसकी भूमिका का उल्लेख करते हुए सरकार की राजनीतिक और प्रशासनिक जिम्मेदारी पर सवाल उठाए। उन्होंने कहा कि सरकार एक तरफ नशे के खिलाफ अभियान चलाने का दावा करती है, जबकि दूसरी तरफ अभियान से जुड़े पदाधिकारी के ही नशा तस्करी के मामले में गिरफ्तार होने और बाद में जमानत मिलने का घटनाक्रम सामने आया है।

उन्होंने कहा कि सरकार को स्पष्ट करना चाहिए कि लवप्रीत सिंह की पार्टी और अभियान में क्या भूमिका थी तथा गिरफ्तारी के बाद उसके मामले में पुलिस ने किस आधार पर कार्रवाई की। मजीठिया ने मांग की कि इस मामले से जुड़े सभी तथ्यों को सार्वजनिक किया जाए, ताकि जनता को वास्तविक स्थिति का पता चल सके।

उनका कहना था कि पंजाब में नशे की समस्या केवल कानून-व्यवस्था का विषय नहीं है, बल्कि यह राज्य की युवा पीढ़ी और सामाजिक भविष्य से जुड़ा गंभीर मुद्दा है। ऐसे में नशा तस्करी के आरोपियों के खिलाफ कार्रवाई में किसी भी तरह की ढिलाई बर्दाश्त नहीं की जानी चाहिए।

सरकार से जवाब और निष्पक्ष जांच की मांग

प्रेस कांफ्रेंस के अंत में मजीठिया ने आम आदमी पार्टी सरकार से पूरे मामले पर जवाब मांगा। उन्होंने कहा कि लवप्रीत सिंह की गिरफ्तारी से लेकर बरामदगी की मात्रा, एसएचओ के तबादले, चालान पेश करने में देरी और डिफॉल्ट जमानत तक के सभी घटनाक्रमों की निष्पक्ष जांच होनी चाहिए।

उन्होंने सवाल उठाया कि यदि पुलिस की ओर से समय पर कार्रवाई की गई होती तो क्या आरोपी को डिफॉल्ट जमानत मिलती? एफएसएल रिपोर्ट में देरी के लिए कौन जिम्मेदार है और निर्धारित समयसीमा के अंतिम दिनों में अतिरिक्त समय मांगने की नौबत क्यों आई? इन सवालों का जवाब देना सरकार की जिम्मेदारी है।

कुल मिलाकर, लवप्रीत सिंह को मिली डिफॉल्ट जमानत को लेकर पंजाब की राजनीति में नया विवाद खड़ा हो गया है। अकाली दल ने इस घटनाक्रम को आधार बनाकर आम आदमी पार्टी सरकार की नशा विरोधी मुहिम पर सवाल उठाए हैं। मजीठिया के आरोपों से सरकार पर राजनीतिक दबाव बढ़ सकता है। अब इस मामले में सरकार और पुलिस प्रशासन की ओर से आने वाला स्पष्टीकरण महत्वपूर्ण होगा। साथ ही यह भी देखना होगा कि बरामदगी की मात्रा, एफएसएल रिपोर्ट में देरी और चालान पेश करने की प्रक्रिया को लेकर उठाए गए सवालों पर क्या जांच होती है और संबंधित अधिकारियों की कोई जवाबदेही तय की जाती है।