देश में बदलती जीवनशैली, शारीरिक गतिविधियों में कमी और खानपान की बदलती आदतों का असर अब राष्ट्रीय स्तर पर स्वास्थ्य आंकड़ों में भी साफ दिखाई देने लगा है। राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण-6 (NFHS-6) की ताज़ा रिपोर्ट ने मोटापा, हाई ब्लड शुगर और अन्य जीवनशैली से जुड़ी स्वास्थ्य समस्याओं को लेकर कई महत्वपूर्ण संकेत दिए हैं। रिपोर्ट के अनुसार पिछले कुछ वर्षों में वयस्क आबादी में मोटापे और बढ़े हुए ब्लड शुगर के मामलों में उल्लेखनीय वृद्धि दर्ज की गई है।
रिपोर्ट यह भी दर्शाती है कि महिलाओं में मोटापे की वृद्धि पुरुषों की तुलना में अधिक तेज़ रही है। इसके साथ ही हाई ब्लड शुगर के मामलों में भी लगातार बढ़ोतरी दर्ज की गई है, जो भविष्य में मधुमेह (डायबिटीज) और हृदय संबंधी बीमारियों के बढ़ते खतरे की ओर संकेत करती है।
राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण भारत में स्वास्थ्य, पोषण, परिवार नियोजन, मातृ एवं शिशु स्वास्थ्य तथा जीवनशैली से जुड़े कई महत्वपूर्ण संकेतकों का व्यापक अध्ययन करता है। नीति निर्माण और स्वास्थ्य योजनाओं के लिए इस सर्वेक्षण को महत्वपूर्ण आधार माना जाता है।
NFHS-6 के आंकड़े बताते हैं कि देश में स्वास्थ्य से जुड़ी चुनौतियां केवल संक्रामक रोगों तक सीमित नहीं हैं, बल्कि अब गैर-संचारी रोग (Non-Communicable Diseases) भी तेजी से बढ़ रहे हैं। मोटापा, उच्च रक्त शर्करा, उच्च रक्तचाप और अस्वस्थ जीवनशैली भविष्य की स्वास्थ्य व्यवस्था के लिए बड़ी चुनौती बनते दिखाई दे रहे हैं।
महिलाओं में मोटापे की दर में उल्लेखनीय वृद्धि
रिपोर्ट के अनुसार 15 से 49 वर्ष आयु वर्ग की महिलाओं में मोटापे की दर पिछले सर्वेक्षण की तुलना में उल्लेखनीय रूप से बढ़ी है। वर्ष 2019-21 में जहां इस आयु वर्ग की लगभग 24 प्रतिशत महिलाएं मोटापे की श्रेणी में थीं, वहीं वर्ष 2023-24 में यह आंकड़ा बढ़कर 30.7 प्रतिशत तक पहुंच गया है।
इसका अर्थ है कि हर तीन में से लगभग एक महिला अब मोटापे की श्रेणी में आ रही है। विशेषज्ञों का कहना है कि यह बदलाव केवल व्यक्तिगत स्वास्थ्य का विषय नहीं है, बल्कि सार्वजनिक स्वास्थ्य प्रणाली के लिए भी एक महत्वपूर्ण संकेत है।
महिलाओं में मोटापा बढ़ने के पीछे कई कारण बताए जाते हैं, जिनमें शारीरिक गतिविधि की कमी, लंबे समय तक बैठकर काम करना, असंतुलित भोजन, तनाव, हार्मोनल बदलाव और शहरी जीवनशैली प्रमुख माने जाते हैं।
पुरुषों में भी तेजी से बढ़ रहा मोटापा
NFHS-6 के अनुसार पुरुषों में भी मोटापे की दर लगातार बढ़ रही है। वर्ष 2019-21 में जहां 22.9 प्रतिशत पुरुष मोटापे की श्रेणी में थे, वहीं 2023-24 में यह आंकड़ा बढ़कर 27.3 प्रतिशत तक पहुंच गया है।
हालांकि महिलाओं की तुलना में वृद्धि की गति कुछ कम है, लेकिन पुरुषों में भी बढ़ता मोटापा स्वास्थ्य विशेषज्ञों के लिए चिंता का विषय है। मोटापा कई गंभीर बीमारियों का प्रमुख जोखिम कारक माना जाता है, जिनमें टाइप-2 डायबिटीज, हृदय रोग, उच्च रक्तचाप और फैटी लिवर जैसी समस्याएं शामिल हैं।
विशेषज्ञों का कहना है कि आधुनिक जीवनशैली, फास्ट फूड का बढ़ता सेवन और नियमित व्यायाम की कमी इस स्थिति को और गंभीर बना रहे हैं।
किन राज्यों में महिलाओं में मोटापा सबसे अधिक
राज्यवार आंकड़ों पर नजर डालें तो महिलाओं में मोटापे की सबसे अधिक दर पुडुचेरी में दर्ज की गई है। रिपोर्ट के अनुसार यहां लगभग 46.3 प्रतिशत महिलाएं मोटापे की श्रेणी में आती हैं।
इसके बाद चंडीगढ़, दिल्ली और पंजाब जैसे राज्यों का स्थान है, जहां भी महिलाओं में मोटापे की दर राष्ट्रीय औसत से अधिक दर्ज की गई है।
दूसरी ओर बिहार, छत्तीसगढ़ और असम जैसे राज्यों में महिलाओं में मोटापे की दर अपेक्षाकृत कम पाई गई। हालांकि विशेषज्ञों का कहना है कि कम मोटापा होने का अर्थ यह नहीं है कि स्वास्थ्य संबंधी अन्य चुनौतियां वहां मौजूद नहीं हैं।
पुरुषों में मोटापे के मामले में कौन से क्षेत्र आगे
पुरुषों में मोटापे की सबसे अधिक दर अंडमान और निकोबार द्वीप समूह में दर्ज की गई है। रिपोर्ट के अनुसार यहां लगभग 38 प्रतिशत पुरुष मोटापे की श्रेणी में आते हैं।
यह आंकड़ा दर्शाता है कि देश के विभिन्न क्षेत्रों में जीवनशैली, खानपान और सामाजिक परिस्थितियों के आधार पर स्वास्थ्य संबंधी चुनौतियां अलग-अलग रूप में सामने आ रही हैं।
हाई ब्लड शुगर, महिलाओं की स्वास्थ्य जागरूकता और परिवार नियोजन से जुड़े आंकड़ों में भी बदलाव
हाई ब्लड शुगर के मामलों में लगातार बढ़ोतरी
NFHS-6 रिपोर्ट में हाई ब्लड शुगर से जुड़े आंकड़े भी चिंता बढ़ाने वाले हैं। रिपोर्ट के अनुसार 15 वर्ष और उससे अधिक आयु की महिलाओं में हाई ब्लड शुगर या इसके उपचार के लिए दवा लेने वालों का प्रतिशत 13.5 से बढ़कर 17.8 हो गया है।
पुरुषों में यह वृद्धि और अधिक दर्ज की गई है। वर्ष 2019-21 में जहां 15.6 प्रतिशत पुरुष हाई ब्लड शुगर या उससे संबंधित दवा का उपयोग कर रहे थे, वहीं 2023-24 में यह आंकड़ा बढ़कर 20.9 प्रतिशत तक पहुंच गया है।
उच्च रक्त शर्करा भविष्य में मधुमेह, हृदय रोग, किडनी संबंधी समस्याओं और अन्य गंभीर स्वास्थ्य जटिलताओं का कारण बन सकती है। इसलिए स्वास्थ्य विशेषज्ञ समय-समय पर ब्लड शुगर जांच कराने की सलाह देते हैं।
जीवनशैली से जुड़ी बीमारियों का बढ़ता प्रभाव
विशेषज्ञों के अनुसार मोटापा और हाई ब्लड शुगर दोनों एक-दूसरे से जुड़े हुए जोखिम कारक हैं। यदि शरीर का वजन लगातार बढ़ता है और शारीरिक गतिविधियां कम होती हैं, तो मधुमेह और हृदय रोगों का खतरा भी बढ़ सकता है।
इसके अलावा तनाव, अनियमित नींद, अत्यधिक प्रसंस्कृत खाद्य पदार्थों का सेवन, मीठे पेय पदार्थों की अधिक मात्रा और लंबे समय तक बैठे रहने की आदत भी इन समस्याओं को बढ़ावा दे सकती है।
स्वास्थ्य विशेषज्ञ संतुलित आहार, नियमित व्यायाम, पर्याप्त नींद और समय-समय पर स्वास्थ्य परीक्षण को स्वस्थ जीवनशैली का महत्वपूर्ण हिस्सा मानते हैं।
मासिक धर्म स्वच्छता में सुधार के संकेत
NFHS-6 रिपोर्ट में कुछ सकारात्मक बदलाव भी सामने आए हैं। 15 से 24 वर्ष आयु वर्ग की युवतियों में मासिक धर्म के दौरान सुरक्षित स्वच्छता उत्पादों का उपयोग पहले की तुलना में बढ़ा है।
रिपोर्ट के अनुसार यह प्रतिशत 77.6 से बढ़कर 79.2 तक पहुंच गया है। विशेषज्ञों का मानना है कि जागरूकता अभियान, सरकारी योजनाएं और सस्ते सैनिटरी उत्पादों की उपलब्धता ने इसमें महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है।
मासिक धर्म स्वच्छता में सुधार महिलाओं के स्वास्थ्य, शिक्षा और सामाजिक भागीदारी के लिए महत्वपूर्ण माना जाता है।
परिवार नियोजन के तरीकों में बदलाव
रिपोर्ट में परिवार नियोजन से जुड़े आंकड़ों में भी बदलाव देखने को मिला है। विवाहित महिलाओं के बीच आधुनिक गर्भनिरोधक उपायों के उपयोग में कमी दर्ज की गई है।
आधुनिक गर्भनिरोधक तरीकों का उपयोग 56.4 प्रतिशत से घटकर 52.7 प्रतिशत रह गया है। दूसरी ओर पारंपरिक परिवार नियोजन उपायों का उपयोग बढ़कर 10.3 प्रतिशत से 16.4 प्रतिशत तक पहुंच गया है।
यह बदलाव स्वास्थ्य विशेषज्ञों के लिए अध्ययन का विषय माना जा रहा है। परिवार नियोजन के क्षेत्र में लोगों की पसंद, जागरूकता और स्वास्थ्य सेवाओं की उपलब्धता जैसे कई कारक इन आंकड़ों को प्रभावित कर सकते हैं।
सार्वजनिक स्वास्थ्य नीतियों के लिए महत्वपूर्ण संकेत
NFHS-6 के आंकड़े केवल स्वास्थ्य स्थिति का आकलन नहीं करते, बल्कि भविष्य की सार्वजनिक स्वास्थ्य नीतियों के लिए भी महत्वपूर्ण आधार उपलब्ध कराते हैं। मोटापा, हाई ब्लड शुगर और अन्य गैर-संचारी रोगों के बढ़ते मामलों को देखते हुए रोकथाम आधारित स्वास्थ्य सेवाओं को मजबूत करने की आवश्यकता महसूस की जा रही है।
विशेषज्ञों का मानना है कि स्वास्थ्य जागरूकता अभियान, नियमित स्वास्थ्य जांच, संतुलित पोषण, खेल और शारीरिक गतिविधियों को बढ़ावा देना तथा प्राथमिक स्वास्थ्य सेवाओं को मजबूत करना भविष्य में इन चुनौतियों से निपटने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है।
स्वस्थ जीवनशैली की बढ़ती आवश्यकता
तेजी से बदलती जीवनशैली के बीच स्वास्थ्य विशेषज्ञ इस बात पर जोर देते हैं कि मोटापा और हाई ब्लड शुगर जैसी समस्याओं की रोकथाम केवल चिकित्सा उपचार से संभव नहीं है। नियमित व्यायाम, संतुलित भोजन, तनाव प्रबंधन, पर्याप्त नींद और समय-समय पर स्वास्थ्य परीक्षण स्वस्थ जीवनशैली के महत्वपूर्ण आधार माने जाते हैं।
NFHS-6 के ताजा आंकड़े यह संकेत देते हैं कि भारत में जीवनशैली से जुड़ी स्वास्थ्य चुनौतियां लगातार बढ़ रही हैं। ऐसे में व्यक्तिगत जागरूकता, सामुदायिक प्रयास और प्रभावी स्वास्थ्य नीतियां भविष्य में इन समस्याओं को नियंत्रित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती हैं।
(Photo: AI Generated)




