PTM में सिर्फ नंबर और ग्रेड न पूछें, टीचर से इन बातों पर करें चर्चा

PTM में सिर्फ नंबर और ग्रेड न पूछें, टीचर से इन बातों पर करें चर्चा

पेरेंट-टीचर मीटिंग यानी PTM माता-पिता के लिए बच्चे की पढ़ाई का हाल जानने का एक अहम मौका होती है। स्कूल में होने वाली इस मुलाकात के दौरान आमतौर पर सबसे ज्यादा चर्चा परीक्षा के परिणाम, नंबर, ग्रेड, होमवर्क और कमजोर विषयों को लेकर होती है। रिपोर्ट कार्ड सामने आते ही पेरेंट्स अक्सर यही जानना चाहते हैं कि बच्चा बाकी बच्चों की तुलना में कैसा प्रदर्शन कर रहा है और उसे किन विषयों में ज्यादा मेहनत करने की जरूरत है। हालांकि बच्चे की स्कूल लाइफ को केवल उसके नंबरों से समझना संभव नहीं है। स्कूल में उसका व्यवहार, दोस्तों के साथ रिश्ता, परेशानी आने पर प्रतिक्रिया, गलतियों से निपटने का तरीका और दूसरों के साथ उसका बर्ताव भी उतना ही महत्वपूर्ण हो सकता है।

कई बार माता-पिता को घर पर बच्चे का एक अलग रूप दिखाई देता है, जबकि स्कूल में उसका व्यवहार बिल्कुल अलग हो सकता है। बच्चा घर में बहुत बातूनी हो सकता है लेकिन कक्षा में सवाल पूछने से झिझकता हो। कोई बच्चा घर पर छोटी-सी गलती को लेकर परेशान हो सकता है, जबकि स्कूल में वह आसानी से अपनी गलती सुधार लेता हो। इसी तरह कुछ बच्चे पढ़ाई में औसत होने के बावजूद दोस्तों के साथ अच्छा तालमेल रखते हैं और जरूरत पड़ने पर दूसरों की मदद करते हैं। इसलिए PTM में शिक्षक से केवल यह पूछना कि बच्चे के कितने नंबर आए, पर्याप्त नहीं माना जा सकता। कम्युनिकेशन कोच और कॉर्पोरेट ट्रेनर मैत्री मेहता ने भी माता-पिता को ऐसे सवालों पर ध्यान देने की सलाह दी है, जिनसे बच्चे के स्कूल में रोजमर्रा के व्यवहार को समझा जा सके।

बच्चे की दोस्ती के बारे में भी जानें

PTM के दौरान माता-पिता शिक्षक से यह पूछ सकते हैं कि बच्चा स्कूल में खाली समय कैसे बिताता है। खासतौर पर लंच या ब्रेक के दौरान वह किन बच्चों के साथ रहता है, क्या वह किसी खास दोस्त के साथ ज्यादा समय बिताता है या अलग-अलग बच्चों के साथ घुलने-मिलने की कोशिश करता है। यह जानकारी बच्चे के सामाजिक व्यवहार को समझने में मदद कर सकती है। शिक्षक रोजाना बच्चे को उसके साथियों के बीच देखते हैं, इसलिए वे यह बता सकते हैं कि बच्चा ग्रुप का हिस्सा बनने में सहज है या उसे नए बच्चों के साथ बातचीत करने में थोड़ा समय लगता है।

अगर शिक्षक बताते हैं कि बच्चा कई बार अकेला रहना पसंद करता है तो इसका अर्थ यह जरूरी नहीं कि उसके साथ कोई समस्या है। कुछ बच्चे स्वभाव से शांत होते हैं और उन्हें अकेले समय बिताना पसंद होता है। वहीं कुछ बच्चे बड़े ग्रुप की बजाय एक या दो करीबी दोस्तों के साथ रहना पसंद करते हैं। इसलिए इस जानकारी को बच्चे के पूरे व्यवहार के संदर्भ में समझना चाहिए। अगर माता-पिता को लगातार लगता है कि बच्चा सामाजिक परिस्थितियों में असहज रहता है, तब शिक्षक से विस्तार से बात की जा सकती है और बच्चे से भी घर पर सहज तरीके से पूछा जा सकता है कि उसे स्कूल में कैसा लगता है।

मुश्किल सवाल मिलने पर बच्चे का रवैया कैसा रहता है?

बच्चे के सीखने के तरीके को समझने के लिए उसके नंबरों के अलावा यह जानना भी जरूरी है कि जब उसे कोई चीज समझ नहीं आती तो वह क्या करता है। PTM में शिक्षक से पूछा जा सकता है कि कठिन सवाल, नया टॉपिक या मुश्किल असाइनमेंट मिलने पर बच्चे की प्रतिक्रिया कैसी होती है। क्या वह खुद से दोबारा कोशिश करता है, शिक्षक से सवाल पूछता है, किसी दोस्त की मदद लेता है या फिर मुश्किल लगते ही काम छोड़ देता है।

इस तरह का सवाल माता-पिता को यह समझने में मदद कर सकता है कि बच्चा चुनौतीपूर्ण स्थिति का सामना कैसे करता है। कुछ बच्चे तुरंत मदद मांग लेते हैं, जबकि कुछ बच्चे गलत जवाब देने के डर से चुप रहना पसंद करते हैं। कुछ बच्चे कई बार प्रयास करते रहते हैं और धीरे-धीरे समस्या का समाधान खोज लेते हैं। शिक्षक से मिलने वाली जानकारी के आधार पर माता-पिता घर पर भी बच्चे की पढ़ाई में अपना तरीका बदल सकते हैं। अगर बच्चा कठिन सवालों से जल्दी परेशान हो जाता है तो उसे केवल सही उत्तर देने पर जोर देने के बजाय कोशिश करने और सवाल पूछने के लिए प्रोत्साहित किया जा सकता है।

परेशानी में बच्चा किस पर भरोसा करता है?

स्कूल में बच्चों को सिर्फ पढ़ाई से जुड़ी मुश्किलों का सामना नहीं करना पड़ता। दोस्तों के साथ मतभेद, किसी गतिविधि में असफलता, किसी बात का डर या किसी घटना से दुखी होना जैसी स्थितियां भी सामने आ सकती हैं। ऐसे समय में बच्चा किससे अपनी बात साझा करता है, यह जानना भी माता-पिता के लिए महत्वपूर्ण हो सकता है।

PTM में शिक्षक से पूछा जा सकता है कि जब बच्चा परेशान या असहज दिखाई देता है तो वह किसके पास जाता है। क्या वह शिक्षक से बात करता है, किसी करीबी दोस्त से अपनी परेशानी साझा करता है या फिर चुपचाप अपनी समस्या खुद तक रखता है। इससे माता-पिता को यह समझने में एक संकेत मिल सकता है कि स्कूल में बच्चा अपनी भावनाओं और समस्याओं को किस तरह संभालता है।

अगर बच्चा किसी भरोसेमंद व्यक्ति से अपनी बात आसानी से साझा करता है तो यह संवाद उसके लिए उपयोगी हो सकता है। दूसरी ओर, अगर बच्चा परेशानी होने पर बिल्कुल चुप हो जाता है, तो माता-पिता घर पर उससे बिना दबाव डाले बातचीत का माहौल बना सकते हैं। जरूरी नहीं कि हर बच्चा तुरंत अपनी समस्या बताए। कई बच्चों को अपनी बात कहने में समय लग सकता है।

गलती होने के बाद क्या करता है बच्चा?

बच्चे की असली प्रतिक्रिया कई बार तब दिखाई देती है जब चीजें उसके मुताबिक नहीं होतीं। इसलिए PTM में शिक्षक से यह भी पूछा जा सकता है कि गलती होने या किसी काम में असफल रहने पर बच्चे का रवैया कैसा रहता है। क्या वह अपनी गलती सुधारने की कोशिश करता है या तुरंत निराश होकर पीछे हट जाता है? क्या वह शिक्षक से पूछता है कि उससे गलती कहां हुई या फिर दोबारा प्रयास करने से बचता है?

बच्चे की इस प्रतिक्रिया को समझना इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि गलतियां सीखने की प्रक्रिया का सामान्य हिस्सा हैं। कुछ बच्चे गलती को लेकर बहुत ज्यादा परेशान हो जाते हैं और उन्हें लगता है कि गलत जवाब देना उनकी क्षमता की कमी है। वहीं कुछ बच्चे गलत उत्तर मिलने के बाद भी दोबारा कोशिश करते रहते हैं। माता-पिता को शिक्षक से मिली जानकारी के आधार पर यह समझने का मौका मिल सकता है कि बच्चे को घर पर किस तरह का प्रोत्साहन चाहिए।

अगर बच्चा गलती करने से डरता है तो हर बार परिणाम पर जोर देने के बजाय उसके प्रयास की सराहना की जा सकती है। इससे वह नई चीजें आजमाने और सवाल पूछने में ज्यादा सहज महसूस कर सकता है। हालांकि किसी एक घटना से बच्चे के स्वभाव के बारे में स्थायी निष्कर्ष निकालना सही नहीं होगा।

क्या बच्चा दूसरों के साथ सहयोग करता है?

स्कूल में बच्चों को कई बार ऐसी गतिविधियों में हिस्सा लेना पड़ता है जहां उन्हें दूसरे बच्चों के साथ मिलकर काम करना होता है। ऐसे में यह जानना भी उपयोगी हो सकता है कि बच्चा अपने सहपाठियों के साथ किस तरह व्यवहार करता है। शिक्षक से पूछा जा सकता है कि क्या बच्चा जरूरत पड़ने पर किसी दोस्त की मदद करता है, ग्रुप एक्टिविटी में दूसरों की बात सुनता है और किसी काम को मिलकर पूरा करने में सहयोग करता है।

मसलन, अगर किसी सहपाठी को कोई सवाल समझ नहीं आता तो क्या बच्चा उसे समझाने की कोशिश करता है? अगर ग्रुप में कोई प्रोजेक्ट दिया गया है तो क्या वह अपनी जिम्मेदारी पूरी करता है? अगर किसी दोस्त को किसी चीज की जरूरत है तो क्या वह मदद के लिए आगे आता है? ऐसे सवालों के जवाब से माता-पिता को बच्चे के social behaviour को समझने का एक अलग नजरिया मिल सकता है।

लेकिन यहां भी यह ध्यान रखना जरूरी है कि बच्चा हर स्थिति में एक जैसा व्यवहार नहीं करेगा। किसी दिन वह थका हुआ हो सकता है, किसी गतिविधि में उसकी रुचि न हो सकती है या किसी खास दोस्त के साथ उसका मतभेद हो सकता है। इसलिए शिक्षक की किसी एक observation को बच्चे के पूरे व्यक्तित्व का प्रमाण मानने के बजाय लगातार दिखने वाले व्यवहार को समझना ज्यादा उचित होगा।

PTM में बातचीत का दायरा थोड़ा बढ़ाएं

PTM का उद्देश्य केवल यह पता लगाना नहीं होना चाहिए कि बच्चे ने परीक्षा में कितने अंक हासिल किए। नंबर और ग्रेड महत्वपूर्ण हैं, लेकिन बच्चे के स्कूल अनुभव की पूरी तस्वीर उनके जरिए सामने नहीं आती। शिक्षक से बच्चे की दोस्ती, उसके व्यवहार, कठिन परिस्थितियों में प्रतिक्रिया और दूसरों के साथ तालमेल के बारे में बात करने से माता-पिता को कई ऐसी बातें पता चल सकती हैं जो रिपोर्ट कार्ड में दर्ज नहीं होतीं।

माता-पिता को यह भी ध्यान रखना चाहिए कि शिक्षक से मिली जानकारी को बच्चे की आलोचना करने या उसे दूसरे बच्चों से तुलना करने के लिए इस्तेमाल न किया जाए। अगर कोई चिंता सामने आती है तो पहले यह समझना जरूरी है कि वह व्यवहार कितनी बार दिखाई देता है और किन परिस्थितियों में होता है। इसके बाद बच्चे से भी उसकी राय और अनुभव के बारे में बात की जा सकती है।

दरअसल, बच्चे के बारे में सही तस्वीर तब बनती है जब माता-पिता, शिक्षक और खुद बच्चे के अनुभवों को साथ रखकर देखा जाए। स्कूल में बच्चा कैसा महसूस करता है, उसे किस तरह की परिस्थितियां पसंद या मुश्किल लगती हैं और उसे कहां मदद की जरूरत है, इन बातों को समझने के लिए PTM एक अच्छा अवसर हो सकती है। इसलिए अगली बार स्कूल में मीटिंग हो तो रिपोर्ट कार्ड पर चर्चा जरूर करें, लेकिन बातचीत को सिर्फ नंबरों तक सीमित न रखें। बच्चे की स्कूल लाइफ को समझने के लिए उसके व्यवहार और रोजमर्रा के अनुभवों के बारे में भी शिक्षक से खुलकर सवाल करें।

(Photo : AI Generated)