बेअदबी कानून में संशोधन पर SGPC ने जताई आपत्ति, धार्मिक संस्थाओं से व्यापक संवाद की उठाई मांग
श्री गुरु ग्रंथ साहिब जी की बेअदबी से जुड़े कानून में पंजाब सरकार द्वारा किए गए संशोधनों को लेकर शिरोमणि गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी (SGPC) ने अपनी गंभीर आपत्तियां सार्वजनिक रूप से सामने रखी हैं। SGPC का कहना है कि यह विषय केवल कानूनी नहीं बल्कि धार्मिक, संवैधानिक और पंथिक महत्व का है। ऐसे मामलों में किसी भी प्रकार का निर्णय लेने से पहले संबंधित धार्मिक संस्थाओं, विशेषज्ञों और सिख समुदाय के प्रतिनिधियों से विस्तृत चर्चा की जानी चाहिए थी।
SGPC अध्यक्ष हरजिंदर सिंह धामी ने प्रेस कॉन्फ्रेंस के दौरान कहा कि सरकार ने कानून में संशोधन करते समय शिरोमणि कमेटी और श्री अकाल तख्त साहिब की राय को पर्याप्त महत्व नहीं दिया। उनका कहना था कि धार्मिक मामलों में संवाद और सहमति की प्रक्रिया लोकतांत्रिक व्यवस्था का महत्वपूर्ण हिस्सा होनी चाहिए, विशेष रूप से तब जब मामला करोड़ों श्रद्धालुओं की आस्था से जुड़ा हो।
धामी ने स्पष्ट किया कि SGPC श्री गुरु ग्रंथ साहिब जी की बेअदबी करने वालों के खिलाफ कठोर और प्रभावी कार्रवाई के पक्ष में है। उनका कहना था कि धार्मिक ग्रंथों का सम्मान बनाए रखना सभी की जिम्मेदारी है, लेकिन कानून के कुछ प्रावधान ऐसे हैं जो धार्मिक संस्थाओं के अधिकारों और प्रशासनिक व्यवस्था को प्रभावित कर सकते हैं। इसी कारण इन प्रावधानों पर पुनर्विचार की आवश्यकता महसूस की जा रही है।
संशोधित कानून को लेकर SGPC ने किन मुद्दों पर जताई चिंता?
SGPC के अनुसार, पंजाब विधानसभा के विशेष सत्र के दौरान वर्ष 2008 के संबंधित कानून में संशोधन किए गए। समिति का कहना है कि इतने महत्वपूर्ण विषय पर निर्णय लेने से पहले धार्मिक संस्थाओं को विश्वास में नहीं लिया गया। धामी ने कहा कि यदि सरकार पहले विस्तृत चर्चा करती, तो कई ऐसे बिंदुओं पर सुझाव दिए जा सकते थे जिनसे कानून अधिक व्यावहारिक और सभी पक्षों के लिए स्वीकार्य बन सकता था।
उन्होंने कहा कि कानून का उद्देश्य यदि धार्मिक स्थलों और पवित्र स्वरूपों की सुरक्षा सुनिश्चित करना है, तो उसमें धार्मिक संस्थाओं के अनुभव और व्यवस्थाओं को भी महत्व दिया जाना चाहिए। SGPC का मानना है कि वर्षों से गुरुद्वारों के संचालन और श्री गुरु ग्रंथ साहिब जी के स्वरूपों की देखरेख के लिए स्थापित व्यवस्थाओं को समझे बिना किसी नई व्यवस्था को लागू करना उचित नहीं होगा।
‘कस्टोडियन’ संबंधी प्रावधान पर क्या है आपत्ति?
प्रेस कॉन्फ्रेंस के दौरान धामी ने विशेष रूप से संशोधित कानून में शामिल “कस्टोडियन” संबंधी प्रावधानों का उल्लेख किया। उनके अनुसार, यह व्यवस्था धार्मिक प्रशासन के अधिकार क्षेत्र को प्रभावित कर सकती है। उन्होंने कहा कि SGPC लंबे समय से धार्मिक परंपराओं और स्थापित नियमों के अनुसार गुरुद्वारों का संचालन करती आ रही है और इस व्यवस्था में किसी भी प्रकार का बदलाव व्यापक विचार-विमर्श के बाद ही किया जाना चाहिए।
उन्होंने कहा कि धार्मिक संस्थाओं की प्रशासनिक जिम्मेदारियों और सरकार की कानूनी भूमिका के बीच संतुलन बनाए रखना आवश्यक है, ताकि किसी प्रकार का भ्रम या अधिकारों का टकराव उत्पन्न न हो।
स्वरूपों का रिकॉर्ड सार्वजनिक करने के प्रस्ताव पर उठे सवाल
SGPC अध्यक्ष ने उन प्रावधानों पर भी चिंता व्यक्त की जिनमें श्री गुरु ग्रंथ साहिब जी के स्वरूपों से संबंधित जानकारी को वेबसाइट के माध्यम से सार्वजनिक करने की बात कही गई है। उनके अनुसार, धार्मिक दृष्टि से यह एक संवेदनशील विषय है और इससे जुड़े प्रत्येक निर्णय में सुरक्षा तथा मर्यादा दोनों का ध्यान रखा जाना चाहिए।
धामी ने कहा कि शिरोमणि कमेटी के पास पहले से ही स्वरूपों का व्यवस्थित रिकॉर्ड रखने के लिए आधुनिक प्रणाली उपलब्ध है। इसके अंतर्गत रिकॉर्डिंग, सत्यापन और निगरानी जैसी प्रक्रियाएं नियमित रूप से अपनाई जाती हैं। उनका कहना था कि इस पूरी व्यवस्था का उद्देश्य पवित्र स्वरूपों की सुरक्षा और सम्मान सुनिश्चित करना है।
उन्होंने यह भी कहा कि स्वरूपों का विस्तृत डेटा सार्वजनिक किए जाने से सुरक्षा संबंधी चुनौतियां उत्पन्न हो सकती हैं। इसलिए किसी भी निर्णय से पहले संभावित जोखिमों का गंभीर मूल्यांकन किया जाना चाहिए।
SGPC ने अपनी मौजूदा सुरक्षा व्यवस्था की दी जानकारी
धामी ने बताया कि गुरुद्वारों में श्री गुरु ग्रंथ साहिब जी के स्वरूपों की सुरक्षा के लिए पहले से कई स्तरों पर व्यवस्थाएं लागू हैं। इनमें नियमित निरीक्षण, रिकॉर्ड का रखरखाव, आधुनिक निगरानी प्रणाली और आवश्यक सुरक्षा उपाय शामिल हैं।
उन्होंने जानकारी दी कि कई गुरुद्वारों में CCTV कैमरों की व्यवस्था की गई है, अग्निशमन सुरक्षा के उपाय अपनाए गए हैं और संबंधित ग्रंथी सिंहों की पुष्टि के बाद ही स्वरूप सौंपे जाते हैं। इसके अलावा रिकॉर्ड को व्यवस्थित तरीके से सुरक्षित रखने की प्रक्रिया भी लगातार अपनाई जाती है।
SGPC का कहना है कि इन व्यवस्थाओं का उद्देश्य केवल प्रशासनिक नियंत्रण नहीं बल्कि धार्मिक मर्यादा और पवित्रता को बनाए रखना भी है।
सिख रहत मर्यादा को धार्मिक विषय बताया
प्रेस कॉन्फ्रेंस के दौरान धामी ने कहा कि “सिख रहत मर्यादा” पूरी तरह धार्मिक विषय है। उनके अनुसार, इससे जुड़े निर्णय लेने का अधिकार धार्मिक परंपराओं के अनुसार श्री अकाल तख्त साहिब के पास है। उन्होंने कहा कि धार्मिक मर्यादाओं से संबंधित विषयों पर किसी भी प्रकार का निर्णय संबंधित धार्मिक संस्थाओं की भागीदारी और मार्गदर्शन में ही होना चाहिए।
उन्होंने यह भी दोहराया कि SGPC का उद्देश्य किसी प्रकार का टकराव पैदा करना नहीं है, बल्कि धार्मिक संस्थाओं की परंपरागत व्यवस्था और अधिकारों को सुरक्षित रखना है।
पंथिक संगठनों के साथ बैठकों का किया उल्लेख
धामी ने बताया कि इस विषय पर पहले भी विभिन्न धार्मिक और पंथिक संगठनों के साथ विचार-विमर्श किया जा चुका है। उन्होंने कहा कि तख्त श्री दमदमा साहिब में आयोजित बैठक में अलग-अलग सिंह सभाओं, गुरुद्वारा कमेटियों और अन्य संगठनों ने अपनी राय रखी थी।
उन्होंने बताया कि आगामी 31 मई को गुरुद्वारा श्री बाबा बकाला साहिब में एक बड़ी पंथिक कॉन्फ्रेंस आयोजित की जाएगी। इस सम्मेलन में निहंग सिंह दल, दमदमी टकसाल, निर्मल संप्रदाय सहित विभिन्न धार्मिक संस्थाओं और प्रतिनिधियों को आमंत्रित किया गया है, ताकि इस विषय पर व्यापक स्तर पर चर्चा हो सके।
धार्मिक स्वायत्तता और संवाद पर दिया जोर
SGPC अध्यक्ष ने कहा कि प्रस्तावित सम्मेलन का उद्देश्य किसी प्रकार का विरोध या टकराव पैदा करना नहीं है। उनका कहना था कि इस बैठक का मुख्य उद्देश्य धार्मिक संस्थाओं की स्वायत्तता, परंपरागत अधिकारों और धार्मिक व्यवस्थाओं से जुड़े मुद्दों पर सामूहिक विचार-विमर्श करना है।
उन्होंने पंजाब सरकार से अपील की कि कानून की उन धाराओं पर पुनर्विचार किया जाए जिन पर धार्मिक संस्थाओं ने आपत्ति जताई है। साथ ही उन्होंने सुझाव दिया कि भविष्य में ऐसे संवेदनशील विषयों पर निर्णय लेने से पहले संबंधित पक्षों के साथ विस्तृत चर्चा और सहमति बनाने की प्रक्रिया अपनाई जाए, ताकि धार्मिक आस्था, प्रशासनिक व्यवस्था और कानूनी आवश्यकताओं के बीच संतुलन कायम रखा जा सके।




