जालंधर। पंजाब कांग्रेस में जारी अंदरूनी खींचतान और नेताओं के बीच बढ़ते विवाद को लेकर भाजपा नेता रवनीत सिंह बिट्टू ने कांग्रेस पर जोरदार हमला बोला है। बिट्टू ने कहा कि पंजाब कांग्रेस के भीतर चल रहा विवाद अब किसी एक नेता या एक कार्यक्रम तक सीमित नहीं रह गया है, बल्कि पार्टी के सार्वजनिक कार्यक्रमों में भी गुटबाजी खुलकर सामने आने लगी है। उन्होंने कांग्रेस की मौजूदा स्थिति पर व्यंग्य करते हुए कहा कि एक समय टीवी पर सास-बहू के झगड़ों वाले धारावाहिक चर्चा में रहते थे, लेकिन अब पंजाब कांग्रेस के कार्यक्रम ही रोजाना नए एपिसोड पेश कर रहे हैं। उन्होंने दावा किया कि पार्टी के भीतर चल रही यह लड़ाई फिलहाल खत्म होती नज़र नहीं आ रही।
रवनीत सिंह बिट्टू ने पंजाब कांग्रेस अध्यक्ष अमरिंदर सिंह राजा वड़िंग और प्रदेश कांग्रेस प्रभारी भूपेश बघेल पर सीधे निशाना साधते हुए कहा कि दोनों नेताओं के कार्यक्रमों में पार्टी कार्यकर्ताओं का उत्साह दिखाई देने के बजाय विरोध और नाराजगी के मामले सामने आ रहे हैं। उन्होंने कहा कि कांग्रेस जहां भी कार्यक्रम आयोजित कर रही है, वहां किसी न किसी रूप में पार्टी की अंदरूनी कलह सार्वजनिक हो रही है। कहीं एक नेता के समर्थन में नारे लग रहे हैं तो कहीं दूसरे नेताओं के खिलाफ आवाजें उठ रही हैं। बिट्टू ने कहा कि जिस पार्टी के कार्यकर्ता और नेता सार्वजनिक मंच पर एक-दूसरे के सामने खड़े दिखाई दें, उसके संगठन की स्थिति पर सवाल उठना स्वाभाविक है।
बिट्टू ने कहा कि जनता द्वारा चुने गए सांसदों और वरिष्ठ नेताओं की पार्टी के कार्यक्रमों में जिस तरह बेइज्जती हो रही है, उससे कांग्रेस की छवि को नुकसान पहुंच रहा है। उन्होंने कहा कि राजनीतिक दलों के बीच मतभेद होना सामान्य बात है, लेकिन जब पार्टी के अंदर के विवाद सार्वजनिक मंचों पर पहुंच जाएं और कार्यकर्ता ही अपने नेताओं के खिलाफ नारे लगाने लगें, तो यह संगठन के लिए गंभीर चिंता का विषय बन जाता है। उनके मुताबिक, कांग्रेस को इस स्थिति का समाधान तलाशने के बजाय हर बार विरोधी दलों पर आरोप लगाने से बचना चाहिए।
भाजपा नेता ने कांग्रेस की ओर से लगाए जा रहे उन आरोपों पर भी सवाल उठाया, जिनमें कहा जा रहा है कि पार्टी के कार्यक्रमों में विरोध और नारेबाजी विरोधी दलों की साजिश का हिस्सा है। बिट्टू ने सवाल किया कि अगर कांग्रेस के भीतर सब कुछ ठीक चल रहा है और बाहरी ताकतें ही विवाद पैदा कर रही हैं, तो पार्टी का अपना संगठन ऐसे हालात को रोकने में सफल क्यों नहीं हो पा रहा। उन्होंने कहा कि किसी भी राजनीतिक दल के लिए यह आसान नहीं होता कि बाहरी लोग लगातार उसके कार्यक्रमों में पहुंचकर असंतोष पैदा करें। इसलिए कांग्रेस नेतृत्व को आरोप लगाने से पहले अपनी अंदरूनी व्यवस्था पर भी ध्यान देना चाहिए।
बिट्टू ने ‘गो बैक बघेल’ जैसे पोस्टरों और नारेबाजी का जिक्र करते हुए कहा कि ऐसी घटनाएं इस बात का संकेत हैं कि कांग्रेस के अंदर असंतोष मौजूद है। उन्होंने कहा कि यदि पार्टी के कार्यकर्ता और समर्थक ही अपने प्रभारी के खिलाफ आवाज उठाते हैं तो इसे नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। उनके अनुसार, प्रदेश प्रभारी का काम पार्टी के अलग-अलग नेताओं और गुटों को साथ लेकर चलना होता है, लेकिन यदि उनके कार्यक्रमों में ही विरोध के स्वर सुनाई देने लगें तो पार्टी नेतृत्व को इसकी वजह तलाशनी चाहिए।
उन्होंने दावा किया कि उन्होंने अपने राजनीतिक जीवन में कांग्रेस को काफी करीब से देखा है और पार्टी की कार्यप्रणाली को समझते हैं। बिट्टू ने कहा कि कांग्रेस में गुटबाजी कोई नई बात नहीं है। उन्होंने 2022 के पंजाब विधानसभा चुनाव से पहले पार्टी में चल रही खींचतान का जिक्र करते हुए कहा कि उस समय भी कांग्रेस के नेता अलग-अलग खेमों में बंटे नजर आए थे और आपसी विवाद का सीधा असर पार्टी की चुनावी स्थिति पर पड़ा था। उनके मुताबिक, मौजूदा हालात को देखकर लगता है कि कांग्रेस एक बार फिर उसी तरह के दौर से गुजर रही है।
बिट्टू ने कहा कि कांग्रेस को पिछले चुनावों के अनुभव से सबक लेना चाहिए था, लेकिन पार्टी में एक बार फिर नेताओं के बीच दूरी बढ़ती दिखाई दे रही है। उन्होंने तंज करते हुए कहा कि पहले लोग टीवी पर सास-बहू के विवाद के नए एपिसोड का इंतजार करते थे, लेकिन अब पंजाब कांग्रेस का कोई भी कार्यक्रम ऐसा नहीं गुजरता, जिसमें नया विवाद सामने न आए। उनके अनुसार, कहीं नारेबाजी, कहीं विरोध और कहीं नेताओं के समर्थकों के बीच टकराव पार्टी की अंदरूनी स्थिति को खुद ही उजागर कर रहा है।
भाजपा नेता ने पंजाब कांग्रेस अध्यक्ष राजा वड़िंग पर भी व्यक्तिगत रूप से निशाना साधा। उन्होंने कहा कि लुधियाना के लोगों ने उन्हें भरोसे के साथ लोकसभा चुनाव में चुना था, लेकिन वर्तमान में जिस तरह कांग्रेस के कार्यक्रमों में विवाद सामने आ रहे हैं, उससे पार्टी के वरिष्ठ नेताओं की राजनीतिक छवि प्रभावित हो रही है। बिट्टू ने कहा कि प्रदेश अध्यक्ष होने के नाते राजा वड़िंग की सबसे बड़ी जिम्मेदारी पार्टी के अलग-अलग धड़ों को एकजुट करना और कार्यकर्ताओं में विश्वास पैदा करना है। अगर उनके नेतृत्व में ही पार्टी के कार्यक्रमों में विरोध और गुटबाजी देखने को मिले तो यह नेतृत्व के लिए गंभीर चुनौती है।
उन्होंने कांग्रेस के पिछले प्रदेश अध्यक्षों का भी जिक्र करते हुए कहा कि पहले पार्टी के भीतर मतभेद होने के बावजूद उन्हें सार्वजनिक मंचों पर इस तरह सामने आने से रोकने की कोशिश की जाती थी। मौजूदा समय में स्थिति अलग दिखाई दे रही है। बिट्टू के मुताबिक, अब पार्टी के कार्यक्रमों में ही अलग-अलग गुटों के समर्थक आमने-सामने आ जाते हैं और एक-दूसरे के नेताओं के खिलाफ नारे लगाए जाते हैं। इससे पार्टी कार्यकर्ताओं के बीच भ्रम की स्थिति पैदा होती है और जनता के बीच भी यह संदेश जाता है कि कांग्रेस अपने संगठन को संभालने में मुश्किलों का सामना कर रही है।
बिट्टू ने भूपेश बघेल को लेकर भी तीखी टिप्पणी की। उन्होंने कहा कि पंजाब कांग्रेस के प्रभारी के तौर पर बघेल को पार्टी में समन्वय स्थापित करने और नेताओं को एकजुट करने की जिम्मेदारी दी गई है, लेकिन उनके कार्यक्रमों में ही यदि विरोध के मामले सामने आ रहे हैं तो कांग्रेस नेतृत्व को इस पर गंभीरता से विचार करना चाहिए। उन्होंने कहा कि उन्होंने अपने राजनीतिक जीवन में किसी पार्टी के राष्ट्रीय स्तर के पदाधिकारी या प्रदेश प्रभारी की ऐसी स्थिति नहीं देखी, जैसी आज पंजाब कांग्रेस प्रभारी के सामने दिखाई दे रही है।
पंजाब कांग्रेस के भीतर पूर्व मुख्यमंत्री एवं सांसद चरणजीत सिंह चन्नी के समर्थकों की सक्रियता का भी मामला चर्चा में है। कई स्थानों पर चन्नी के समर्थन में नारे लगाए जाने और कुछ कार्यक्रमों में कांग्रेस के मौजूदा नेतृत्व के खिलाफ आवाज उठने के बाद पार्टी के अंदर चल रही खेमेबाजी को लेकर राजनीतिक चर्चाएं तेज हुई हैं। बिट्टू ने इन घटनाओं को कांग्रेस की अंदरूनी कमजोरी से जोड़ते हुए कहा कि यदि पार्टी अपने नेताओं और कार्यकर्ताओं को एक मंच पर नहीं ला पाती तो इसका फायदा विपक्षी दलों को मिलेगा।
हालांकि कांग्रेस की ओर से लगातार यह कहा जा रहा है कि पार्टी को कमजोर करने के लिए विरोधी दल जानबूझकर ऐसा माहौल तैयार करने की कोशिश कर रहे हैं। कांग्रेस के कुछ नेताओं का आरोप है कि नारेबाजी और विरोध के पीछे राजनीतिक विरोधियों की भूमिका हो सकती है। पार्टी का कहना है कि विरोधी दल कांग्रेस की बढ़ती सक्रियता से परेशान हैं और इसलिए संगठन के कार्यक्रमों में व्यवधान पैदा करने की कोशिश कर रहे हैं।
वहीं विपक्ष इस दलील को स्वीकार करने के लिए तैयार नहीं है। भाजपा नेताओं का कहना है कि यदि कांग्रेस का संगठन मजबूत है और नेतृत्व का कार्यकर्ताओं पर पूरा प्रभाव है तो बाहरी लोगों के लिए पार्टी के कार्यक्रमों में लगातार विरोध पैदा करना आसान नहीं होना चाहिए। बिट्टू ने भी इसी मुद्दे को उठाते हुए कहा कि कांग्रेस हर बार विरोधियों को जिम्मेदार बताकर अपनी संगठनात्मक कमियों से बच नहीं सकती। उन्होंने कहा कि पार्टी को यह देखना चाहिए कि उसके अपने कार्यकर्ताओं में नाराजगी क्यों पैदा हो रही है और अलग-अलग नेताओं के समर्थक एक-दूसरे के खिलाफ क्यों खड़े हो रहे हैं।
राजनीतिक जानकारों के मुताबिक, पंजाब कांग्रेस के लिए मौजूदा समय में सबसे बड़ी चुनौती संगठन के भीतर एकजुटता कायम करना है। पंजाब की राजनीति में कांग्रेस का मजबूत आधार रहा है और पार्टी के पास कई बड़े चेहरे भी हैं, लेकिन अलग-अलग नेताओं के बीच मतभेद और गुटीय राजनीति उसकी चुनावी क्षमता को प्रभावित कर सकती है। यदि पार्टी के वरिष्ठ नेता एक-दूसरे के साथ मंच साझा करते हुए भी अपने समर्थकों को एकजुट नहीं कर पाते तो जमीनी स्तर पर कार्यकर्ताओं में असमंजस की स्थिति पैदा होना स्वाभाविक है।
आने वाले चुनावों को देखते हुए कांग्रेस के लिए यह और महत्वपूर्ण हो जाता है कि वह अपने संगठन में अनुशासन और समन्वय कायम करे। लगातार सार्वजनिक विवादों से पार्टी को केवल राजनीतिक नुकसान ही नहीं होता, बल्कि विरोधी दलों को भी कांग्रेस के खिलाफ माहौल बनाने के लिए लगातार नए मुद्दे मिलते रहते हैं। भाजपा पहले से ही कांग्रेस की गुटबाजी को लेकर हमलावर है और बिट्टू का ताजा बयान इसी राजनीतिक रणनीति को आगे बढ़ाता दिखाई दे रहा है।
फिलहाल पंजाब कांग्रेस में चल रहे विवाद को लेकर कांग्रेस और भाजपा के बीच जुबानी जंग तेज हो गई है। कांग्रेस जहां इसे विरोधियों की साजिश बताकर खारिज कर रही है, वहीं भाजपा इसे पार्टी के भीतर मौजूद वास्तविक असंतोष का नतीजा बता रही है। रवनीत सिंह बिट्टू ने जिस तरह सास-बहू के धारावाहिक से कांग्रेस की अंदरूनी राजनीति की तुलना की है, उससे यह स्पष्ट है कि भाजपा आने वाले दिनों में कांग्रेस की गुटबाजी को बड़ा राजनीतिक मुद्दा बनाने की तैयारी में है। अब देखना यह होगा कि कांग्रेस नेतृत्व अपने नेताओं और कार्यकर्ताओं के बीच बढ़ती दूरी को किस तरह कम करता है और सार्वजनिक मंचों पर सामने आ रहे विरोध के सिलसिले को रोकने के लिए क्या कदम उठाता है।




