देश में फिर गरमाया NRC का मुद्दा, RSS ने कहा- हर नागरिक की पहचान स्पष्ट होनी चाहिए

देश में फिर गरमाया NRC का मुद्दा, RSS ने कहा- हर नागरिक की पहचान स्पष्ट होनी चाहिए

देश में वोटर लिस्ट के विशेष गहन पुनरीक्षण यानी SIR और Census 2027 को लेकर चल रही बहस के बीच राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) ने एक बार फिर पूरे देश में नेशनल रजिस्टर ऑफ सिटिजन्स (NRC) लागू करने की मांग उठाई है। RSS के अखिल भारतीय प्रचार प्रमुख सुनील आंबेकर ने दिल्ली में आयोजित एक कार्यक्रम के दौरान कहा कि देश में यह स्पष्ट होना आवश्यक है कि कौन भारतीय नागरिक है और कौन भारतीय नागरिक नहीं है। उनके मुताबिक मतदाता सूची में यदि किसी ऐसे व्यक्ति का नाम शामिल है जो भारतीय नागरिक नहीं है, तो उसकी पहचान की जानी चाहिए। आंबेकर ने यह भी कहा कि नागरिकता से जुड़े मामलों को केवल राजनीतिक बहस के रूप में देखने के बजाय देश की एकता, अखंडता और सुरक्षा के संदर्भ में समझने की जरूरत है।

आंबेकर का यह बयान ऐसे समय आया है जब देश में मतदाता सूचियों के SIR को लेकर राजनीतिक बहस चल रही है और Census 2027 की तैयारियां भी आगे बढ़ रही हैं। RSS की ओर से NRC की मांग नई नहीं है, लेकिन मौजूदा परिस्थितियों में इस मुद्दे को फिर सामने लाए जाने से नागरिकता, मतदाता सूची और जनसंख्या से जुड़े सवालों पर चर्चा तेज हो गई है। आंबेकर ने कहा कि अगर NRC की प्रक्रिया को लेकर किसी व्यक्ति या संगठन को आपत्ति है तो उसके लिए न्यायिक और कानूनी रास्ते उपलब्ध हैं। उनका कहना था कि केवल राजनीतिक वजहों से किसी ऐसे व्यक्ति को भारतीय नागरिक मानना उचित नहीं होगा जिसकी नागरिकता को लेकर सवाल मौजूद हैं।

वोटर लिस्ट में गलत तरीके से शामिल नामों की पहचान पर जोर

RSS नेता ने मतदाता सूची को लेकर भी अपनी बात रखी। उन्होंने कहा कि चुनावी सूची में ऐसे लोगों की पहचान जरूरी है जो भारतीय नागरिक नहीं हैं लेकिन किसी तरह मतदाता सूची में शामिल हो गए हैं। उनके मुताबिक नागरिकता और मतदान के अधिकार का आपस में सीधा संबंध है, इसलिए यह सुनिश्चित किया जाना चाहिए कि मतदाता सूची में केवल पात्र नागरिकों के नाम ही रहें। यह मुद्दा मौजूदा SIR प्रक्रिया के बीच और महत्वपूर्ण हो गया है, क्योंकि विभिन्न राज्यों में मतदाता सूची के सत्यापन और संशोधन को लेकर राजनीतिक दलों के बीच मतभेद देखने को मिल रहे हैं।

आंबेकर ने नागरिकता संशोधन अधिनियम यानी CAA का भी जिक्र किया। उन्होंने कहा कि पड़ोसी देशों से भारत आए ऐसे लोग जो CAA के तहत नागरिकता पाने के पात्र हैं, उन्हें नागरिकता दिए जाने की प्रक्रिया आगे बढ़नी चाहिए। उनके अनुसार नागरिकता के पात्र लोगों की पहचान और गैर-नागरिकों की पहचान को अलग-अलग तरीके से देखा जाना चाहिए। यानी एक तरफ पात्र लोगों को कानूनी प्रक्रिया के तहत नागरिकता देने और दूसरी तरफ नागरिकता की स्थिति स्पष्ट करने की जरूरत है।

जनसंख्या में बदलाव को लेकर RSS ने फिर उठाया सवाल

अपने संबोधन में आंबेकर ने भारत में बदलते जनसांख्यिकीय स्वरूप का मुद्दा भी उठाया। उन्होंने जनसंख्या में बदलाव को ऐतिहासिक घटनाओं से जोड़ते हुए 1947 के विभाजन का संदर्भ दिया। उनका तर्क था कि भारत का विभाजन धर्म और जनसंख्या से जुड़े सवालों के बीच हुआ था, इसलिए देश में जनसंख्या संतुलन को केवल सांप्रदायिक बहस के नजरिए से नहीं देखा जाना चाहिए। उन्होंने इसे भारत की सांस्कृतिक पहचान, राष्ट्रीय एकता और सुरक्षा से जोड़कर देखने की बात कही।

आंबेकर ने यह भी कहा कि देश की जनसंख्या में होने वाले बदलावों के प्रभाव पर गंभीर चर्चा होनी चाहिए। उन्होंने इस विषय को लेकर राजनीतिक दलों से अपील की कि संवेदनशील राष्ट्रीय मुद्दों को केवल राजनीतिक लाभ या चुनावी बहस का हिस्सा न बनाया जाए। RSS की ओर से रखे गए इस दृष्टिकोण में जनसंख्या, नागरिकता और राष्ट्रीय सुरक्षा को एक-दूसरे से जुड़े मुद्दों के रूप में पेश किया गया।

कानून सबके लिए एक जैसा होने की बात

कार्यक्रम में आंबेकर ने अलग-अलग समुदायों पर लागू होने वाले कानूनी प्रावधानों का भी उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि देश में कानून का आधार समान होना चाहिए और नागरिकों के लिए अलग-अलग कानूनी मानकों को लेकर सवाल उठते हैं तो उन पर चर्चा जरूरी है। उन्होंने विवाह और बहुविवाह से जुड़े कानूनों का संदर्भ देते हुए संविधान के अनुच्छेद 29 और 30 का भी उल्लेख किया। इसके अलावा उन्होंने स्थानीय निकाय चुनावों में जनसंख्या नियंत्रण से संबंधित कुछ राज्यों के प्रावधानों का जिक्र किया।

उनका कहना था कि आजादी के बाद देश में अलग-अलग क्षेत्रों और समुदायों से जुड़े कानून बनाए गए और समय के साथ उनके प्रभावों का मूल्यांकन भी होना चाहिए। RSS की ओर से इस तरह के मुद्दों को लंबे समय से समान कानून और समान नागरिक अधिकारों से जुड़ी बहस के हिस्से के रूप में उठाया जाता रहा है।

पड़ोसी देशों से आने वाले कमजोर वर्गों का भी जिक्र

आंबेकर ने पड़ोसी देशों से भारत आने वाले लोगों के मुद्दे पर भी अपनी बात रखी। उन्होंने विशेष रूप से उन लोगों का जिक्र किया जिन्हें CAA के तहत भारतीय नागरिकता हासिल करने की पात्रता है। उन्होंने कहा कि ऐसे लोगों की स्थिति स्पष्ट होनी चाहिए और जो कानूनी रूप से नागरिकता पाने के योग्य हैं, उन्हें नागरिकता मिलने का रास्ता मिलना चाहिए।

उन्होंने पड़ोसी देशों में रहने वाले अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति और आर्थिक रूप से कमजोर वर्गों के लोगों की स्थिति पर भी ध्यान देने की बात कही। उनके मुताबिक यदि वहां इन समुदायों के लोगों के साथ उत्पीड़न या भेदभाव होता है तो उस विषय पर भी गंभीरता से विचार किया जाना चाहिए। इस तरह आंबेकर ने NRC और CAA को अलग-अलग प्रक्रियाओं के रूप में देखने की बात रखी, जिसमें एक ओर नागरिकता की पहचान और दूसरी ओर पात्र लोगों को नागरिकता देने का सवाल शामिल है।

अवैध प्रवास पर पुरानी व्यवस्था का भी सवाल

RSS प्रचार प्रमुख ने भारत में अवैध प्रवास के मुद्दे पर पुरानी नीतियों का भी उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि इस समस्या को लंबे समय तक पर्याप्त गंभीरता से नहीं लिया गया। अपने संबोधन में उन्होंने 1983 के Illegal Migrants (Determination by Tribunals) Act का संदर्भ दिया। यह कानून असम में अवैध प्रवासियों की पहचान से संबंधित था और बाद में सुप्रीम कोर्ट ने इसे असंवैधानिक करार देते हुए रद्द कर दिया था।

आंबेकर के अनुसार नागरिकता से जुड़े मामलों को स्पष्ट करने के लिए प्रभावी कानूनी प्रक्रिया आवश्यक है। उनका कहना था कि किसी व्यक्ति की नागरिकता को लेकर विवाद होने की स्थिति में राजनीतिक बयानबाजी के बजाय निर्धारित कानूनी प्रक्रिया के माध्यम से मामले का समाधान किया जाना चाहिए।

RSS पहले भी NRC की मांग करता रहा है

देशभर में NRC लागू करने की मांग RSS की ओर से पहले भी कई बार उठाई जा चुकी है। वर्ष 2019 में तत्कालीन RSS महासचिव सुरेश भैयाजी जोशी ने भी भारतीय नागरिक नहीं होने वाले लोगों की पहचान के लिए NRC की आवश्यकता की बात कही थी। इसके बाद नागरिकता संशोधन कानून और प्रस्तावित NRC को लेकर 2019-20 के दौरान देश के कई हिस्सों में बड़े स्तर पर विरोध प्रदर्शन हुए थे।

उस समय NRC को लेकर केंद्र सरकार की ओर से भी कई बयान सामने आए थे। दिसंबर 2019 में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कहा था कि उनकी सरकार ने सत्ता में आने के बाद देशभर में NRC पर कोई चर्चा नहीं की है। वहीं 2024 के लोकसभा चुनाव के दौरान BJP के घोषणापत्र में भी देशव्यापी NRC को अलग से प्रमुख चुनावी वादे के रूप में शामिल नहीं किया गया था।

Census 2027 के बीच NRC की चर्चा क्यों बढ़ी?

NRC की नई मांग को Census 2027 और मतदाता सूची के SIR के मौजूदा संदर्भ से अलग करके नहीं देखा जा सकता। केंद्र सरकार ने Census 2027 के लिए आधिकारिक प्रक्रिया शुरू कर दी है। सरकारी रिकॉर्ड के अनुसार जनगणना का पहला चरण हाउस लिस्टिंग और हाउसिंग से जुड़ा रहा है, जबकि दूसरे चरण में जनसंख्या गणना की प्रक्रिया निर्धारित की गई है। सितंबर 2026 में सरकार ने पंजाब, उत्तर प्रदेश, गोवा और उत्तराखंड के गैर-बर्फीले क्षेत्रों में जनसंख्या गणना से जुड़ी अधिसूचनाएं भी जारी की हैं।

हालांकि, जनगणना और NRC एक ही प्रक्रिया नहीं हैं। जनगणना का मुख्य उद्देश्य देश की आबादी से संबंधित सामाजिक, आर्थिक और जनसांख्यिकीय आंकड़े जुटाना है, जबकि NRC का उद्देश्य भारतीय नागरिकों का आधिकारिक रजिस्टर तैयार करना है। इसलिए Census 2027 की प्रक्रिया शुरू होने का मतलब अपने आप यह नहीं है कि देशभर में NRC भी लागू किया जा रहा है।

अभी देशव्यापी NRC पर क्या स्थिति है?

मौजूदा स्थिति में देशभर में NRC लागू करने को लेकर केंद्र सरकार की ओर से कोई नई अलग अधिसूचना सामने नहीं आई है। वहीं Census 2027 को लेकर आधिकारिक अधिसूचनाएं और तैयारियां जारी हैं। यही वजह है कि RSS की ओर से NRC की मांग उठाए जाने के बाद इस मुद्दे पर राजनीतिक और सार्वजनिक बहस फिर तेज हुई है।

फिलहाल NRC को लेकर दो अलग पहलुओं को समझना जरूरी है। पहला, RSS और उसके नेताओं की ओर से देशव्यापी NRC की मांग लगातार उठाई जाती रही है। दूसरा, केंद्र सरकार की ओर से Census 2027 की प्रक्रिया आधिकारिक रूप से आगे बढ़ रही है, लेकिन Census की मौजूदा प्रक्रिया को अपने आप देशव्यापी NRC लागू करने की घोषणा नहीं माना जा सकता। ऐसे में आने वाले समय में नागरिकता की पहचान, मतदाता सूची के सत्यापन, CAA और जनगणना से जुड़े मुद्दे एक-दूसरे से जुड़े राजनीतिक और कानूनी विषय बने रह सकते हैं।