मोहाली में अंतरराष्ट्रीय प्लास्टिक एक्शन समिट में छह प्रमुख शहरों के कचरे का ऑडिट पेश, 7 हजार किलो नमूनों की जांच; वैज्ञानिक प्रबंधन, पुनर्चक्रण और पारदर्शी निगरानी पर जोर
पंजाब में प्लास्टिक प्रदूषण की समस्या से निपटने के लिए अब केवल कचरा उठाने और सफाई अभियान चलाने के बजाय प्लास्टिक उत्पाद बनाने वाली कंपनियों की जवाबदेही तय करने तथा कचरे के वैज्ञानिक प्रबंधन पर जोर दिया जा रहा है। इसी दिशा में पंजाब प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (पीपीसीबी) की ओर से मोहाली स्थित एमिटी यूनिवर्सिटी में आयोजित इंटरनेशनल पंजाब प्लास्टिक एक्शन समिट-2026 में छह प्रमुख शहरों में किए गए प्लास्टिक कचरे के ब्रांड ऑडिट के निष्कर्ष साझा किए गए। ऑडिट के दौरान करीब 7,000 किलोग्राम नमूना कचरे की जांच की गई, जिसमें लगभग 12 हजार पैकेटों को 231 कंपनियों के ब्रांड से जोड़ा गया।
ऑडिट के निष्कर्षों ने इस्तेमाल के बाद फेंके जाने वाले ब्रांडेड प्लास्टिक पैकेजिंग कचरे के प्रबंधन में कंपनियों की जिम्मेदारी तय करने की आवश्यकता को सामने रखा। समिट में इस बात पर चर्चा हुई कि प्लास्टिक उत्पादों की बिक्री से लेकर उनके इस्तेमाल के बाद पैदा होने वाले कचरे के संग्रह, पुनर्चक्रण और सुरक्षित निस्तारण तक की व्यवस्था को अधिक प्रभावी बनाया जाना चाहिए। इसके लिए सरकार, उत्पादक कंपनियों, संस्थानों और आम नागरिकों की संयुक्त भागीदारी को जरूरी बताया गया।
कार्यक्रम में पंजाब के मुख्य सचिव केएपी सिन्हा, पंजाब विकास आयोग की उपाध्यक्ष सीमा बंसल, पर्यावरण एवं जलवायु परिवर्तन निदेशक डॉ. शैलेंद्र कौर, एलायंस टू एंड प्लास्टिक वेस्ट और विश्व बैंक के प्रतिनिधियों सहित विभिन्न क्षेत्रों के विशेषज्ञ शामिल हुए। समिट में प्लास्टिक प्रदूषण से निपटने के लिए नीतिगत बदलाव, तकनीकी सहयोग और जमीनी स्तर पर कचरा प्रबंधन की चुनौतियों पर विचार-विमर्श किया गया।
कागजी अनुपालन के बजाय जमीन पर दिखने चाहिए परिणाम
मुख्य सचिव केएपी सिन्हा ने कहा कि चिप्स, बिस्कुट और अन्य रोजमर्रा के उपभोक्ता उत्पादों की पैकिंग में इस्तेमाल होने वाले मल्टी-लेयर प्लास्टिक (एमएलपी) का कबाड़ बीनने वालों के लिए बहुत कम या कोई आर्थिक मूल्य नहीं होता। इसी कारण इस तरह का कचरा अक्सर सड़कों, सार्वजनिक स्थानों और अन्य खुले क्षेत्रों में पड़ा रहता है। इससे सफाई व्यवस्था पर दबाव बढ़ता है और पर्यावरण प्रदूषण की समस्या भी गंभीर होती है।
उन्होंने प्लास्टिक कचरे के प्रबंधन में नियमों के अनुपालन और वास्तविक स्थिति के बीच अंतर को दूर करने की आवश्यकता पर जोर दिया। समिट में चर्चा हुई कि कंपनियों की ओर से पुनर्चक्रण संबंधी दायित्व पूरे किए जाने के दावों और संबंधित क्षेत्रों में दिखाई देने वाले कचरे की स्थिति के बीच बेहतर तालमेल होना चाहिए।
विशेषज्ञों के अनुसार, प्लास्टिक कचरे की समस्या का समाधान केवल उसके संग्रह तक सीमित नहीं रह सकता। यह भी जरूरी है कि कचरे को सही तरीके से अलग किया जाए, पुनर्चक्रण योग्य सामग्री को प्रसंस्करण इकाइयों तक पहुंचाया जाए और ऐसी सामग्री का सुरक्षित निस्तारण हो, जिसका पुनर्चक्रण व्यावहारिक रूप से संभव नहीं है।
ईपीआर व्यवस्था में पारदर्शिता की जरूरत
समिट में विस्तारित उत्पादक उत्तरदायित्व (ईपीआर) व्यवस्था के क्रियान्वयन पर भी चर्चा हुई। इस व्यवस्था के तहत प्लास्टिक पैकेजिंग बनाने या उसका इस्तेमाल करने वाली संबंधित कंपनियों पर इस्तेमाल के बाद पैदा होने वाले प्लास्टिक कचरे के प्रबंधन की जिम्मेदारी तय की जाती है।
मौजूदा व्यवस्था में कंपनियां देश के दूसरे हिस्सों में प्रसंस्कृत प्लास्टिक कचरे के प्रमाणपत्रों के माध्यम से भी अपने दायित्व पूरे कर सकती हैं। ऐसे में यह सुनिश्चित करना महत्वपूर्ण है कि जिन राज्यों में उत्पादों की खपत होती है, वहां पैदा होने वाले कचरे का प्रबंधन भी प्रभावी तरीके से हो।
समिट में इस बात पर जोर दिया गया कि कंपनियों के दावों की पारदर्शी निगरानी होनी चाहिए और कचरे के वास्तविक संग्रह तथा प्रसंस्करण की स्थिति को समझने के लिए स्थानीय स्तर पर उपलब्ध आंकड़ों का इस्तेमाल किया जाना चाहिए। छह शहरों में किए गए ब्रांड ऑडिट को इसी दिशा में महत्वपूर्ण कदम के रूप में देखा गया, क्योंकि इससे फेंके गए पैकेटों को संबंधित कंपनियों के ब्रांड से जोड़ने में मदद मिली।
करीब 7,000 किलोग्राम नमूना कचरे और लगभग 12 हजार पैकेटों की जांच से यह भी संकेत मिला कि प्लास्टिक प्रदूषण की समस्या से निपटने के लिए कचरे की पहचान, जिम्मेदारी का निर्धारण और उसके निस्तारण की निगरानी एक-दूसरे से जुड़ी प्रक्रियाएं हैं।
संग्रह से लेकर निस्तारण तक तकनीक का इस्तेमाल
समिट में प्लास्टिक कचरे के संग्रह, पृथक्करण, पुनर्चक्रण और प्रसंस्करण के लिए आधुनिक तकनीक अपनाने पर चर्चा हुई। विशेषज्ञों ने टिकाऊ विकल्पों को बढ़ावा देने और ऐसी व्यवस्थाएं विकसित करने की आवश्यकता पर जोर दिया, जिनसे प्लास्टिक कचरे का पर्यावरण पर पड़ने वाला प्रभाव कम किया जा सके।
एलायंस टू एंड प्लास्टिक वेस्ट ने पंजाब में प्लास्टिक कचरा प्रबंधन को बेहतर बनाने के लिए तकनीकी और वित्तीय सहायता की संभावनाएं तलाशने की प्रतिबद्धता जताई। इससे राज्य में कचरे के संग्रह और प्रसंस्करण से जुड़ी व्यवस्थाओं को मजबूत करने के प्रयासों को सहयोग मिलने की उम्मीद है।
तकनीक आधारित व्यवस्था के माध्यम से कचरे की पहचान, उसकी श्रेणी के अनुसार अलग-अलग संग्रह और पुनर्चक्रण योग्य सामग्री को उचित स्थान तक पहुंचाने की प्रक्रिया अधिक प्रभावी बनाई जा सकती है। इसके साथ ही स्थानीय निकायों, कचरा संग्रह करने वाले कर्मचारियों और अन्य संबंधित पक्षों के बीच समन्वय भी महत्वपूर्ण रहेगा।
विशेष रूप से मल्टी-लेयर प्लास्टिक जैसी सामग्री के लिए बेहतर समाधान तलाशने की जरूरत है, क्योंकि इसका आर्थिक मूल्य कम होने के कारण इसे एकत्र करने के लिए प्रोत्साहन भी सीमित रहता है। ऐसे कचरे को खुले में फेंके जाने से रोकने के लिए संग्रह व्यवस्था के साथ-साथ प्रसंस्करण और सुरक्षित निस्तारण के विकल्प विकसित करना जरूरी है।
मिट्टी, पानी और खाद्य श्रृंखला को सुरक्षित रखना प्राथमिकता
पीपीसीबी की चेयरपर्सन रीना गुप्ता ने कहा कि इस्तेमाल के बाद प्लास्टिक को सुरक्षित तरीके से एकत्र करना, वैज्ञानिक ढंग से प्रसंस्कृत करना और जिम्मेदारी से निस्तारित करना जरूरी है। उन्होंने कहा कि प्लास्टिक मिट्टी और पानी को दूषित न करे तथा खाद्य श्रृंखला में पहुंचकर मानव स्वास्थ्य के लिए खतरा न बने, इसे प्राथमिकता दी जानी चाहिए।
उन्होंने स्पष्ट किया कि प्लास्टिक कचरे के प्रबंधन की जिम्मेदारी केवल सरकार या सफाई कर्मचारियों तक सीमित नहीं रखी जा सकती। उत्पाद बनाने वाली कंपनियों, शैक्षणिक संस्थानों, अन्य संगठनों और आम नागरिकों को भी इसमें सक्रिय भागीदारी निभानी होगी।
प्लास्टिक प्रदूषण कम करने के लिए इस्तेमाल के बाद कचरे को खुले में फेंकने से रोकना और उसे निर्धारित व्यवस्था के तहत एकत्र करना आवश्यक है। यदि कचरे को स्रोत पर ही अलग-अलग किया जाए, तो पुनर्चक्रण योग्य सामग्री को छांटना और उसका उचित प्रसंस्करण करना अधिक आसान हो सकता है।
समिट में इस बात पर भी जोर दिया गया कि जिम्मेदार उपभोग की आदतें विकसित करने और लोगों को प्लास्टिक के पर्यावरणीय प्रभावों के प्रति जागरूक करने से समस्या को कम करने में मदद मिल सकती है। इसके लिए जनभागीदारी और नियमित जागरूकता अभियान अहम भूमिका निभा सकते हैं।
धार्मिक आयोजनों में प्लास्टिक के विकल्प अपनाने की पहल
पीपीसीबी ने राज्य में प्लास्टिक का इस्तेमाल कम करने के लिए धार्मिक स्थलों और आयोजनों में शुरू की गई पहलों की जानकारी भी साझा की। इनमें फतेहगढ़ साहिब में प्लास्टिक मुक्त लंगर, पटियाला के काली माता मंदिर में प्लास्टिक मुक्त प्रसाद और श्री आनंदपुर साहिब में प्लास्टिक मुक्त होला मोहल्ला की पहल शामिल हैं।
इन आयोजनों के दौरान हजारों श्रद्धालुओं ने स्टील और जैव अपघटनीय कटलरी का इस्तेमाल किया। इन प्रयासों का उद्देश्य धार्मिक आयोजनों में एक बार इस्तेमाल होने वाले प्लास्टिक की खपत कम करना और वैकल्पिक सामग्री के उपयोग को बढ़ावा देना है।
धार्मिक स्थलों पर बड़ी संख्या में श्रद्धालुओं के पहुंचने के कारण वहां भोजन, प्रसाद और अन्य गतिविधियों से काफी मात्रा में कचरा पैदा हो सकता है। ऐसे में वैकल्पिक सामग्री अपनाने और कचरे को अलग-अलग एकत्र करने की व्यवस्था से सफाई तथा पर्यावरण संरक्षण के प्रयासों को मदद मिल सकती है।
स्कूलों और कॉलेजों में भी चल रहा अभियान
पीपीसीबी की ओर से पटियाला के स्कूलों और कॉलेजों में प्लास्टिक मुक्त लंच अभियान तथा मल्टी-लेयर प्लास्टिक संग्रह अभियान का पायलट प्रोजेक्ट भी चलाया जा रहा है। इसका उद्देश्य विद्यार्थियों और युवाओं को जिम्मेदार उपभोग, प्लास्टिक के सीमित इस्तेमाल और कचरे को अलग-अलग एकत्र करने के लिए प्रेरित करना है।
शैक्षणिक संस्थानों में ऐसे अभियान चलाने से बच्चों और युवाओं में पर्यावरण संरक्षण से जुड़ी आदतें विकसित की जा सकती हैं। प्लास्टिक पैकेजिंग को सामान्य कचरे से अलग रखने और निर्धारित संग्रह व्यवस्था तक पहुंचाने के प्रति जागरूकता बढ़ाना इस पहल का महत्वपूर्ण हिस्सा है।
समिट में सामने आए निष्कर्षों और विभिन्न पहलों से स्पष्ट है कि पंजाब में प्लास्टिक प्रदूषण से निपटने के लिए कंपनियों की जवाबदेही, पारदर्शी निगरानी, तकनीकी सहयोग और नागरिक भागीदारी पर एक साथ काम करने की जरूरत है। छह शहरों में किया गया ब्रांड ऑडिट इस दिशा में कचरे के स्रोतों की पहचान करने का आधार उपलब्ध कराता है। अब चुनौती इन निष्कर्षों को प्रभावी प्रबंधन, बेहतर पुनर्चक्रण और सुरक्षित निस्तारण की ठोस व्यवस्था में बदलने की होगी।




