पंजाब में मेडिकल नशे के नेटवर्क पर शिकंजा कसने की चुनौती, 20.64 करोड़ की दवाएं जब्त फिर भी सप्लाई चेन तोड़ना मुश्किल

पंजाब में मेडिकल नशे के नेटवर्क पर शिकंजा कसने की चुनौती, 20.64 करोड़ की दवाएं जब्त फिर भी सप्लाई चेन तोड़ना मुश्किल

डेढ़ साल में 16,788 निरीक्षण, 520 केमिस्टों के लाइसेंस निलंबित और 22 रद्द; बड़े सप्लायरों तक पहुंच, मुकदमों के निपटारे और विभागीय जवाबदेही पर उठ रहे सवाल

चंडीगढ़। पंजाब में नशे के खिलाफ लड़ाई अब केवल हेरोइन और सिंथेटिक ड्रग्स की तस्करी तक सीमित नहीं रह गई है। इलाज में इस्तेमाल होने वाली दवाओं का नशे के लिए दुरुपयोग भी सरकार और सुरक्षा एजेंसियों के सामने बड़ी चुनौती बन गया है। ऐसी दवाएं, जो डॉक्टर की सलाह पर मरीजों के उपचार में इस्तेमाल की जाती हैं, जब अवैध तरीके से नशे के बाजार तक पहुंचती हैं तो इसका असर केवल कानून-व्यवस्था पर ही नहीं, बल्कि सार्वजनिक स्वास्थ्य पर भी पड़ता है।

इस समस्या से निपटने के लिए पंजाब के खाद्य एवं औषधि प्रशासन ने निरीक्षण, लाइसेंस संबंधी कार्रवाई और कानूनी मामलों के जरिए निगरानी बढ़ाई है। विभाग के आंकड़ों के अनुसार, 1 अप्रैल 2025 से 30 सितंबर 2026 तक राज्य में 16,788 निरीक्षण किए गए। इस दौरान लाइसेंस प्राप्त और बिना लाइसेंस वाली 214 फर्मों से 20.64 करोड़ रुपये से अधिक मूल्य की दवाएं जब्त की गईं। इसके अलावा 520 केमिस्टों के लाइसेंस निलंबित किए गए और 22 के लाइसेंस रद्द किए गए।

इन कार्रवाइयों के बावजूद मेडिकल नशे की समस्या का स्थायी समाधान केवल छापेमारी और दवाओं की बरामदगी से संभव नहीं है। असली चुनौती उस पूरे नेटवर्क तक पहुंचने की है, जिसके जरिए दवाएं निर्माता या अधिकृत वितरक से निकलकर अवैध विक्रेताओं और नशे के कारोबारियों तक पहुंचती हैं। जब तक इस नेटवर्क की कड़ियां नहीं टूटतीं, तब तक अलग-अलग स्थानों पर कार्रवाई के बावजूद अवैध सप्लाई दोबारा शुरू होने का खतरा बना रहता है।

20.64 करोड़ की दवाएं जब्त, लेकिन आगे की कार्रवाई अहम

खाद्य एवं औषधि प्रशासन के आंकड़े बताते हैं कि राज्य में दवा कारोबार की निगरानी के लिए बड़े स्तर पर निरीक्षण किए गए हैं। निर्धारित अवधि में 214 फर्मों से दवाओं की जब्ती, 520 लाइसेंसों का निलंबन और 22 लाइसेंसों का रद्द होना विभागीय कार्रवाई के प्रमुख संकेतक हैं।

इसी अवधि में 54 अदालती मामले शुरू किए गए, जबकि 35 मामलों में दोषसिद्धि और जुर्माने की कार्रवाई होने की जानकारी दी गई है। जिला अदालतों में 650 मामले लंबित बताए गए हैं। हालांकि, इन आंकड़ों से यह निष्कर्ष निकालना उचित नहीं होगा कि मेडिकल नशे से जुड़े सभी मामलों में कार्रवाई की गति धीमी है या दोषसिद्धि की दर कम है। इसके लिए मामलों की प्रकृति, दर्ज होने का वर्ष, आरोपपत्र, फैसलों और अपीलों से संबंधित विस्तृत जानकारी की जरूरत है।

यह भी स्पष्ट होना जरूरी है कि 35 मामलों में दोषसिद्धि या जुर्माने की कार्रवाई किन मामलों में हुई और क्या वे इसी अवधि में शुरू किए गए 54 मामलों का हिस्सा थे या पहले से लंबित मामलों से संबंधित थे। इसी तरह, 650 लंबित मामलों में कितने मामले मेडिकल नशे या दवाओं की अवैध बिक्री से जुड़े हैं, इसका अलग विवरण उपलब्ध होना चाहिए।

इसलिए कार्रवाई का सही आकलन करने के लिए केवल जब्त दवाओं की कीमत और लाइसेंसों पर की गई कार्रवाई पर्याप्त नहीं है। यह भी देखना होगा कि जांच के बाद कितने मामलों में दोषियों को सजा मिली, कितने आरोपित बरी हुए और कितने मामलों में सबूतों की कमी के कारण कार्रवाई आगे नहीं बढ़ सकी।

सप्लाई चेन तोड़ना क्यों है मुश्किल?

मेडिकल नशे के खिलाफ कार्रवाई में सबसे बड़ी चुनौती दवाओं के वैध और अवैध इस्तेमाल के बीच अंतर करना है। कई दवाएं उपचार के लिए आवश्यक होती हैं, लेकिन उनका गलत इस्तेमाल निर्भरता या नशे की समस्या पैदा कर सकता है। हर ऐसी दवा अपने आप में स्वापक औषधि और मन:प्रभावी पदार्थ अधिनियम (एनडीपीएस एक्ट) के तहत प्रतिबंधित नहीं होती। अलग-अलग दवाओं पर लागू कानूनी प्रावधान भी अलग हो सकते हैं।

ऐसे में किसी दवा की बरामदगी के बाद यह पता लगाना जरूरी होता है कि वह कहां से खरीदी गई, किसने बेची, किस वितरक ने उसकी आपूर्ति की और क्या खरीद-बिक्री के रिकॉर्ड में कोई गड़बड़ी थी। यदि दवा का स्टॉक किसी अधिकृत थोक विक्रेता से आया है तो उसके बिल, स्टॉक रजिस्टर, बैच नंबर और परिवहन से जुड़े रिकॉर्ड की जांच करनी पड़ती है।

कई बार एक मामले में खुदरा विक्रेता तक पहुंचना आसान होता है, लेकिन उसके पीछे मौजूद बड़े आपूर्तिकर्ताओं और वितरण नेटवर्क का पता लगाने में अधिक समय लगता है। दूसरे राज्यों से आने वाली खेपों और ऑनलाइन माध्यमों से दवाओं की बिक्री की निगरानी भी चुनौती बढ़ाती है।

जांच में यह साबित करना जरूरी होता है कि नियमों का उल्लंघन कहां हुआ और इसके लिए कौन जिम्मेदार था। केवल दवा मिल जाने से हर मामले में आपराधिक जिम्मेदारी तय नहीं हो जाती। इसी कारण मजबूत दस्तावेजी साक्ष्य और प्रभावी जांच मेडिकल नशे के नेटवर्क को खत्म करने में अहम भूमिका निभाते हैं।

प्रेगाबालिन पर नियंत्रण के लिए नियमों में बदलाव

पंजाब के स्वास्थ्य मंत्री डॉ. बलबीर सिंह के अनुसार, राज्य सरकार ने केंद्र के सामने शेड्यूल एच के तहत दवाओं के नियमन और ई-फार्मेसी पर नियंत्रण का मुद्दा उठाया है। राज्य सरकार ने अपने स्तर पर आठ प्रकार के दवा फॉर्मूलेशन के स्टॉक और बिक्री पर प्रतिबंधात्मक कदम भी उठाए हैं।

इसी कड़ी में प्रेगाबालिन को लेकर नियामकीय बदलाव महत्वपूर्ण माने जा रहे हैं। उपलब्ध जानकारी के अनुसार, इस दवा को ड्रग्स रूल्स के शेड्यूल एच1 में शामिल करने संबंधी अधिसूचना 12 नवंबर 2026 से लागू होनी निर्धारित है। यह तारीख अभी भविष्य में है, इसलिए इसे लागू हो चुका नियम नहीं माना जाना चाहिए।

प्रेगाबालिन का इस्तेमाल कुछ चिकित्सकीय स्थितियों में किया जाता है। हालांकि, इसके दुरुपयोग और बिना उचित चिकित्सकीय निगरानी के सेवन को लेकर चिंता जताई जाती रही है। शेड्यूल एच1 के तहत आने वाली दवाओं की बिक्री और रिकॉर्ड संबंधी आवश्यकताएं सामान्य रूप से अधिक सख्त होती हैं। इससे दवा की बिक्री पर निगरानी बढ़ाने और उसके स्रोत का पता लगाने में मदद मिल सकती है।

लेकिन नियमों में बदलाव का वास्तविक असर इस बात पर निर्भर करेगा कि दवा विक्रेता उनका पालन कितना करते हैं, निरीक्षण कितने प्रभावी होते हैं और उल्लंघन सामने आने पर कितनी तेजी से कार्रवाई की जाती है। नियमन के साथ-साथ डॉक्टरों, फार्मासिस्टों और मरीजों को भी दवाओं के सुरक्षित इस्तेमाल के प्रति जागरूक करना जरूरी है।

विभागीय भ्रष्टाचार के आरोपों की जांच भी जरूरी

मेडिकल नशे के नेटवर्क पर प्रभावी कार्रवाई के लिए विभागीय निगरानी व्यवस्था की विश्वसनीयता भी महत्वपूर्ण है। यदि किसी अधिकारी या कर्मचारी पर अवैध दवा कारोबार में मदद करने का आरोप लगता है तो उसकी निष्पक्ष जांच होनी चाहिए। हालांकि, किसी व्यक्ति की गिरफ्तारी या उस पर लगाए गए आरोपों को दोषसिद्धि नहीं माना जा सकता।

सितंबर 2024 में पंजाब पुलिस की एंटी-नारकोटिक्स टास्क फोर्स ने ड्रग इंस्पेक्टर शिशन मित्तल को मोहाली के एयरोसिटी क्षेत्र से गिरफ्तार किया था। पुलिस के मुताबिक, आरोप था कि वह अवैध फार्मास्यूटिकल दवाओं, मेडिकल स्टोरों और नशे के कारोबार से जुड़े नेटवर्क की मदद कर रहा था।

पुलिस ने उस समय उससे संबंधित 24 बैंक खातों में 7.09 करोड़ रुपये फ्रीज करने, दो लॉकर जब्त करने और छापों के दौरान नकदी, सोना तथा विदेशी मुद्रा मिलने की जानकारी दी थी। इन आरोपों और बरामदगी से संबंधित तथ्यों का अंतिम कानूनी निष्कर्ष जांच और न्यायिक प्रक्रिया के आधार पर ही निकाला जा सकता है।

यह मामला इस बात की ओर ध्यान दिलाता है कि मेडिकल नशे के खिलाफ लड़ाई में केवल दवा विक्रेताओं की जांच पर्याप्त नहीं है। नियामकीय व्यवस्था के भीतर संभावित अनियमितताओं की शिकायतों की भी जांच होनी चाहिए। साथ ही, विभागीय कार्रवाई के मामलों में पारदर्शिता बनाए रखना जरूरी है, ताकि ईमानदारी से काम करने वाले अधिकारियों और कर्मचारियों का भरोसा कायम रहे।

ड्रग अधिकारी नेहा शौरी की हत्या ने उठाए थे गंभीर सवाल

पंजाब में अवैध दवा बिक्री के खिलाफ कार्रवाई करने वाले अधिकारियों की सुरक्षा का सवाल भी पहले उठ चुका है। 29 मार्च 2019 को ड्रग अधिकारी नेहा शौरी की खरड़ स्थित कार्यालय में गोली मारकर हत्या कर दी गई थी। इस घटना ने दवा नियमन से जुड़े अधिकारियों की सुरक्षा और अवैध कारोबार के खिलाफ कार्रवाई के दौरान पैदा होने वाले जोखिमों को लेकर गंभीर चिंता पैदा की थी।

अक्टूबर 2026 में मानसा में नशे के खिलाफ अभियान चलाने वाले परविंदर सिंह झोटा की भी गोली मारकर हत्या कर दी गई। वह मेडिकल स्टोरों पर कथित तौर पर नशीली दवाओं की बिक्री के खिलाफ आवाज उठा रहे थे।

दोनों घटनाओं की परिस्थितियां अलग थीं और उन्हें एक ही तरह के अपराध के रूप में देखना उचित नहीं होगा। फिर भी, इन घटनाओं ने अवैध बिक्री पर निगरानी रखने वाले लोगों की सुरक्षा और नशे के कारोबार के खिलाफ शिकायत करने वालों को संरक्षण देने की जरूरत को रेखांकित किया है।

ऐसे मामलों में निष्पक्ष जांच, दोषियों के खिलाफ कानूनी कार्रवाई और शिकायतकर्ताओं की सुरक्षा सुनिश्चित करना जरूरी है। इसके साथ ही दवा कारोबार से जुड़े लोगों के लिए शिकायत दर्ज कराने की विश्वसनीय व्यवस्था होनी चाहिए, ताकि अवैध गतिविधियों की जानकारी सामने लाने वालों को डर के माहौल में काम न करना पड़े।

भाजपा ने सरकार की जवाबदेही पर उठाए सवाल

पठानकोट से भाजपा विधायक अश्वनी शर्मा ने मेडिकल दवाओं के दुरुपयोग को रोकने की जिम्मेदारी पंजाब सरकार और उसके स्वास्थ्य विभाग पर डाली है। उनका कहना है कि जब दवाओं की बिक्री और नियमन के लिए पूरे देश में कानून और नियम लागू हैं तो पंजाब में उनके दुरुपयोग को रोकने के लिए राज्य सरकार को भी अपनी जिम्मेदारी निभानी चाहिए।

अश्वनी शर्मा के मुताबिक, स्वास्थ्य विभाग और ड्रग इंस्पेक्टरों को मेडिकल स्टोरों पर प्रभावी निगरानी रखनी चाहिए। नियमों का उल्लंघन करके दवाएं बेचने वालों के खिलाफ ऐसी कार्रवाई होनी चाहिए, जिससे दूसरे विक्रेताओं को भी स्पष्ट संदेश मिले कि अवैध बिक्री बर्दाश्त नहीं की जाएगी।

उन्होंने कहा कि दवाएं मरीजों के उपचार के लिए जरूरी हैं। इसलिए यह सुनिश्चित करना सरकार की जिम्मेदारी है कि उनका इस्तेमाल चिकित्सकीय जरूरत के अनुसार हो, न कि नशे के लिए। उनके अनुसार, पंजाब सरकार को हर मामले में केंद्र सरकार को जिम्मेदार ठहराने के बजाय अपने स्तर पर नियमन और निगरानी की व्यवस्था मजबूत करनी चाहिए।

भाजपा विधायक की यह टिप्पणी राज्य में मेडिकल नशे को लेकर सरकार की जवाबदेही पर राजनीतिक बहस को भी सामने लाती है। हालांकि, प्रभावी नियमन के लिए केंद्र और राज्य सरकारों, औषधि नियंत्रकों, पुलिस तथा अन्य संबंधित एजेंसियों के बीच समन्वय भी जरूरी है।

अब कार्रवाई की असली कसौटी क्या होगी?

पंजाब में मेडिकल नशे के खिलाफ अभियान की सफलता का आकलन केवल इस आधार पर नहीं किया जा सकता कि कितनी दवाएं जब्त हुईं या कितने मेडिकल स्टोरों के लाइसेंस निलंबित किए गए। इसके लिए ऐसे आंकड़े चाहिए, जिनसे पता चले कि अवैध कारोबार के बड़े नेटवर्क तक जांच कितनी पहुंची और उनके खिलाफ कितनी प्रभावी कानूनी कार्रवाई हुई।

सरकार को मेडिकल नशे से संबंधित मामलों, दोषसिद्धि, बरी हुए आरोपितों, लंबित मुकदमों और जांच के दौरान सामने आई कमियों का अलग-अलग विवरण सार्वजनिक करना चाहिए। इससे यह समझने में मदद मिलेगी कि कार्रवाई के किस चरण में सबसे अधिक समस्याएं आ रही हैं।

इसके अलावा, दवाओं के थोक वितरण से लेकर खुदरा बिक्री तक रिकॉर्ड की जांच, ऑनलाइन बिक्री की निगरानी और दूसरे राज्यों से आने वाली खेपों पर नियंत्रण को मजबूत करना होगा। डॉक्टर की पर्ची के बिना प्रतिबंधित तरीके से दवाएं बेचने, फर्जी रिकॉर्ड तैयार करने या स्टॉक का हिसाब छिपाने जैसी अनियमितताओं पर नियमानुसार कार्रवाई जरूरी है।

सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि उपचार में इस्तेमाल होने वाली दवाओं की उपलब्धता प्रभावित किए बिना उनके दुरुपयोग को रोका जाए। इसके लिए सख्त नियमन के साथ जागरूकता, नियमित निरीक्षण और समयबद्ध न्यायिक प्रक्रिया की जरूरत है।

पंजाब में मेडिकल नशे के खिलाफ लड़ाई अब ऐसे मोड़ पर है, जहां केवल बरामदगी के आंकड़े पर्याप्त नहीं होंगे। असली सफलता तभी मानी जाएगी, जब अवैध सप्लाई नेटवर्क की कड़ियां टूटें, जिम्मेदार लोगों को कानून के अनुसार सजा मिले और मरीजों के लिए जरूरी दवाओं का इस्तेमाल सुरक्षित तथा नियंत्रित तरीके से सुनिश्चित हो सके।