पंजाब विधानसभा में नशे पर घमासान, कांग्रेस का वॉकआउट; सुखपाल खैहरा सत्र की शेष अवधि के लिए निलंबित

पंजाब विधानसभा में नशे पर घमासान, कांग्रेस का वॉकआउट; सुखपाल खैहरा सत्र की शेष अवधि के लिए निलंबित

मुख्यमंत्री भगवंत मान के इस्तीफे की मांग को लेकर कांग्रेस विधायकों की नारेबाजी, हरपाल चीमा और परगट सिंह के बीच तीखी बहस; सदन ने सर्वसम्मति से पारित किया निलंबन प्रस्ताव

पंजाब विधानसभा के दूसरे दिन नशे के मुद्दे पर सत्तारूढ़ आम आदमी पार्टी (आप) और कांग्रेस के विधायकों के बीच तीखी बहस देखने को मिली। राज्य में नशे की समस्या और सरकार की कार्रवाई को लेकर कांग्रेस ने सदन में भगवंत मान सरकार को घेरते हुए मुख्यमंत्री के इस्तीफे की मांग की। प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष परगट सिंह, नेता प्रतिपक्ष प्रताप सिंह बाजवा और अन्य कांग्रेस विधायकों ने सरकार के खिलाफ जोरदार नारेबाजी की। देखते ही देखते कांग्रेस विधायक सदन के वेल में पहुंच गए, जिससे कार्यवाही के दौरान तनावपूर्ण स्थिति बन गई।

विधानसभा अध्यक्ष कुलतार सिंह संधवां ने कांग्रेस विधायकों से बार-बार अपील की कि वे नारेबाजी बंद कर सदन की कार्यवाही सुचारू रूप से चलने दें। हालांकि, कांग्रेस विधायकों पर इन अपीलों का कोई खास असर नहीं हुआ। करीब 35 मिनट तक सदन में नारेबाजी और हंगामे का माहौल बना रहा। इसके बाद कांग्रेस विधायकों ने सदन से वॉकआउट कर दिया।

नशे के मुद्दे पर शुरू हुआ यह विरोध जल्द ही सत्ता पक्ष और विपक्ष के बीच राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप में बदल गया। एक तरफ कांग्रेस ने सरकार की कार्यप्रणाली और नशे के खिलाफ कार्रवाई पर सवाल उठाए, वहीं दूसरी तरफ वित्त मंत्री हरपाल सिंह चीमा ने कांग्रेस के पिछले शासनकाल और पंजाब में नशे की समस्या को लेकर उस पर निशाना साधा। इसी हंगामे के बीच कांग्रेस विधायक सुखपाल सिंह खैहरा को सत्र की शेष अवधि के लिए निलंबित करने का प्रस्ताव भी सदन में पेश किया गया, जिसे सर्वसम्मति से पारित कर दिया गया।

नशे के मुद्दे पर सरकार को घेरने उतरी कांग्रेस

विधानसभा की कार्यवाही के दौरान कांग्रेस विधायकों ने पंजाब में नशे की समस्या को प्रमुख मुद्दा बनाते हुए आम आदमी पार्टी सरकार से जवाब मांगा। प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष परगट सिंह और नेता प्रतिपक्ष प्रताप सिंह बाजवा सहित पार्टी के अन्य विधायकों ने सरकार पर निशाना साधते हुए मुख्यमंत्री भगवंत मान के इस्तीफे की मांग की।

कांग्रेस विधायकों का विरोध इतना तेज था कि वे नारेबाजी करते हुए सदन के वेल तक पहुंच गए। इससे सदन की कार्यवाही प्रभावित हुई। विधानसभा अध्यक्ष कुलतार सिंह संधवां ने स्थिति को संभालने की कोशिश करते हुए कांग्रेस सदस्यों से अपनी सीटों पर लौटने और कार्यवाही चलने देने की अपील की।

स्पीकर ने लगातार सदस्यों को सदन की मर्यादा बनाए रखने और प्रश्नकाल को बाधित नहीं करने के लिए कहा। इसके बावजूद कांग्रेस विधायकों ने अपना विरोध जारी रखा। करीब 35 मिनट तक नारेबाजी के बाद कांग्रेस सदस्यों ने सदन से बाहर जाने का फैसला किया।

कांग्रेस के वॉकआउट के बाद सदन की कार्यवाही फिर आगे बढ़ी। हालांकि, इस घटनाक्रम ने पंजाब में नशे की समस्या को लेकर सरकार और विपक्ष के बीच जारी राजनीतिक टकराव को एक बार फिर सामने ला दिया। नशे का मुद्दा राज्य की राजनीति में लंबे समय से संवेदनशील रहा है और विभिन्न राजनीतिक दल इसे लेकर एक-दूसरे पर आरोप लगाते रहे हैं।

हरपाल चीमा और परगट सिंह में तीखी बहस

कांग्रेस के विरोध प्रदर्शन से पहले सदन में वित्त मंत्री हरपाल सिंह चीमा और कांग्रेस विधायक परगट सिंह के बीच तीखी जुबानी जंग देखने को मिली। नशे के मुद्दे पर शुरू हुई बहस के दौरान चीमा ने परगट सिंह के पूर्व राजनीतिक संबंधों का उल्लेख करते हुए उन्हें ‘चिट्टा पार्टी’ का सदस्य कहकर संबोधित किया।

चीमा की इस टिप्पणी के बाद सदन में राजनीतिक माहौल और गर्म हो गया। वित्त मंत्री ने कांग्रेस पर हमला बोलते हुए 1984 के सिख विरोधी दंगों, श्री अकाल तख्त साहिब पर हुए हमले और पंजाब में नशे की समस्या जैसे मुद्दों को उठाया। उन्होंने कांग्रेस के शासनकाल को लेकर सवाल खड़े किए और आरोप लगाया कि पार्टी नशे के मुद्दे पर दोहरे मापदंड अपनाती रही है।

वित्त मंत्री ने कहा कि कांग्रेस के शासनकाल में पंजाब और सिख समुदाय को बहुत कुछ झेलना पड़ा। उन्होंने ऐतिहासिक घटनाओं का उल्लेख करते हुए कांग्रेस की राजनीतिक भूमिका पर सवाल उठाए। चीमा ने शिरोमणि अकाली दल के शासनकाल का भी जिक्र किया और कहा कि नशे के मुद्दे पर कांग्रेस का मौजूदा रुख उसके पूर्व के राजनीतिक आचरण से मेल नहीं खाता।

इस दौरान परगट सिंह और चीमा के बीच बहस ने सदन का माहौल गर्मा दिया। नशे की समस्या पर चर्चा के बजाय राजनीतिक दलों के बीच आरोप-प्रत्यारोप तेज हो गए। कांग्रेस ने जहां मौजूदा सरकार की जवाबदेही तय करने की मांग की, वहीं वित्त मंत्री ने कांग्रेस के पुराने शासनकाल और उसके राजनीतिक इतिहास को बहस के केंद्र में ला दिया।

1984 और नशे के मुद्दे पर कांग्रेस को घेरा

हरपाल सिंह चीमा ने कांग्रेस पर निशाना साधते हुए कहा कि पंजाब और सिख समुदाय को अतीत में कई गंभीर घटनाओं का सामना करना पड़ा है। उन्होंने 1984 के सिख विरोधी दंगों और श्री अकाल तख्त साहिब पर हमले का जिक्र करते हुए कांग्रेस की भूमिका पर सवाल उठाए।

चीमा ने यह भी आरोप लगाया कि कांग्रेस नशे की समस्या को लेकर राजनीतिक लाभ लेने की कोशिश करती है, जबकि उसके शासनकाल में भी यह मुद्दा गंभीर बना रहा। उन्होंने अकाली दल के शासनकाल का उल्लेख करते हुए विपक्षी दलों के रुख को कटघरे में खड़ा किया।

सत्तारूढ़ दल की ओर से उठाए गए इन मुद्दों ने विधानसभा में बहस को ऐतिहासिक और राजनीतिक घटनाओं की ओर मोड़ दिया। इस तरह सदन में नशे के मुद्दे पर सरकार से जवाब मांगने के लिए शुरू हुआ विरोध कांग्रेस और आप के बीच पुराने आरोपों तथा राजनीतिक मतभेदों की बहस में बदल गया।

विपक्ष की ओर से मुख्यमंत्री के इस्तीफे की मांग और सत्ता पक्ष की ओर से कांग्रेस के अतीत पर हमले के कारण सदन में टकराव बढ़ता गया। इसके बाद कांग्रेस विधायकों ने वेल में पहुंचकर नारेबाजी शुरू कर दी।

कांग्रेस के वॉकआउट के बाद भी चलता रहा प्रश्नकाल

कांग्रेस विधायकों के करीब 35 मिनट तक हंगामा करने और बाद में सदन से वॉकआउट करने के बावजूद विधानसभा की कार्यवाही जारी रही। प्रश्नकाल के दौरान सदन में विभिन्न मुद्दों पर चर्चा आगे बढ़ी। इसी बीच वित्त मंत्री हरपाल सिंह चीमा ने कांग्रेस विधायक सुखपाल सिंह खैहरा के कथित असंसदीय व्यवहार को लेकर एक प्रस्ताव पेश किया।

चीमा ने खैहरा को मौजूदा विधानसभा सत्र की शेष अवधि के लिए निलंबित करने का प्रस्ताव सदन के सामने रखा। उन्होंने आरोप लगाया कि विधानसभा अध्यक्ष की ओर से बार-बार चेतावनी दिए जाने के बावजूद खैहरा सदन के वेल में पहुंच गए थे और उन्होंने पीठासीन अध्यक्ष के खिलाफ अभद्र भाषा का इस्तेमाल किया। वित्त मंत्री के अनुसार, इस व्यवहार के कारण सदन की कार्यवाही में बाधा उत्पन्न हुई।

चीमा ने कहा कि विधानसभा लोकतंत्र का महत्वपूर्ण मंच है, जहां जनप्रतिनिधियों से सदन की मर्यादा बनाए रखने की अपेक्षा की जाती है। उनके मुताबिक, किसी सदस्य की ओर से पीठासीन अध्यक्ष के खिलाफ अपमानजनक भाषा का इस्तेमाल करना सदन की गरिमा के विपरीत है।

उन्होंने खैहरा के कथित व्यवहार को लेकर कड़ी आपत्ति जताई और कहा कि विधायकों को अपनी बात रखने का अधिकार है, लेकिन विरोध दर्ज कराने के लिए असंसदीय भाषा का इस्तेमाल स्वीकार नहीं किया जा सकता।

गरीबों, मजदूरों और अनुसूचित जाति समुदाय के अपमान का मुद्दा उठाया

निलंबन प्रस्ताव पेश करते हुए हरपाल सिंह चीमा ने सुखपाल सिंह खैहरा की कथित असंसदीय भाषा को गरीबों, मजदूरों और अनुसूचित जाति समुदाय का अपमान बताया। उन्होंने कहा कि विधायक केवल व्यक्तिगत हैसियत से सदन में नहीं आते, बल्कि वे जनता के चुने हुए प्रतिनिधि होते हैं।

चीमा के अनुसार, जनप्रतिनिधियों की ओर से इस्तेमाल किए जाने वाले शब्दों और व्यवहार का असर व्यापक होता है। उन्होंने तर्क दिया कि यदि कोई विधायक अपमानजनक भाषा का इस्तेमाल करता है, तो इसे केवल किसी एक व्यक्ति के खिलाफ टिप्पणी के रूप में नहीं देखा जा सकता, बल्कि यह उन लोगों की भावनाओं को भी आहत कर सकता है, जिनका प्रतिनिधित्व वह सदस्य करता है।

वित्त मंत्री ने कहा कि सदन की गरिमा बनाए रखना सभी सदस्यों की जिम्मेदारी है। राजनीतिक मतभेद और सरकार के खिलाफ विरोध लोकतांत्रिक व्यवस्था का हिस्सा हैं, लेकिन इनकी अभिव्यक्ति संसदीय नियमों और मर्यादाओं के दायरे में होनी चाहिए।

उन्होंने विधानसभा अध्यक्ष की चेतावनियों के बावजूद कथित तौर पर सदन की कार्यवाही बाधित करने को गंभीर मामला बताते हुए खैहरा के खिलाफ कार्रवाई की आवश्यकता पर जोर दिया।

सर्वसम्मति से पारित हुआ निलंबन प्रस्ताव

हरपाल सिंह चीमा की ओर से पेश किए गए प्रस्ताव में सुखपाल सिंह खैहरा को मौजूदा सत्र की शेष अवधि के लिए निलंबित करने की मांग की गई। सदन में इस प्रस्ताव को सर्वसम्मति से पारित कर दिया गया। इसके साथ ही खैहरा के निलंबन का फैसला विधानसभा की कार्यवाही के दौरान एक प्रमुख घटनाक्रम बन गया।

यह कार्रवाई ऐसे समय हुई, जब सदन में नशे के मुद्दे पर सत्ता पक्ष और विपक्ष के बीच तीखा टकराव चल रहा था। कांग्रेस विधायकों के वॉकआउट के बाद प्रश्नकाल जारी रहने के दौरान निलंबन प्रस्ताव पेश किया गया और उसे पारित कर दिया गया।

इस घटनाक्रम ने विधानसभा के दूसरे दिन की कार्यवाही को राजनीतिक रूप से और अधिक महत्वपूर्ण बना दिया। नशे की समस्या पर सरकार को घेरने के लिए कांग्रेस ने मुख्यमंत्री के इस्तीफे की मांग उठाई, जबकि सत्तारूढ़ दल ने विपक्ष के पुराने शासनकाल और सदन में उसके सदस्यों के कथित व्यवहार पर सवाल खड़े किए।

नशे पर सियासी टकराव ने बढ़ाई विधानसभा की गर्मी

पंजाब विधानसभा के दूसरे दिन की कार्यवाही में नशे का मुद्दा केंद्र में रहा, लेकिन चर्चा के दौरान सत्ता पक्ष और विपक्ष के बीच आरोप-प्रत्यारोप हावी रहे। कांग्रेस ने नशे के खिलाफ सरकार की कार्रवाई पर सवाल उठाते हुए मुख्यमंत्री भगवंत मान के इस्तीफे की मांग की। वहीं, वित्त मंत्री हरपाल सिंह चीमा ने कांग्रेस के शासनकाल, 1984 की घटनाओं और नशे की समस्या को लेकर उसके रुख पर निशाना साधा।

करीब 35 मिनट तक चली नारेबाजी और कांग्रेस के वॉकआउट के बाद सदन की कार्यवाही आगे बढ़ी, लेकिन सुखपाल सिंह खैहरा के निलंबन प्रस्ताव ने राजनीतिक टकराव को एक नया मोड़ दे दिया। प्रस्ताव को सर्वसम्मति से पारित किए जाने के बाद सदन की मर्यादा और विधायकों के आचरण का मुद्दा भी चर्चा में आ गया।

इस पूरे घटनाक्रम से स्पष्ट हुआ कि पंजाब में नशे की समस्या को लेकर सरकार और विपक्ष के बीच राजनीतिक संघर्ष अभी थमने वाला नहीं है। कांग्रेस इस मुद्दे पर सरकार की जवाबदेही तय करने की कोशिश कर रही है, जबकि आप विपक्ष के आरोपों का जवाब उसके पुराने शासनकाल और राजनीतिक भूमिका पर सवाल उठाकर दे रही है। विधानसभा में हुई तीखी बहस ने यह भी दिखाया कि राज्य की राजनीति में नशे का मुद्दा आगामी दिनों में भी महत्वपूर्ण बना रह सकता है।