पूजा में परिक्रमा का नियम: हर देवी-देवता के लिए अलग है संख्या, जानिए सही विधि

पूजा में परिक्रमा का नियम: हर देवी-देवता के लिए अलग है संख्या, जानिए सही विधि

सनातन धर्म में पूजा-पाठ केवल भगवान के सामने प्रार्थना करने तक सीमित नहीं माना जाता। मंदिर में प्रवेश करने से लेकर दर्शन, आरती, प्रसाद ग्रहण करने और परिक्रमा करने तक हर धार्मिक क्रिया का अपना अलग महत्व बताया गया है। इनमें परिक्रमा को विशेष स्थान प्राप्त है। श्रद्धालु जब किसी देवी-देवता या मंदिर के गर्भगृह के चारों ओर घूमते हैं, तो इसे भगवान के प्रति श्रद्धा, समर्पण और आस्था की अभिव्यक्ति माना जाता है।

हिंदू धार्मिक परंपराओं में यह मान्यता प्रचलित है कि मंदिर में स्थापित देवता को जीवन का केंद्र मानकर उनके चारों ओर परिक्रमा करने से मन में सकारात्मक भाव उत्पन्न होते हैं। भक्त अपने अहंकार को पीछे छोड़कर ईश्वर के प्रति समर्पण का भाव रखता है। इसी कारण मंदिर में दर्शन के बाद परिक्रमा करने की परंपरा सदियों से चली आ रही है।

हालांकि, अलग-अलग देवी-देवताओं के लिए परिक्रमा की संख्या और तरीका अलग-अलग बताया जाता है। कई धार्मिक परंपराओं में किसी देवता की एक परिक्रमा, किसी की तीन या चार, तो किसी की सात परिक्रमा करने की मान्यता है। भगवान शिव की पूजा में परिक्रमा की विधि अन्य देवी-देवताओं से अलग मानी जाती है। इसलिए भक्तों के लिए यह जानना उपयोगी होता है कि किस देवता की परिक्रमा किस प्रकार की जाती है।

परिक्रमा का क्या है आध्यात्मिक अर्थ

‘परिक्रमा’ का सामान्य अर्थ किसी पवित्र स्थान या देवता के चारों ओर श्रद्धापूर्वक घूमना है। धार्मिक दृष्टि से इसका भाव केवल चलने की क्रिया नहीं, बल्कि ईश्वर को अपने जीवन का केंद्र स्वीकार करना है। जब भक्त भगवान की परिक्रमा करता है, तो वह प्रतीकात्मक रूप से यह स्वीकार करता है कि उसके जीवन में सर्वोच्च स्थान ईश्वर और उनकी शक्ति का है।

सनातन परंपरा में मंदिर को आध्यात्मिक ऊर्जा का केंद्र माना जाता है। ऐसे में देवता के चारों ओर घूमना भक्त के मन को पूजा और ध्यान की अवस्था में ले जाने का एक माध्यम माना जाता है। परिक्रमा करते समय श्रद्धालु मंत्रों का जाप, भगवान का स्मरण या मन ही मन प्रार्थना कर सकता है।

धार्मिक मान्यताओं के अनुसार परिक्रमा से व्यक्ति के भीतर विनम्रता और श्रद्धा का भाव बढ़ता है। भक्त कुछ समय के लिए सांसारिक चिंताओं से दूर होकर अपना ध्यान ईश्वर पर केंद्रित करता है। यही कारण है कि परिक्रमा को कई लोग मानसिक शांति और आध्यात्मिक एकाग्रता से भी जोड़कर देखते हैं।

परिक्रमा के दौरान किन बातों का ध्यान रखना चाहिए

परिक्रमा करते समय सामान्य रूप से श्रद्धा और शालीनता बनाए रखने की परंपरा है। मंदिर में जिस दिशा में परिक्रमा करने की व्यवस्था हो, उसी दिशा का पालन करना चाहिए। अधिकांश मंदिरों में देवता के चारों ओर दक्षिणावर्त यानी घड़ी की दिशा में परिक्रमा करने की परंपरा देखने को मिलती है।

परिक्रमा के दौरान जल्दबाजी करने के बजाय शांत भाव से भगवान का स्मरण करना अधिक महत्वपूर्ण माना जाता है। मंदिर की संरचना के अनुसार परिक्रमा का मार्ग अलग हो सकता है, इसलिए वहां मौजूद धार्मिक परंपरा और मंदिर के नियमों का पालन करना उचित माना जाता है।

यह भी ध्यान रखना चाहिए कि सभी मंदिरों में परिक्रमा की संख्या एक जैसी नहीं होती। स्थानीय परंपरा, संप्रदाय और मंदिर की पूजा पद्धति के अनुसार इसमें अंतर हो सकता है। इसलिए किसी विशेष मंदिर में वहां के पुजारी या प्रचलित नियमों का पालन करना सबसे उचित तरीका है।

भगवान गणेश की तीन परिक्रमा करने की मान्यता

भगवान गणेश को बुद्धि, विवेक, ज्ञान और शुभारंभ के देवता के रूप में पूजा जाता है। किसी भी शुभ कार्य से पहले गणेश जी का स्मरण करने की परंपरा सनातन धर्म में व्यापक रूप से प्रचलित है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार गणपति की तीन परिक्रमा करना शुभ माना जाता है।

तीन परिक्रमा को कई लोग शरीर, मन और आत्मा के संतुलन से जोड़कर देखते हैं। वहीं कुछ परंपराओं में इसे त्रिदेव या जीवन के विभिन्न आध्यात्मिक आयामों का प्रतीक भी माना जाता है। भक्तों का विश्वास है कि गणेश जी की श्रद्धापूर्वक परिक्रमा करने से बुद्धि और विवेक की प्राप्ति होती है तथा जीवन में आने वाली बाधाओं को दूर करने का आशीर्वाद मिलता है।

गणेश मंदिर में परिक्रमा करते समय भक्त भगवान के मंत्रों का जाप कर सकते हैं और अपने जीवन में सुख, समृद्धि तथा सफलता की प्रार्थना कर सकते हैं।

भगवान विष्णु की चार परिक्रमा का महत्व

भगवान विष्णु को सनातन परंपरा में जगत के पालनकर्ता के रूप में पूजा जाता है। उनके विभिन्न अवतारों में भगवान श्रीराम और भगवान श्रीकृष्ण का विशेष महत्व है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार भगवान विष्णु और उनके प्रमुख अवतारों की चार परिक्रमा करने का विधान कई परंपराओं में बताया गया है।

चार संख्या को हिंदू दर्शन में चार पुरुषार्थों से जोड़ा जाता है। ये हैं धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष। मानव जीवन को संतुलित और सार्थक बनाने के लिए इन चारों पुरुषार्थों को महत्वपूर्ण माना गया है। इसी वजह से भगवान विष्णु की चार परिक्रमा को जीवन के इन चार उद्देश्यों के प्रति संतुलन और समर्पण का प्रतीक माना जाता है।

श्रीराम और श्रीकृष्ण मंदिरों में भी कई भक्त चार परिक्रमा करते हैं। हालांकि, अलग-अलग मंदिरों और संप्रदायों में परिक्रमा की संख्या को लेकर स्थानीय परंपराएं अलग हो सकती हैं।

सूर्य देव की सात परिक्रमा क्यों की जाती है

सूर्य देव को प्रत्यक्ष देवता माना जाता है। प्रतिदिन दिखाई देने वाले सूर्य को ऊर्जा, प्रकाश और जीवन का आधार माना जाता है। भारतीय परंपरा में सूर्य उपासना का विशेष महत्व है और रविवार को सूर्य देव की पूजा करने की परंपरा भी कई स्थानों पर प्रचलित है।

धार्मिक मान्यता के अनुसार सूर्य देव की सात परिक्रमा की जाती है। सात संख्या को सूर्य के सात घोड़ों और सात रंगों से जोड़कर देखा जाता है। भारतीय धार्मिक परंपरा में सूर्य की सात किरणों और सात ऊर्जा स्वरूपों का भी उल्लेख मिलता है।

भक्तों का विश्वास है कि सूर्य देव की पूजा और परिक्रमा से जीवन में ऊर्जा, आत्मविश्वास और सकारात्मकता बढ़ती है। कई लोग सुबह सूर्य को अर्घ्य देने के बाद उनकी आराधना करते हैं और परिक्रमा करते हैं।

हालांकि, स्वास्थ्य से जुड़े किसी लाभ को केवल धार्मिक परंपरा के आधार पर निश्चित चिकित्सा परिणाम के रूप में नहीं देखना चाहिए। सूर्य उपासना मुख्य रूप से आस्था और आध्यात्मिक परंपरा का हिस्सा है।

मां दुर्गा और देवी स्वरूप की एक परिक्रमा

सनातन धर्म में देवी शक्ति के अनेक स्वरूपों की पूजा की जाती है। मां दुर्गा, मां काली, मां लक्ष्मी और मां सरस्वती सहित विभिन्न देवी स्वरूपों की उपासना अलग-अलग विधियों से की जाती है।

कुछ धार्मिक परंपराओं में देवी की एक परिक्रमा करने की मान्यता बताई गई है। इसे पूर्ण श्रद्धा और समर्पण का प्रतीक माना जाता है। भक्त एक परिक्रमा के दौरान देवी के प्रति अपनी आस्था व्यक्त करता है और जीवन में शक्ति, साहस, समृद्धि तथा ज्ञान की कामना करता है।

हालांकि, देवी मंदिरों में परिक्रमा की संख्या स्थानीय परंपरा के अनुसार अलग हो सकती है। इसलिए किसी विशेष शक्तिपीठ या देवी मंदिर में वहां की पूजा पद्धति को प्राथमिकता देना उचित होता है।

भगवान शिव की परिक्रमा अन्य देवताओं से अलग क्यों है

भगवान शिव और शिवलिंग की पूजा में परिक्रमा की परंपरा अन्य देवी-देवताओं से अलग मानी जाती है। सामान्य रूप से शिवलिंग की पूर्ण परिक्रमा करने के बजाय आधी परिक्रमा करने की धार्मिक मान्यता कई शिव मंदिरों में प्रचलित है।

इसका संबंध शिवलिंग के साथ बनी जलाधारी या सोमसूत्र से माना जाता है। शिवलिंग पर चढ़ाया गया जल जिस मार्ग से बाहर निकलता है, उसे धार्मिक दृष्टि से विशेष महत्व दिया जाता है। परंपरा के अनुसार इस स्थान को पार नहीं किया जाता और भक्त वहीं से वापस लौटकर आधी परिक्रमा पूरी करते हैं।

हालांकि, सभी शिव मंदिरों की संरचना एक जैसी नहीं होती। कहीं जल निकासी की दिशा अलग हो सकती है और कहीं मंदिर की वास्तु व्यवस्था भी भिन्न हो सकती है। इसलिए स्थानीय मंदिर की पूजा पद्धति और वहां के पुजारी द्वारा बताए गए नियमों का पालन करना सबसे उचित माना जाता है।

शिवलिंग की आधी परिक्रमा का धार्मिक भाव

शिवलिंग की आधी परिक्रमा के पीछे धार्मिक और आध्यात्मिक मान्यताएं जुड़ी हुई हैं। शिवलिंग को भगवान शिव और शक्ति के संयुक्त स्वरूप का प्रतीक माना जाता है। जलाधारी को भी इसी दिव्य व्यवस्था का महत्वपूर्ण हिस्सा माना जाता है।

धार्मिक परंपरा में जलाधारी से निकलने वाले जल को पवित्र माना जाता है। इस कारण उसे पैरों से पार करना उचित नहीं समझा जाता। भक्त जल निकासी के स्थान तक जाकर वापस लौटता है और इसी प्रकार आधी परिक्रमा पूरी करता है।

इस परंपरा का मुख्य भाव भगवान शिव के प्रति सम्मान और मंदिर की पवित्र व्यवस्था का पालन करना है। भक्तों के लिए यह केवल परिक्रमा की संख्या का विषय नहीं, बल्कि पूजा की विधि और मर्यादा को समझने का भी हिस्सा है।

क्या परिक्रमा की संख्या हर मंदिर में समान होती है

परिक्रमा को लेकर बताई जाने वाली संख्याएं धार्मिक मान्यताओं और परंपराओं पर आधारित हैं। अलग-अलग ग्रंथों, संप्रदायों और क्षेत्रों में पूजा विधियों में कुछ अंतर देखने को मिल सकता है। इसलिए यह जरूरी नहीं कि हर मंदिर में एक ही संख्या में परिक्रमा करने का नियम हो।

कई मंदिरों में भक्तों के लिए विशेष परिक्रमा मार्ग बनाया जाता है। कुछ मंदिरों में गर्भगृह के चारों ओर घूमने की व्यवस्था होती है, जबकि कुछ स्थानों पर मुख्य मंदिर परिसर की परिक्रमा की जाती है। बड़े तीर्थस्थलों में मंदिर की बाहरी परिक्रमा का भी अपना महत्व हो सकता है।

इसीलिए यदि किसी मंदिर में परिक्रमा की संख्या या दिशा को लेकर विशेष नियम दिए गए हों, तो श्रद्धालुओं को उनका पालन करना चाहिए। धार्मिक आस्था में नियमों के साथ-साथ भाव और श्रद्धा को भी महत्वपूर्ण माना जाता है।

परिक्रमा करते समय भगवान का स्मरण क्यों महत्वपूर्ण माना जाता है

धार्मिक दृष्टि से परिक्रमा का वास्तविक उद्देश्य केवल चक्कर पूरा करना नहीं माना जाता। इसे भगवान का स्मरण और मन को एकाग्र करने की प्रक्रिया के रूप में भी देखा जाता है। यदि व्यक्ति परिक्रमा करते समय लगातार मोबाइल फोन, बातचीत या अन्य गतिविधियों में व्यस्त रहता है, तो उसका ध्यान पूजा के भाव से हट सकता है।

इसलिए कई भक्त परिक्रमा के दौरान मंत्र जाप करते हैं। गणेश मंदिर में गणपति मंत्र, विष्णु मंदिर में विष्णु नाम का स्मरण और शिव मंदिर में ‘ॐ नमः शिवाय’ का जाप करने की परंपरा कई स्थानों पर देखने को मिलती है।

परिक्रमा की गति भी सामान्य और सहज रखने की परंपरा है। इसका उद्देश्य प्रतियोगिता की तरह जल्दी-जल्दी चक्कर पूरा करना नहीं, बल्कि कुछ समय भगवान की उपस्थिति और अपनी आस्था के साथ बिताना माना जाता है।

परिक्रमा को लेकर सबसे जरूरी बात

सनातन परंपरा में परिक्रमा का महत्व केवल इस बात से नहीं जुड़ा है कि भक्त ने कितने चक्कर लगाए। इसके पीछे श्रद्धा, समर्पण, अनुशासन और ईश्वर को जीवन का केंद्र मानने की भावना भी महत्वपूर्ण मानी जाती है। गणेश जी की तीन, विष्णु जी की चार, सूर्य देव की सात और देवी की एक परिक्रमा जैसी मान्यताएं विभिन्न धार्मिक परंपराओं में प्रचलित हैं, जबकि भगवान शिव की परिक्रमा में जलाधारी और सोमसूत्र को पार न करने की परंपरा विशेष रूप से बताई जाती है।

किसी भी मंदिर में पूजा करते समय वहां की स्थापित परंपरा और नियमों का सम्मान करना चाहिए। धार्मिक मान्यताएं क्षेत्र और संप्रदाय के अनुसार अलग हो सकती हैं, इसलिए परिक्रमा की संख्या को लेकर स्थानीय परंपरा को भी महत्व दिया जाना चाहिए। श्रद्धा और सही भाव से की गई पूजा को ही सनातन परंपरा में सबसे महत्वपूर्ण माना जाता है।