जब भी डाइट में फाइबर की बात होती है तो अक्सर इसे कब्ज और पेट साफ रखने से जोड़कर देखा जाता है। लेकिन फाइबर का काम इससे कहीं ज्यादा व्यापक है। शरीर में इसकी पर्याप्त मात्रा न सिर्फ पाचन तंत्र को बेहतर तरीके से काम करने में मदद कर सकती है, बल्कि हृदय की सेहत, ब्लड शुगर, कोलेस्ट्रॉल, वजन और आंतों में मौजूद सूक्ष्मजीवों यानी गट माइक्रोबायोम पर भी इसका असर पड़ सकता है। यही वजह है कि पोषण विशेषज्ञ लंबे समय से डाइट में पर्याप्त मात्रा में अलग-अलग स्रोतों से फाइबर शामिल करने की सलाह देते हैं। हाल के वर्षों में फाइबर को लेकर सोशल मीडिया और हेल्थ इंडस्ट्री में चर्चा जरूर बढ़ी है, लेकिन इसके पीछे सिर्फ कोई नया ट्रेंड नहीं है। कई अध्ययनों में पर्याप्त फाइबर सेवन और बेहतर स्वास्थ्य परिणामों के बीच संबंध सामने आया है।
फाइबर की जरूरत आखिर कितनी होती है?
हर व्यक्ति के लिए फाइबर की जरूरत समान नहीं होती। सामान्य सिफारिशों के मुताबिक वयस्क महिलाओं को एक दिन में करीब 25 ग्राम और पुरुषों को लगभग 38 ग्राम फाइबर लेने का लक्ष्य रखना चाहिए। हालांकि उम्र, कुल कैलोरी सेवन और व्यक्तिगत जरूरत के अनुसार यह मात्रा अलग हो सकती है। समस्या यह है कि बहुत से लोग अपनी रोजाना की डाइट में इस लक्ष्य के आसपास भी नहीं पहुंच पाते। अमेरिका में 2013 से 2018 के बीच जुटाए गए आंकड़ों में पाया गया कि केवल लगभग 4 प्रतिशत वयस्क ही अपनी जरूरत के अनुरूप फाइबर का सेवन कर रहे थे। उस अवधि में औसत दैनिक सेवन करीब 16 ग्राम रहा, जो अनुशंसित मात्रा से काफी कम था।
इसका एक बड़ा कारण आधुनिक खान-पान को माना जाता है। कई लोगों की डाइट में रिफाइंड अनाज, पैकेज्ड स्नैक्स, मीठे खाद्य पदार्थ और ऐसे भोजन की मात्रा ज्यादा होती है जिनमें फाइबर बहुत कम होता है। इसके उलट फल, सब्जियां, साबुत अनाज, दालें और अन्य पौधों से मिलने वाले खाद्य पदार्थ रोजाना की प्लेट में पर्याप्त जगह नहीं बना पाते। इसलिए सिर्फ पेट साफ होने या न होने को फाइबर की जरूरत का पैमाना मानना सही नहीं है।
शरीर फाइबर को पचा क्यों नहीं पाता?
डायटरी फाइबर कार्बोहाइड्रेट का ऐसा समूह है जिसे मानव पाचन तंत्र पूरी तरह तोड़कर अवशोषित नहीं कर पाता। यही विशेषता इसे दूसरे कार्बोहाइड्रेट से अलग बनाती है। फाइबर भोजन के साथ शरीर में पहुंचने के बाद पाचन तंत्र के अलग-अलग हिस्सों में अलग तरह से काम कर सकता है। कुछ फाइबर पानी सोखकर फूलते हैं और मल को अधिक मात्रा देते हैं, जबकि कुछ प्रकार आंतों में मौजूद माइक्रोब्स द्वारा इस्तेमाल किए जाते हैं।
फाइबर प्राकृतिक रूप से कई खाद्य पदार्थों में पाया जाता है। रसभरी जैसे फल, एवोकाडो, ओट्स, साबुत अनाज, दालें, चने और दूसरी फलियां इसके अच्छे स्रोत हैं। कई बीजों, सब्जियों और अन्य पौधों से मिलने वाले खाद्य पदार्थ भी डाइट में फाइबर बढ़ाने में मदद करते हैं। बाजार में फाइबर सप्लीमेंट भी उपलब्ध हैं। इनमें साइलीज़ियम हस्क यानी इसबगोल प्रमुख उदाहरण है। इसके अलावा इन्यूलिन जैसे अलग किए गए फाइबर का इस्तेमाल कुछ हाई-फाइबर स्नैक्स, पेय और प्रोसेस्ड खाद्य पदार्थों में किया जाता है।
हालांकि यहां एक जरूरी बात समझना भी महत्वपूर्ण है कि हर फाइबर का शरीर पर प्रभाव एक जैसा नहीं होता। फाइबर की संरचना, वह पानी में घुलता है या नहीं और आंतों के बैक्टीरिया उसे किस तरह इस्तेमाल करते हैं, इन सभी बातों से उसका प्रभाव बदल सकता है।
इसबगोल और इन्यूलिन में क्यों है अंतर?
साइलेयम यानी इसबगोल ऐसा फाइबर है जो पानी के संपर्क में आने पर फूलकर जेल जैसी संरचना बना लेता है। इस वजह से यह पाचन तंत्र में अलग तरीके से काम करता है और मल त्याग को नियमित रखने में मदद कर सकता है। कुछ शोधों में साइलीयम के सेवन को कोलेस्ट्रॉल, ब्लड शुगर और ब्लड प्रेशर जैसे स्वास्थ्य संकेतकों में सुधार से जोड़ा गया है। इसके अलावा यह पेट भरा हुआ महसूस कराने में योगदान दे सकता है, जिससे कुछ लोगों को वजन प्रबंधन में भी मदद मिल सकती है।
इन्यूलिन का व्यवहार अलग है। यह एक ऐसा फाइबर है जिसे आंतों में मौजूद कुछ बैक्टीरिया इस्तेमाल कर सकते हैं। इसलिए इसे प्रीबायोटिक फाइबर के रूप में भी जाना जाता है। जब आंतों के सूक्ष्मजीव ऐसे फाइबर को तोड़ते हैं तो कई तरह के पदार्थ बनते हैं, जिनका शरीर पर अलग-अलग प्रभाव हो सकता है। इनमें कुछ शॉर्ट-चेन फैटी एसिड भी शामिल हैं, जिन्हें आंतों के स्वास्थ्य और शरीर में सूजन से जुड़े कई जैविक प्रक्रियाओं से जोड़ा गया है।
इसी कारण पोषण विशेषज्ञ अक्सर किसी एक सप्लीमेंट पर निर्भर रहने के बजाय अलग-अलग प्राकृतिक स्रोतों से फाइबर लेने पर जोर देते हैं। अलग खाद्य पदार्थों से अलग प्रकार के फाइबर मिल सकते हैं और साथ ही विटामिन, मिनरल, एंटीऑक्सीडेंट और अन्य पोषक तत्व भी शरीर तक पहुंचते हैं।
दिल के लिए भी महत्वपूर्ण हो सकता है फाइबर
फाइबर का महत्व सिर्फ पाचन तंत्र तक सीमित नहीं है। पर्याप्त फाइबर वाली डाइट को हृदय स्वास्थ्य से भी जोड़ा गया है। खासतौर पर कुछ प्रकार के फाइबर शरीर में कोलेस्ट्रॉल के स्तर को प्रभावित कर सकते हैं। जब डाइट में फाइबर की मात्रा बढ़ती है और इसके लिए साबुत अनाज, दालें, फल और सब्जियों जैसे खाद्य पदार्थ शामिल किए जाते हैं, तो इससे कुल डाइट की गुणवत्ता भी बेहतर हो सकती है।
शोधों में पर्याप्त फाइबर सेवन और हृदय रोग के कम जोखिम के बीच संबंध देखा गया है। हालांकि इसका अर्थ यह नहीं है कि केवल फाइबर किसी व्यक्ति को हृदय रोग से बचा सकता है। हृदय स्वास्थ्य पर शारीरिक गतिविधि, ब्लड प्रेशर, धूम्रपान, वजन, नींद, कुल खान-पान और कई अन्य कारकों का भी प्रभाव पड़ता है। इसलिए फाइबर को स्वस्थ जीवनशैली के एक हिस्से के रूप में देखना अधिक उचित है।
आंतों के बैक्टीरिया के लिए फाइबर क्यों जरूरी है?
हमारी आंतों में खरबों सूक्ष्मजीव रहते हैं। इन्हें सामूहिक रूप से गट माइक्रोबायोम कहा जाता है। इनमें मौजूद बैक्टीरिया हमारे भोजन के कुछ ऐसे हिस्सों को भी इस्तेमाल कर सकते हैं जिन्हें मानव शरीर खुद पूरी तरह पचा नहीं पाता। फाइबर इन सूक्ष्मजीवों के लिए महत्वपूर्ण ईंधन का काम कर सकता है।
यही वजह है कि पर्याप्त फाइबर वाली डाइट का संबंध आंतों के माइक्रोबायोम की गतिविधियों से भी जोड़ा जाता है। कुछ फाइबर आंतों के बैक्टीरिया द्वारा किण्वित किए जाते हैं और इस प्रक्रिया में बनने वाले पदार्थ शरीर की विभिन्न जैविक प्रक्रियाओं को प्रभावित कर सकते हैं। इससे यह समझ आता है कि फाइबर का प्रभाव सिर्फ मल की मात्रा या पेट साफ होने तक सीमित नहीं है।
फाइबर और प्रोबायोटिक्स एक ही चीज नहीं
फाइबर और प्रोबायोटिक्स को लेकर भी लोगों में अक्सर भ्रम रहता है। दोनों आंतों की सेहत से जुड़े हैं, लेकिन दोनों की भूमिका अलग है। फाइबर का एक हिस्सा आंतों में मौजूद लाभकारी बैक्टीरिया के लिए भोजन की तरह काम कर सकता है, जबकि प्रोबायोटिक्स जीवित सूक्ष्मजीव होते हैं जिन्हें पर्याप्त मात्रा में लेने पर स्वास्थ्य लाभ मिलने की संभावना होती है।
दही और कुछ फर्मेंटेड खाद्य पदार्थों में जीवित सूक्ष्मजीव पाए जा सकते हैं। 2021 में 36 स्वस्थ वयस्कों पर किए गए एक अध्ययन में फाइबर और फर्मेंटेड खाद्य पदार्थों के प्रभावों को अलग-अलग देखा गया। अध्ययन में ज्यादा फाइबर लेने वाले लोगों में ऐसे बैक्टीरिया की गतिविधि बढ़ी जो फाइबर को तोड़ने वाले एंजाइम बनाते हैं। वहीं, फर्मेंटेड खाद्य पदार्थ खाने वाले प्रतिभागियों में माइक्रोबायोम की विविधता अधिक और सूजन से जुड़े कुछ संकेतक कम पाए गए। यह अध्ययन दोनों तरह के खाद्य पदार्थों को डाइट में शामिल करने के संभावित लाभों की ओर संकेत करता है, हालांकि इससे हर व्यक्ति के लिए एक समान परिणाम की गारंटी नहीं मानी जा सकती।
ज्यादा फाइबर लेना है तो अचानक बदलाव न करें
फाइबर स्वास्थ्य के लिए उपयोगी हो सकता है, लेकिन इसकी मात्रा अचानक बढ़ा देना हर किसी के लिए आरामदायक नहीं होता। अगर किसी व्यक्ति की डाइट में लंबे समय से फाइबर कम है और वह एकदम से बहुत ज्यादा फाइबर लेना शुरू कर देता है, तो गैस, पेट फूलना, पेट में भारीपन या दूसरी पाचन संबंधी परेशानियां हो सकती हैं। इन्यूलिन जैसे आसानी से फर्मेंट होने वाले फाइबर से कुछ लोगों में यह समस्या अधिक महसूस हो सकती है।
इसलिए डाइट में फाइबर को धीरे-धीरे बढ़ाना बेहतर तरीका माना जाता है। उदाहरण के लिए सफेद ब्रेड या रिफाइंड अनाज की जगह धीरे-धीरे साबुत अनाज को शामिल किया जा सकता है। भोजन में दाल, चना, राजमा, फल और सब्जियों की मात्रा बढ़ाई जा सकती है। साथ ही पर्याप्त पानी पीना भी जरूरी है, क्योंकि फाइबर की मात्रा बढ़ाने के साथ तरल पदार्थ का पर्याप्त सेवन पाचन तंत्र के लिए महत्वपूर्ण होता है।
सप्लीमेंट से पहले खाने की प्लेट पर दें ध्यान
फाइबर सप्लीमेंट कुछ लोगों के लिए उपयोगी हो सकते हैं, लेकिन इन्हें प्राकृतिक खाद्य स्रोतों का पूर्ण विकल्प नहीं माना जाना चाहिए। साबुत फल, सब्जियां, दालें, फलियां, ओट्स और साबुत अनाज फाइबर के साथ कई दूसरे पोषक तत्व भी प्रदान करते हैं। इसलिए रोजाना की डाइट को विविध रखना ज्यादा महत्वपूर्ण है।
फाइबर की जरूरत पूरी करने के लिए केवल एक ही खाद्य पदार्थ या एक ही सप्लीमेंट पर निर्भर रहने के बजाय अलग-अलग स्रोतों को भोजन में शामिल करना बेहतर रणनीति हो सकती है। इससे शरीर को विभिन्न प्रकार के फाइबर के साथ दूसरे जरूरी पोषक तत्व भी मिलते हैं।
फाइबर को सिर्फ कब्ज से राहत दिलाने वाला पोषक तत्व समझना, इसके वास्तविक महत्व को कम करके आंकना होगा। यह पाचन तंत्र, आंतों के माइक्रोबायोम और कुछ हृदय संबंधी स्वास्थ्य संकेतकों से जुड़ा हुआ है। साथ ही पर्याप्त फाइबर वाली डाइट का संबंध कोलोरेक्टल कैंसर और कुछ अन्य स्वास्थ्य समस्याओं के कम जोखिम से भी पाया गया है। फिर भी फाइबर की सही मात्रा और अलग-अलग प्रकारों के संयुक्त प्रभाव को लेकर वैज्ञानिकों को अभी और बड़े तथा लंबे समय तक चलने वाले अध्ययनों की जरूरत है। फिलहाल व्यावहारिक तरीका यही है कि भोजन में प्राकृतिक फाइबर स्रोतों की विविधता बढ़ाई जाए, मात्रा को धीरे-धीरे बढ़ाया जाए और पर्याप्त पानी का सेवन किया जाए।
(Photo: AI Generated)




