युवाओं में तेजी से बढ़ रही विटामिन-डी की कमी, धूप से दूरी और खराब डाइट बन रही बड़ी वजह

युवाओं में तेजी से बढ़ रही विटामिन-डी की कमी, धूप से दूरी और खराब डाइट बन रही बड़ी वजह

आज के समय में सेहत को लेकर जागरूकता बढ़ी है, लेकिन इसके बावजूद शरीर में जरूरी पोषक तत्वों की कमी एक बड़ी समस्या बनती जा रही है। खासतौर पर युवाओं और कम उम्र के लोगों में विटामिन और मिनरल्स की कमी के मामले लगातार चिंता का विषय बने हुए हैं। इन्हीं में विटामिन-डी की कमी भी शामिल है। आमतौर पर लोग इसे सिर्फ हड्डियों की मजबूती से जोड़कर देखते हैं, लेकिन शरीर में इसकी भूमिका इससे कहीं ज्यादा महत्वपूर्ण है।

विटामिन-डी शरीर में कैल्शियम के बेहतर अवशोषण में मदद करता है। कैल्शियम और विटामिन-डी दोनों मिलकर हड्डियों और दांतों को मजबूत रखने में अहम भूमिका निभाते हैं। इसके अलावा शरीर की सामान्य कार्यप्रणाली, मांसपेशियों और इम्यून सिस्टम के लिए भी पर्याप्त विटामिन-डी जरूरी माना जाता है। ऐसे में इसकी कमी को केवल हड्डियों से जुड़ी समस्या समझना सही नहीं होगा।

सबसे बड़ा सवाल यह है कि आखिर पहले की तुलना में आज के युवाओं में विटामिन-डी की कमी की समस्या क्यों ज्यादा दिखाई दे रही है? इसका जवाब हमारी बदलती जीवनशैली, घर के अंदर ज्यादा समय बिताने की आदत और खान-पान की कुछ कमियों में छिपा हो सकता है।

धूप से बढ़ गई दूरी, शरीर को नहीं मिल रहा पर्याप्त विटामिन-डी

विटामिन-डी की खास बात यह है कि शरीर इसे सूर्य की रोशनी की मदद से खुद भी बना सकता है। त्वचा पर पड़ने वाली सूर्य की UVB किरणें इस प्रक्रिया में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं। यही वजह है कि पर्याप्त और सुरक्षित धूप को विटामिन-डी का एक महत्वपूर्ण प्राकृतिक स्रोत माना जाता है।

लेकिन आधुनिक जीवनशैली में लोगों का काफी समय बंद कमरों में गुजरने लगा है। बच्चे स्कूल और कोचिंग में रहते हैं, युवा कॉलेज या ऑफिस में कई घंटे बिताते हैं और इसके बाद बचा समय मोबाइल, कंप्यूटर, टीवी या घर के अंदर अन्य गतिविधियों में निकल जाता है। इस वजह से नियमित रूप से बाहर निकलने और प्राकृतिक धूप लेने का समय कम होता जा रहा है।

शहरी इलाकों में यह समस्या और स्पष्ट दिखाई दे सकती है। काम और पढ़ाई की व्यस्तता के कारण लोग सुबह या दिन के समय बाहर कम निकलते हैं। सप्ताह के ज्यादातर दिन घर, ऑफिस या अन्य इनडोर स्थानों में बिताने से सूर्य की रोशनी का पर्याप्त संपर्क नहीं हो पाता।

सनस्क्रीन और कपड़ों का भी पड़ सकता है असर

धूप से बचने के लिए लोग सनस्क्रीन, छाते, पूरी बाजू के कपड़े और अन्य तरीकों का इस्तेमाल करते हैं। त्वचा को सूरज की हानिकारक UV किरणों से बचाने के लिए ये उपाय महत्वपूर्ण हैं, लेकिन सूर्य की रोशनी से विटामिन-डी बनने की प्रक्रिया पर इनका प्रभाव पड़ सकता है।

हालांकि इसका मतलब यह नहीं है कि विटामिन-डी के लिए बिना सुरक्षा के लंबे समय तक तेज धूप में रहना चाहिए। अत्यधिक सूर्य संपर्क त्वचा के लिए नुकसानदायक हो सकता है। इसलिए धूप और त्वचा की सुरक्षा के बीच संतुलन रखना जरूरी है।

किस व्यक्ति को कितनी धूप की जरूरत है, यह उसकी त्वचा, उम्र, भौगोलिक स्थिति, मौसम और अन्य परिस्थितियों पर निर्भर कर सकता है। इसलिए केवल धूप लेने के आधार पर यह मान लेना भी ठीक नहीं कि शरीर में विटामिन-डी का स्तर हमेशा सामान्य ही रहेगा।

केवल धूप ही नहीं, खान-पान भी है महत्वपूर्ण

विटामिन-डी की कमी के पीछे सिर्फ धूप से दूरी जिम्मेदार नहीं होती। हमारी डाइट भी इसमें भूमिका निभा सकती है। समस्या यह है कि प्राकृतिक रूप से विटामिन-डी बहुत सीमित खाद्य पदार्थों में पाया जाता है। इसलिए सामान्य भोजन से रोजाना पर्याप्त मात्रा हासिल करना कई लोगों के लिए आसान नहीं होता।

कुछ फैटी फिश यानी वसायुक्त मछलियां विटामिन-डी के अच्छे स्रोतों में गिनी जाती हैं। इसके अलावा अंडे की जर्दी, चीज और कुछ फोर्टिफाइड खाद्य पदार्थों से भी विटामिन-डी मिल सकता है। कुछ खाद्य पदार्थों में निर्माता अतिरिक्त विटामिन-डी मिलाते हैं, जिन्हें फोर्टिफाइड फूड कहा जाता है।

हालांकि हर व्यक्ति की डाइट एक जैसी नहीं होती। जो लोग ऐसे खाद्य पदार्थ बहुत कम खाते हैं या जिनकी डाइट में विविधता नहीं है, उनके लिए भोजन से पर्याप्त विटामिन-डी हासिल करना मुश्किल हो सकता है।

यही कारण है कि संतुलित आहार को केवल कैलोरी या प्रोटीन के नजरिए से नहीं देखना चाहिए। शरीर के लिए जरूरी विटामिन और मिनरल्स की पर्याप्तता भी भोजन का महत्वपूर्ण हिस्सा है।

युवाओं की इनडोर लाइफस्टाइल बन रही है चिंता का कारण

आज की पीढ़ी की दिनचर्या कुछ दशक पहले की तुलना में काफी बदल चुकी है। पढ़ाई, नौकरी, ऑनलाइन काम, डिजिटल मनोरंजन और सोशल मीडिया के कारण स्क्रीन के सामने बिताया जाने वाला समय बढ़ गया है।

इसका सीधा असर शारीरिक गतिविधियों और बाहर बिताए जाने वाले समय पर पड़ सकता है। कई युवा सुबह की धूप में टहलने या आउटडोर गतिविधियों के बजाय अपना खाली समय घर के अंदर बिताना पसंद करते हैं।

यदि किसी व्यक्ति की दिनचर्या में नियमित रूप से बाहर निकलना कम है और उसकी डाइट में विटामिन-डी वाले खाद्य पदार्थ भी पर्याप्त नहीं हैं, तो कमी का जोखिम बढ़ सकता है। हालांकि हर व्यक्ति में विटामिन-डी का स्तर अलग होता है और केवल जीवनशैली देखकर कमी की पुष्टि नहीं की जा सकती।

किन लोगों को विटामिन-डी की कमी का ज्यादा खतरा हो सकता है?

कुछ लोगों में विटामिन-डी की कमी होने की संभावना अन्य लोगों की तुलना में अधिक हो सकती है। जो लोग बहुत कम समय बाहर बिताते हैं और जिन्हें नियमित रूप से सूर्य की रोशनी नहीं मिलती, उनमें इसका जोखिम बढ़ सकता है।

जिन लोगों की त्वचा का रंग गहरा है, उनमें भी शरीर द्वारा विटामिन-डी बनाने की प्रक्रिया अपेक्षाकृत कम प्रभावी हो सकती है। इसके अलावा शरीर में ज्यादा फैट होने की स्थिति में भी विटामिन-डी के स्तर पर असर पड़ सकता है।

कुछ स्वास्थ्य संबंधी स्थितियां भी विटामिन-डी के अवशोषण को प्रभावित कर सकती हैं। यदि पाचन तंत्र शरीर में पोषक तत्वों को ठीक से अवशोषित नहीं कर पाता, तो विटामिन-डी की उपलब्धता प्रभावित हो सकती है।

उम्र बढ़ने के साथ त्वचा की विटामिन-डी बनाने की क्षमता भी कम हो सकती है। हालांकि इसका मतलब यह नहीं है कि कम उम्र के लोगों में इसकी कमी नहीं हो सकती। मौजूदा जीवनशैली के कारण युवा और अन्य आयु वर्ग के लोग भी जोखिम में हो सकते हैं।

विटामिन-डी की कमी के लक्षण हमेशा साफ नहीं होते

विटामिन-डी की कमी की एक चुनौती यह भी है कि हर व्यक्ति में इसके लक्षण एक जैसे नहीं दिखाई देते। कुछ लोगों में कोई स्पष्ट लक्षण नहीं भी हो सकते हैं। वहीं कुछ लोगों को कमजोरी, मांसपेशियों में परेशानी या हड्डियों से संबंधित समस्याएं महसूस हो सकती हैं।

इसी वजह से केवल लक्षणों के आधार पर यह तय करना सही नहीं है कि किसी व्यक्ति में विटामिन-डी कम है या नहीं। यदि डॉक्टर को कमी की आशंका हो तो वह जांच की सलाह दे सकते हैं।

ब्लड टेस्ट से पता चलता है विटामिन-डी का स्तर

विटामिन-डी की स्थिति जानने के लिए ब्लड टेस्ट कराया जा सकता है। आमतौर पर 25-hydroxy vitamin D यानी 25(OH)D टेस्ट का इस्तेमाल शरीर में विटामिन-डी के स्तर का आकलन करने के लिए किया जाता है।

दिए गए स्तरों के अनुसार 20 ng/mL या उससे ऊपर की मात्रा को अधिकांश लोगों के लिए पर्याप्त माना जा सकता है, जबकि 12 ng/mL से कम स्तर को बहुत कम माना जाता है। हालांकि टेस्ट रिपोर्ट की व्याख्या व्यक्ति की उम्र, स्वास्थ्य स्थिति और डॉक्टर की सलाह के आधार पर की जानी चाहिए।

इसलिए इंटरनेट पर मौजूद किसी एक सामान्य आंकड़े के आधार पर खुद से बीमारी या कमी का निष्कर्ष निकालना उचित नहीं है।

सप्लीमेंट लेने में न करें जल्दबाजी

विटामिन-डी की कमी सामने आने पर डॉक्टर जरूरत के अनुसार सप्लीमेंट की सलाह दे सकते हैं। लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि हर व्यक्ति बिना जांच या चिकित्सकीय सलाह के विटामिन-डी की हाई डोज लेना शुरू कर दे।

विटामिन-डी शरीर के लिए आवश्यक जरूर है, लेकिन जरूरत से ज्यादा मात्रा लेना भी नुकसानदायक हो सकता है। अत्यधिक सप्लीमेंट लेने से शरीर में कैल्शियम का स्तर असामान्य रूप से बढ़ सकता है और इससे स्वास्थ्य संबंधी गंभीर समस्याएं पैदा हो सकती हैं। इसलिए विटामिन-डी की गोली या हाई-डोज सप्लीमेंट लेने से पहले डॉक्टर से सलाह लेना बेहतर है।

कैसे रखें विटामिन-डी का स्तर सामान्य?

विटामिन-डी की कमी से बचने के लिए अपनी दिनचर्या में कुछ स्वस्थ आदतें शामिल की जा सकती हैं। नियमित शारीरिक गतिविधि, संतुलित भोजन और सुरक्षित तरीके से आउटडोर समय बिताना उपयोगी हो सकता है।

डाइट में उपलब्ध विटामिन-डी स्रोतों को शामिल करना चाहिए। जरूरत पड़ने पर डॉक्टर की सलाह से फोर्टिफाइड खाद्य पदार्थ या सप्लीमेंट भी लिए जा सकते हैं।

सबसे जरूरी बात यह है कि अपनी पूरी जीवनशैली पर ध्यान दिया जाए। केवल एक सप्लीमेंट लेने से खराब डाइट, लगातार इनडोर रहना और शारीरिक गतिविधि की कमी जैसी आदतों की भरपाई नहीं हो जाती।

निष्कर्ष के तौर पर, कम उम्र में विटामिन-डी की कमी के पीछे बदलती जीवनशैली और डाइट की भूमिका हो सकती है। धूप से दूरी, घर और ऑफिस में ज्यादा समय बिताना तथा विटामिन-डी के प्राकृतिक स्रोतों की सीमित उपलब्धता इसके जोखिम को बढ़ा सकती है। हालांकि हर व्यक्ति की जरूरत और स्थिति अलग होती है। इसलिए कमी का संदेह होने पर ब्लड टेस्ट और डॉक्टर की सलाह के आधार पर ही आगे का कदम उठाना सबसे सुरक्षित तरीका है।