हिमाचल में आवारा गौवंश के लिए बनेगा नया एक्शन प्लान, दूसरे राज्यों के मॉडल से तैयार होगी व्यवस्था

हिमाचल में आवारा गौवंश के लिए बनेगा नया एक्शन प्लान, दूसरे राज्यों के मॉडल से तैयार होगी व्यवस्था

हिमाचल प्रदेश में सड़कों, बाजारों और खुले क्षेत्रों में घूम रहे बेसहारा गौवंश की समस्या से निपटने के लिए प्रदेश सरकार ने अब एक व्यवस्थित और दीर्घकालिक कार्ययोजना तैयार करने की दिशा में कदम बढ़ाया है। सरकार का फोकस केवल सड़कों से गौवंश हटाने तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि उन्हें सुरक्षित तरीके से नजदीकी गोसदन या गो-अभयारण्य तक पहुंचाने और वहां उनके बेहतर प्रबंधन की व्यवस्था विकसित करने पर रहेगा।

इसी उद्देश्य को लेकर मंगलवार को राज्यस्तरीय टास्क फोर्स की पहली बैठक आयोजित की गई। बैठक में प्रदेश में बेसहारा गौवंश की मौजूदा स्थिति, उनके प्रबंधन, गोसदनों की क्षमता और संचालन व्यवस्था सहित कई महत्वपूर्ण पहलुओं पर विस्तार से चर्चा की गई। टास्क फोर्स ने माना कि समस्या का स्थायी समाधान तभी संभव है जब गौवंश को सड़कों से हटाने के साथ-साथ उनके पुनर्वास और देखभाल की भी प्रभावी व्यवस्था बनाई जाए।

बैठक की अध्यक्षता टास्क फोर्स के वाइस चेयरमैन धर्मपाल चौहान ने की। इसमें पशुपालन विभाग के संयुक्त निदेशक डा. संजीव धीमान सहित टास्क फोर्स के अन्य सदस्य भी मौजूद रहे। अधिकारियों और सदस्यों ने प्रदेश में बेसहारा गौवंश की स्थिति का जायजा लिया और अलग-अलग क्षेत्रों में सामने आ रही समस्याओं पर विचार-विमर्श किया।

बैठक में सबसे महत्वपूर्ण प्रस्ताव बेसहारा गौवंश को सड़कों से उठाने के बाद उन्हें नजदीकी गोसदन या गो-अभयारण्य तक पहुंचाने के लिए एक स्पष्ट निर्देशावली तैयार करने का रहा। इसके तहत गौवंश को पकड़ने से लेकर उनके परिवहन और संबंधित संस्थान तक सुरक्षित पहुंचाने की पूरी प्रक्रिया निर्धारित की जा सकती है।

वर्तमान में कई स्थानों पर बेसहारा पशुओं को सड़कों से हटाने के लिए स्थानीय स्तर पर कार्रवाई की जाती है, लेकिन कई बार उन्हें कहां ले जाया जाए और उनके लिए आगे क्या व्यवस्था हो, इसे लेकर स्पष्टता का अभाव रहता है। नई निर्देशावली तैयार होने के बाद इस पूरी प्रक्रिया को एक समान और व्यवस्थित रूप देने की कोशिश की जाएगी।

प्रस्तावित व्यवस्था में यह तय किया जा सकता है कि सड़क या खुले स्थान पर बेसहारा पाए जाने वाले गौवंश को किस प्रकार पकड़ा जाएगा, उन्हें ले जाने के लिए किस तरह के वाहनों का इस्तेमाल होगा, परिवहन के दौरान किन सुरक्षा मानकों का पालन करना होगा और किस नजदीकी गोसदन या गो-अभयारण्य में उन्हें पहुंचाया जाएगा। इससे पशुओं के साथ किसी भी प्रकार की लापरवाही की संभावना को कम करने में मदद मिल सकती है।

टास्क फोर्स की बैठक में केवल नई सुविधाएं बनाने पर ही चर्चा नहीं हुई, बल्कि पहले से संचालित गोसदनों की स्थिति को सुधारने पर भी जोर दिया गया। सदस्यों ने माना कि यदि नए गोसदन और गो-अभयारण्य बनाए भी जाते हैं, लेकिन मौजूदा संस्थानों की क्षमता, रखरखाव और प्रबंधन व्यवस्था मजबूत नहीं होती तो समस्या का पूर्ण समाधान संभव नहीं होगा।

इसलिए सरकार अब मौजूदा गोसदनों की क्षमता का आकलन करने, वहां उपलब्ध सुविधाओं की समीक्षा करने और संचालन व्यवस्था में सुधार की संभावनाओं पर भी काम कर सकती है। इनमें पर्याप्त स्थान, पशुओं के लिए चारा-पानी, साफ-सफाई, चिकित्सा सुविधा और नियमित देखभाल जैसी व्यवस्थाओं को बेहतर बनाने पर विशेष ध्यान दिया जा सकता है।

बैठक में दूसरे राज्यों में बेसहारा गौवंश के प्रबंधन के लिए अपनाए जा रहे विभिन्न मॉडलों का अध्ययन करने का निर्णय भी महत्वपूर्ण रहा। टास्क फोर्स के सदस्यों ने दूसरे राज्यों की व्यवस्थाओं और वहाँ सामने आए अनुभवों पर विचार किया। इसका उद्देश्य ऐसे सफल मॉडल की पहचान करना है जिन्हें हिमाचल प्रदेश की भौगोलिक और प्रशासनिक परिस्थितियों के अनुसार लागू किया जा सके।

हिमाचल की भौगोलिक स्थिति दूसरे राज्यों से अलग है। पहाड़ी क्षेत्रों में पशुओं को एक स्थान से दूसरे स्थान तक ले जाने, गोसदन स्थापित करने और वहां नियमित देखभाल की व्यवस्था करना मैदानी राज्यों की तुलना में अधिक चुनौतीपूर्ण हो सकता है। इसलिए दूसरे राज्यों के मॉडल को हूबहू लागू करने के बजाय स्थानीय जरूरतों के अनुसार उसमें बदलाव करने की आवश्यकता होगी।

टास्क फोर्स ने इस बात पर भी जोर दिया कि बेसहारा गौवंश की समस्या को केवल प्रशासनिक कार्रवाई के नजरिए से नहीं देखा जाना चाहिए। इसके पीछे कई सामाजिक और आर्थिक कारण भी हो सकते हैं। ऐसे में सरकार की योजना में पशुपालकों को जागरूक करने, पशुओं को सड़कों पर छोड़ने की प्रवृत्ति पर रोक लगाने और जिम्मेदार पशुपालन को बढ़ावा देने जैसे पहलुओं को भी शामिल किया जा सकता है।

सड़कों पर घूमने वाले बेसहारा पशु कई बार यातायात व्यवस्था के लिए भी गंभीर समस्या पैदा करते हैं। व्यस्त सड़कों और राजमार्गों पर अचानक पशुओं के आ जाने से वाहन दुर्घटनाओं का खतरा बढ़ जाता है। इसके अलावा रात के समय कम दृश्यता वाले इलाकों में यह समस्या और गंभीर हो जाती है। ऐसे में गौवंश के सुरक्षित प्रबंधन का मुद्दा केवल पशु कल्याण से ही नहीं, बल्कि सड़क सुरक्षा से भी जुड़ा हुआ है।

बैठक में यह भी माना गया कि गोसदनों और गो-अभयारण्यों की संख्या बढ़ाने के साथ-साथ उनकी वास्तविक क्षमता और उपयोगिता पर भी ध्यान देना जरूरी है। केवल भवन निर्माण कर देने से समस्या का समाधान नहीं होगा। वहां रहने वाले पशुओं के लिए लगातार चारे, पानी, उपचार और देखभाल की व्यवस्था सुनिश्चित करनी होगी।

मौजूदा गोसदनों के बेहतर संचालन के लिए प्रबंधन प्रणाली को अधिक जवाबदेह बनाने पर भी विचार किया जा सकता है। नियमित निरीक्षण, क्षमता का रिकॉर्ड, पशुओं की संख्या का विवरण और उपलब्ध संसाधनों की निगरानी जैसे उपाय व्यवस्था को अधिक पारदर्शी बनाने में मदद कर सकते हैं।

टास्क फोर्स की पहली बैठक को सरकार की ओर से समस्या के संस्थागत समाधान की दिशा में महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है। बैठक में हुई चर्चा से संकेत मिलता है कि सरकार अब बेसहारा गौवंश के मामले में अलग-अलग विभागों और स्थानीय संस्थाओं के बीच बेहतर समन्वय स्थापित करने की दिशा में आगे बढ़ सकती है।

नई निर्देशावली तैयार होने के बाद स्थानीय प्रशासन के लिए भी यह स्पष्ट हो सकेगा कि सड़क पर पाए जाने वाले बेसहारा गौवंश के मामले में किस स्तर पर क्या कार्रवाई करनी है। इससे अलग-अलग क्षेत्रों में अपनाई जाने वाली प्रक्रिया में एकरूपता आने की उम्मीद है।

टास्क फोर्स के सामने एक और महत्वपूर्ण चुनौती प्रदेश में उपलब्ध गोसदनों और गो-अभयारण्यों की क्षमता को जरूरत के अनुरूप बढ़ाना है। यदि सड़क से लगातार पशुओं को हटाया जाता है लेकिन उनके लिए पर्याप्त स्थान उपलब्ध नहीं है, तो समस्या दोबारा उत्पन्न हो सकती है। इसलिए पशुओं को पकड़ने और उन्हें गोसदन तक पहुंचाने की प्रक्रिया के साथ-साथ उपलब्ध क्षमता बढ़ाना भी जरूरी होगा।

सरकार की योजना में नए गोसदनों और गो-अभयारण्यों की स्थापना को भी प्राथमिकता देने पर विचार किया गया है। इसके लिए उन क्षेत्रों की पहचान की जा सकती है जहां बेसहारा गौवंश की संख्या अधिक है और मौजूदा सुविधाएं पर्याप्त नहीं हैं। इससे पशुओं को दूर ले जाने की आवश्यकता कम होगी और उन्हें स्थानीय स्तर पर सुरक्षित आश्रय मिल सकेगा।

दूसरी ओर, पहले से संचालित संस्थानों को मजबूत करना भी समान रूप से जरूरी माना गया है। इन संस्थानों में यदि आधारभूत सुविधाओं की कमी है तो उसे दूर करने, प्रबंधन में सुधार करने और पशुओं की देखभाल के लिए आवश्यक संसाधन उपलब्ध कराने पर ध्यान दिया जाएगा।

बैठक में चर्चा के आधार पर आने वाले समय में सरकार एक ऐसी व्यवस्था विकसित करने की कोशिश कर सकती है जिसमें बेसहारा गौवंश की पहचान से लेकर उनके सुरक्षित आश्रय तक पहुंचने की पूरी प्रक्रिया तय हो। इससे सड़क पर घूमने वाले पशुओं की संख्या कम करने के साथ-साथ दुर्घटनाओं और आम लोगों को होने वाली परेशानियों को भी कम किया जा सकता है।

फिलहाल टास्क फोर्स की पहली बैठक में हुई चर्चा को आगे की कार्ययोजना की आधारशिला माना जा रहा है। दूसरे राज्यों के अनुभवों का अध्ययन, नए गोसदनों और गो-अभयारण्यों की स्थापना, मौजूदा संस्थानों की क्षमता में सुधार तथा पशुओं को नजदीकी आश्रय तक पहुंचाने की स्पष्ट प्रक्रिया इस पूरी रणनीति के प्रमुख हिस्से होंगे।

सरकार के सामने अब चुनौती इन प्रस्तावों को जमीन पर लागू करने की है। यदि पकड़ने, परिवहन, आश्रय और देखभाल की पूरी व्यवस्था प्रभावी ढंग से तैयार होती है तो हिमाचल में बेसहारा गौवंश की समस्या को लंबे समय तक नियंत्रित करने में मदद मिल सकती है। साथ ही इससे सड़क सुरक्षा और पशु कल्याण दोनों क्षेत्रों में सकारात्मक असर पड़ने की उम्मीद है।