आर्थिक दबाव के बीच हिमाचल प्रदेश सरकार ने चालू वित्त वर्ष में एक बार फिर बाजार से कर्ज लेने का फैसला किया है। वित्त विभाग के प्रधान सचिव डॉ. अभिषेक जैन की ओर से 600 करोड़ रुपये के नए ऋण को लेकर अधिसूचना जारी की गई है। यह ऋण राज्य सरकार द्वारा वित्त वर्ष 2026-27 में लिया जाने वाला छठा कर्ज होगा। प्रस्तावित ऋण को मिलाकर चालू वित्त वर्ष में अब तक बाजार से लिए जाने वाले कर्ज की कुल राशि 3400 करोड़ रुपये हो जाएगी।
सरकार की ओर से जारी अधिसूचना के अनुसार 7.78 प्रतिशत ब्याज दर वाले एसजीएस-2044 स्टॉक को दोबारा जारी किया जाएगा। भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) की ओर से 6 अक्टूबर को मुंबई में ई-कुबेर प्रणाली के माध्यम से इसकी नीलामी की जाएगी। नीलामी प्रक्रिया पूरी होने के बाद 7 अक्टूबर को 600 करोड़ रुपये की राशि राज्य सरकार के खाते में पहुंचने की संभावना है।
18 साल की अवधि का होगा नया ऋण
राज्य सरकार की ओर से लिया जा रहा यह ऋण 18 वर्ष की अवधि के लिए होगा। इसकी अंतिम वापसी की तारीख 24 जून 2044 निर्धारित की गई है। ऋण पर तय 7.78 प्रतिशत की दर से ब्याज का भुगतान साल में दो बार करना होगा।
सरकार को हर वर्ष 24 जून और 24 दिसंबर को ब्याज का भुगतान करना होगा। इस तरह 600 करोड़ रुपये के इस नए कर्ज का वित्तीय बोझ लंबे समय तक राज्य के बजट पर बना रहेगा।
राज्य सरकार के लिए बाजार से ऋण जुटाना नियमित वित्तीय प्रबंधन का हिस्सा है, लेकिन लगातार बढ़ते कर्ज और ब्याज भुगतान को लेकर वित्तीय दबाव की चर्चा भी होती रही है। चालू वित्त वर्ष में यह छठा बाजार ऋण होगा।
अप्रैल से अब तक छह बार कर्ज
वित्त वर्ष 2026-27 में हिमाचल सरकार ने इससे पहले भी कई बार बाजार से ऋण लिया है। अप्रैल में 900 करोड़ रुपये का कर्ज लिया गया था। इसके बाद मई में 500 करोड़ रुपये और जून में दो अलग-अलग किश्तों में 400 और 300 करोड़ रुपये यानी कुल 700 करोड़ रुपये का ऋण लिया गया।
जुलाई में सरकार ने 700 करोड़ रुपये का और ऋण लिया। जुलाई तक इन चार चरणों में सरकार 2800 करोड़ रुपये बाजार से जुटा चुकी थी।
अब अक्टूबर में 600 करोड़ रुपये का नया ऋण लेने के बाद चालू वित्त वर्ष में बाजार से लिए गए कर्ज की कुल राशि 3400 करोड़ रुपये हो जाएगी।
वेतन-पेंशन के भुगतान पर भी वित्तीय दबाव
राज्य सरकार को कर्मचारियों के वेतन और पेंशन के भुगतान के लिए भी हर महीने बड़ी राशि की आवश्यकता होती है। त्योहारों के समय यह दबाव और बढ़ जाता है। दीपावली से पहले कर्मचारियों और पेंशनरों को समय पर भुगतान सुनिश्चित करने के लिए सरकार को अतिरिक्त वित्तीय संसाधनों की जरूरत पड़ती है।
सरकार के सामने एक तरफ नियमित वेतन, पेंशन और अन्य प्रतिबद्ध खर्च हैं, तो दूसरी तरफ पुराने ऋणों पर ब्याज और मूलधन की अदायगी का दायित्व भी है। ऐसे में राजस्व और व्यय के बीच अंतर को पूरा करने के लिए बाजार से ऋण लेने का सहारा लिया जाता है।
पिछले वित्त वर्ष में 41 हजार करोड़ से ज्यादा कर्ज
हिमाचल सरकार ने वित्त वर्ष 2025-26 में कुल 41,173 करोड़ रुपये का ऋण लिया था। इसी अवधि में सरकार की ओर से 32,004 करोड़ रुपये का कर्ज लौटाया गया।
इससे राज्य के कुल कर्ज का बोझ लगातार बढ़ता गया है। उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार हिमाचल सरकार पर कुल कर्ज अब 1.04 लाख करोड़ रुपये से अधिक हो चुका है। अनुमान है कि मौजूदा वित्तीय स्थिति और आने वाले समय में लिए जाने वाले ऋण को देखते हुए राज्य का कुल कर्ज इस साल 1.12 लाख करोड़ रुपये तक पहुंच सकता है।
राज्य सरकार के लिए बढ़ता ऋण और उस पर होने वाला ब्याज भुगतान वित्तीय प्रबंधन की बड़ी चुनौती बना हुआ है। कर्ज की राशि बढ़ने के साथ हर वर्ष ब्याज भुगतान का बोझ भी बढ़ रहा है।
इस साल ब्याज के रूप में 7271 करोड़ का भुगतान
सरकार की वित्तीय स्थिति पर सबसे बड़ा दबाव पुराने कर्ज पर ब्याज भुगतान का है। इस वित्त वर्ष में सरकार को केवल ब्याज के तौर पर करीब 7,271 करोड़ रुपये चुकाने हैं।
इस राशि का भुगतान राज्य के नियमित राजस्व से करना पड़ता है। ऐसे में सरकार के पास विकास योजनाओं, नई परियोजनाओं और बुनियादी ढांचे पर खर्च करने के लिए उपलब्ध धनराशि सीमित हो जाती है।
राज्य सरकार के वित्तीय ढांचे में वेतन, पेंशन और कर्ज के ब्याज का हिस्सा लगातार बड़ा बना हुआ है। इसके कारण विकास कार्यों के लिए उपलब्ध संसाधनों पर दबाव पड़ता है।
रेवेन्यू डेफिसिट ग्रांट बंद होने से बढ़ा दबाव
राज्य की वित्तीय स्थिति पर चर्चा करते हुए सरकार के सामने राजस्व घाटे का मुद्दा भी महत्वपूर्ण है। हिमाचल को पहले हर वर्ष करीब 8 से 10 हजार करोड़ रुपये की रेवेन्यू डेफिसिट ग्रांट मिलती थी। अब यह सहायता बंद हो चुकी है।
इस अनुदान के बंद होने के बाद राज्य सरकार को अपने नियमित खर्चों और वित्तीय दायित्वों को पूरा करने के लिए अपने संसाधनों पर अधिक निर्भर रहना पड़ रहा है। राजस्व में उपलब्ध राशि और प्रतिबद्ध खर्चों के बीच अंतर को पूरा करने के लिए सरकार को बाजार से ऋण जुटाना पड़ता है।
सरकार के सामने यह चुनौती इसलिए भी गंभीर है क्योंकि हिमाचल का अपना राजस्व आधार सीमित है और राज्य की भौगोलिक परिस्थितियों के कारण बुनियादी ढांचे पर खर्च भी अपेक्षाकृत अधिक होता है।
हर 100 रुपये में 80 रुपये प्रतिबद्ध खर्चों पर
राज्य की वित्तीय स्थिति को लेकर उपलब्ध आंकड़ों में यह भी सामने आया है कि सरकार की आय का बड़ा हिस्सा वेतन, पेंशन और पुराने कर्ज के ब्याज भुगतान में खर्च हो जाता है।
सरकार के वित्तीय आकलन के अनुसार हर 100 रुपये में से करीब 80 रुपये वेतन, पेंशन और पुराने कर्ज के ब्याज जैसे प्रतिबद्ध खर्चों पर चले जाते हैं। इसके बाद विकास कार्यों और नई योजनाओं के लिए करीब 20 रुपये ही उपलब्ध रह जाते हैं।
इस स्थिति में सरकार के लिए विकास योजनाओं के लिए अतिरिक्त संसाधन जुटाना चुनौतीपूर्ण हो जाता है। नई परियोजनाओं के साथ-साथ पहले से चल रहे विकास कार्यों के लिए भी धन की आवश्यकता होती है।
लगातार कर्ज से वित्तीय बोझ बढ़ने की चिंता
बाजार से कर्ज लेना सरकार के लिए तत्काल वित्तीय जरूरतों को पूरा करने का एक माध्यम है, लेकिन इससे भविष्य में ब्याज और मूलधन की अदायगी का दायित्व बढ़ता है। नए ऋण के साथ राज्य पर भविष्य के वर्षों में अतिरिक्त भुगतान का बोझ जुड़ता जाता है।
अक्टूबर में प्रस्तावित 600 करोड़ रुपये का ऋण भी इसी व्यवस्था का हिस्सा है। 7.78 प्रतिशत ब्याज दर वाले इस ऋण पर सरकार को निर्धारित समय तक नियमित ब्याज चुकाना होगा और वर्ष 2044 में इसकी मूल राशि लौटानी होगी।
इससे पहले लिए गए ऋणों की अदायगी और नए ऋण की जरूरतों के बीच संतुलन बनाना राज्य सरकार के लिए महत्वपूर्ण रहेगा।
आरबीआई की नीलामी से जुटेगी राशि
600 करोड़ रुपये के नए ऋण की प्रक्रिया भारतीय रिजर्व बैंक के माध्यम से पूरी होगी। 6 अक्टूबर को मुंबई में ई-कुबेर प्रणाली के जरिए एसजीएस-2044 स्टॉक की नीलामी होगी। नीलामी के बाद 7 अक्टूबर को राज्य सरकार को राशि मिलने की प्रक्रिया पूरी होने की उम्मीद है।
सरकार इस राशि का उपयोग अपनी वित्तीय जरूरतों और निर्धारित दायित्वों को पूरा करने के लिए करेगी। हालांकि, ऋण की वास्तविक लागत पर बाजार की स्थिति और नीलामी से संबंधित प्रक्रिया का भी प्रभाव रहेगा।
फिलहाल हिमाचल सरकार के सामने राजस्व बढ़ाने, गैर-जरूरी खर्चों को नियंत्रित करने और लगातार बढ़ते कर्ज के बोझ को संभालने की चुनौती बनी हुई है। चालू वित्त वर्ष में 3400 करोड़ रुपये का नया बाजार ऋण लेने की प्रक्रिया इस वित्तीय दबाव की एक और कड़ी है। साथ ही 1.04 लाख करोड़ रुपये से अधिक के कुल कर्ज और 7,271 करोड़ रुपये के वार्षिक ब्याज भुगतान के बीच राज्य सरकार के लिए वित्तीय संसाधनों का संतुलन बनाए रखना आने वाले समय में महत्वपूर्ण होगा।




