भारतीय जनता पार्टी के वरिष्ठ नेता और सुप्रीम कोर्ट के वरिष्ठ अधिवक्ता एच.एस. फूलका ने 1984 के सिख विरोधी नरसंहार के पीड़ितों को लेकर आम आदमी पार्टी पर तीखा राजनीतिक हमला बोला है। उन्होंने आरोप लगाया कि आम आदमी पार्टी ने पीड़ित परिवारों के साथ न्याय की वास्तविक लड़ाई लड़ने के बजाय उनके दशकों पुराने दर्द और संघर्ष को राजनीतिक लाभ हासिल करने के लिए इस्तेमाल किया। फूलका ने कहा कि जिन परिवारों ने इंसाफ के लिए करीब चार दशक तक इंतजार किया, उनके जख्मों को चुनावी मुद्दे और राजनीतिक हथियार में बदलना बेहद दुर्भाग्यपूर्ण है।
प्रदेश भाजपा मीडिया प्रमुख विनीत जोशी की मौजूदगी में आयोजित प्रेस कॉन्फ्रेंस में फूलका ने 1984 के मामलों को लेकर आम आदमी पार्टी की हालिया गतिविधियों पर सवाल उठाए। उन्होंने कहा कि 1984 के नरसंहार के पीड़ितों के नाम पर किए जा रहे प्रदर्शनों और राजनीतिक बयानों की गंभीरता को इस बात से परखा जाना चाहिए कि संबंधित राजनीतिक दलों ने वास्तव में पीड़ितों के लिए क्या किया।
फूलका ने आम आदमी पार्टी के विधायक राम सिंह नेताजी की पूर्व कांग्रेस नेता सज्जन कुमार की शोक सभा में कथित भागीदारी का मुद्दा भी उठाया। उन्होंने कहा कि सज्जन कुमार को 1984 के सिख विरोधी नरसंहार से जुड़े एक मामले में दोषी ठहराया जा चुका है। ऐसे में फूलका ने सवाल किया कि जो राजनीतिक दल एक तरफ 1984 के पीड़ितों के साथ खड़े होने का दावा करता है, उसके प्रतिनिधि ऐसे व्यक्ति के प्रति सम्मान या एकजुटता कैसे प्रदर्शित कर सकते हैं, जिसे नरसंहार से जुड़े मामले में दोषी ठहराया जा चुका है।
उन्होंने कहा कि 1984 के पीड़ितों के लिए न्याय का संघर्ष किसी राजनीतिक दल के चुनावी एजेंडे का हिस्सा नहीं होना चाहिए। उनके मुताबिक, पीड़ित परिवारों ने अपने प्रियजनों की हत्या और वर्षों तक चली कानूनी लड़ाई के बीच अपना जीवन गुजारा है। इसलिए उनके दुख को राजनीतिक अवसर के रूप में देखने के बजाय उनके न्याय, सम्मान और अधिकारों को प्राथमिकता दी जानी चाहिए।
मुआवजे में देरी को लेकर भी AAP पर गंभीर आरोप
प्रेस कॉन्फ्रेंस में फूलका ने 1984 के पीड़ित परिवारों को मिले अतिरिक्त मुआवजे के घटनाक्रम का भी उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि वर्ष 2014 में नरेंद्र मोदी के नेतृत्व वाली केंद्र सरकार बनने के बाद तत्कालीन केंद्रीय गृह मंत्री राजनाथ सिंह ने 1984 के नरसंहार में प्रभावित प्रत्येक पीड़ित परिवार को अतिरिक्त पांच लाख रुपये मुआवजा देने की घोषणा की थी।
फूलका के अनुसार, केंद्र सरकार की ओर से राज्यों को जल्द से जल्द यह राशि वितरित करने के निर्देश दिए गए थे। उनका कहना है कि पीड़ित परिवार पहले ही लगभग तीन दशक तक न्याय और राहत का इंतजार कर चुके थे, इसलिए मुआवजे के वितरण में और देरी नहीं होनी चाहिए थी।
उन्होंने आरोप लगाया कि कई राज्यों में इस राशि का वितरण कर दिया गया, लेकिन दिल्ली में आम आदमी पार्टी की सरकार आने के बाद मुआवजा देने की प्रक्रिया में देरी हुई। फूलका ने दावा किया कि उन्होंने तत्कालीन AAP सरकार से कई बार आग्रह किया कि पीड़ित परिवारों को केंद्र द्वारा स्वीकृत राशि जल्द उपलब्ध कराई जाए।
फूलका ने आरोप लगाया कि उस समय उन्हें यह जवाब मिला कि मुआवजे को तुरंत जारी करने की जरूरत नहीं है और पंजाब विधानसभा चुनाव के करीब इसे वितरित किया जा सकता है। उन्होंने इसी को लेकर आम आदमी पार्टी पर राजनीतिक लाभ के लिए पीड़ित परिवारों के मुआवजे को रोकने का आरोप लगाया।
उन्होंने कहा कि 1984 के पीड़ितों को उनके अधिकार की राशि देने में किसी भी तरह की राजनीतिक गणना नहीं होनी चाहिए थी। उनके मुताबिक, जो परिवार तीन दशक से अपने नुकसान और न्याय के इंतजार में थे, उनके लिए पांच लाख रुपये केवल आर्थिक सहायता नहीं बल्कि सरकार की ओर से उनकी पीड़ा को स्वीकार करने का एक कदम था।
मुआवजा विवाद के बाद पदों से दिया था इस्तीफा
फूलका ने बताया कि मुआवजे में कथित देरी के विरोध में उन्होंने सितंबर 2015 में आम आदमी पार्टी के सभी पदों से इस्तीफा दे दिया था। उन्होंने कहा कि उनका फैसला पीड़ित परिवारों के हित और इस मुद्दे पर उनकी असहमति के कारण था।
उन्होंने बताया कि इसके बाद 1 नवंबर 2015 को दिल्ली सरकार की ओर से तिलक विहार में आयोजित कार्यक्रम में अतिरिक्त मुआवजा वितरित किया गया। फूलका ने कहा कि यदि केंद्र सरकार की ओर से राशि स्वीकृत की जा चुकी थी तो पीड़ितों तक इसे पहुंचाने में राजनीतिक समय का इंतजार नहीं किया जाना चाहिए था।
उन्होंने कहा कि 1984 के पीड़ितों के लिए न्याय की लड़ाई को राजनीतिक दलों की सुविधा के हिसाब से आगे-पीछे करना उनके साथ अन्याय है। पीड़ित परिवारों को न्याय, मुआवजा और सम्मान चाहिए था, न कि चुनावी समय के अनुसार राजनीतिक घोषणाएं।
भाजपा से अपने पुराने जुड़ाव का भी किया जिक्र
फूलका ने 1984 के मामलों को लेकर भाजपा के साथ अपने पुराने जुड़ाव का भी उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि यद्यपि उन्होंने भाजपा की औपचारिक सदस्यता हाल में ग्रहण की है, लेकिन पीड़ितों को न्याय दिलाने के मुद्दे पर उनका भाजपा के साथ जुड़ाव लगभग चार दशक पुराना है।
उन्होंने दिल्ली के पूर्व मुख्यमंत्री मदन लाल खुराना के कार्यकाल को याद करते हुए कहा कि उस दौरान वह उनके सलाहकार के तौर पर काम कर चुके हैं। फूलका ने दावा किया कि भाजपा के कई वरिष्ठ नेताओं और अधिवक्ताओं ने 1984 से जुड़े मामलों में पीड़ित परिवारों की ओर से कानूनी लड़ाई में सहयोग किया।
उन्होंने विशेष रूप से भाजपा के वरिष्ठ नेताओं और अधिवक्ताओं अरुण जेटली तथा रविशंकर प्रसाद का उल्लेख किया। फूलका के अनुसार, इन नेताओं ने 1984 के मामलों में कानूनी प्रक्रिया के दौरान पीड़ितों की ओर से आवाज उठाने में भूमिका निभाई।
फूलका ने पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी का भी जिक्र करते हुए कहा कि राजनीतिक परिस्थितियां प्रतिकूल होने के बावजूद उन्होंने 1984 के नरसंहार की वास्तविकता को सामने लाने और पीड़ित परिवारों के साथ खड़े होने की कोशिश की। उन्होंने कहा कि 1984 के मामलों में लंबे समय तक न्यायिक प्रक्रिया चलती रही, लेकिन भाजपा के नेतृत्व वाली सरकारों के कार्यकाल में कई मामलों में दोषियों को सजा तक पहुंचाने की प्रक्रिया आगे बढ़ी।
‘भाजपा और AAP की भूमिका में फर्क’
फूलका ने कहा कि 1984 के पीड़ितों के प्रति भाजपा और आम आदमी पार्टी के दृष्टिकोण में अंतर स्पष्ट दिखाई देता है। उन्होंने आरोप लगाया कि भाजपा ने कठिन दौर में पीड़ितों के साथ खड़े होकर कानूनी और राजनीतिक स्तर पर उनका समर्थन किया, जबकि आम आदमी पार्टी ने इस मुद्दे को उन मौकों पर ज्यादा उठाया जब इससे उसे राजनीतिक फायदा मिल सकता था।
उन्होंने कहा कि 1984 के पीड़ित परिवारों को दशकों तक न्याय के लिए संघर्ष करना पड़ा है। ऐसे में उनके मुद्दे को केवल चुनावी भाषणों और प्रदर्शनों तक सीमित नहीं किया जाना चाहिए। फूलका के मुताबिक, पीड़ितों के लिए वास्तविक सम्मान तभी होगा जब उनके साथ हुए अन्याय के मामलों में निष्पक्ष कार्रवाई और न्याय सुनिश्चित किया जाए।
उन्होंने कहा कि राजनीतिक दलों को 1984 के मुद्दे पर दोहरा रवैया अपनाने से बचना चाहिए। एक ओर पीड़ितों के साथ खड़े होने का दावा और दूसरी ओर 1984 से जुड़े मामलों में दोषी ठहराए जा चुके लोगों के प्रति सहानुभूति जताने जैसी गतिविधियां सवाल खड़े करती हैं।
पंजाब की राजनीति में फिर गरमाया 1984 का मुद्दा
फूलका के बयान के बाद 1984 का मुद्दा एक बार फिर पंजाब की राजनीतिक बहस के केंद्र में आ गया है। पिछले कुछ समय से विभिन्न राजनीतिक दल 1984 के सिख विरोधी नरसंहार के पीड़ितों को लेकर एक-दूसरे पर आरोप लगाते रहे हैं। ऐसे में भाजपा नेता द्वारा आम आदमी पार्टी पर किया गया यह हमला राजनीतिक रूप से महत्वपूर्ण माना जा रहा है।
फूलका ने अपने बयान के जरिए आम आदमी पार्टी की उस राजनीतिक छवि पर भी सवाल उठाने की कोशिश की है, जिसमें पार्टी खुद को भ्रष्टाचार और राजनीतिक व्यवस्था के खिलाफ संघर्ष करने वाली पार्टी के रूप में प्रस्तुत करती रही है। उन्होंने कहा कि किसी भी दल की विश्वसनीयता केवल उसके बयानों से नहीं बल्कि पीड़ितों के लिए किए गए वास्तविक काम से तय होती है।
उन्होंने दोहराया कि 1984 के पीड़ित परिवारों को राजनीतिक नारों से अधिक न्याय और सम्मान की आवश्यकता है। उनका कहना है कि चार दशक बाद भी इस त्रासदी से जुड़े सवाल पूरी तरह समाप्त नहीं हुए हैं और ऐसे मामलों को राजनीतिक लाभ के लिए इस्तेमाल करने के बजाय संवेदनशीलता तथा न्याय की दृष्टि से देखा जाना चाहिए।
फिलहाल फूलका के आरोपों ने पंजाब की राजनीति में AAP और भाजपा के बीच 1984 के मुद्दे पर नई बहस को जन्म दे दिया है। आने वाले दिनों में आम आदमी पार्टी की ओर से इन आरोपों पर क्या प्रतिक्रिया आती है, यह भी राजनीतिक रूप से महत्वपूर्ण रहेगा। वहीं, 1984 के पीड़ितों के न्याय, मुआवजे और दोषियों के खिलाफ कार्रवाई का मुद्दा एक बार फिर सार्वजनिक विमर्श में प्रमुखता से उठता दिखाई दे रहा है।




