आज के दौर में लोगों की जिंदगी पूरी तरह मोबाइल और डिजिटल स्क्रीन के आसपास घूमने लगी है। सुबह आंख खुलते ही फोन हाथ में आ जाता है और रात को सोने तक स्क्रीन से दूरी नहीं बन पाती। पहले जहां लोग खाली समय में आराम महसूस करते थे, वहीं अब हर पल सोशल मीडिया, वीडियो, मैसेज और नोटिफिकेशन से भरा रहता है। इसका असर सीधे दिमाग और नींद पर पड़ रहा है।
विशेषज्ञों का कहना है कि लगातार डिजिटल कंटेंट देखने से दिमाग को आराम करने का मौका नहीं मिलता। इंसान भले शरीर से आराम कर रहा हो, लेकिन उसका ब्रेन लगातार नई जानकारी प्रोसेस करता रहता है। यही वजह है कि बिना ज्यादा काम किए भी लोग मानसिक थकान और तनाव महसूस करने लगे हैं।
होसमैट हॉस्पिटल्स के न्यूरोलॉजिस्ट डॉ. प्रभु के मुताबिक इंसानी दिमाग को हर समय एक्टिव रहने के लिए डिजाइन नहीं किया गया था। पहले लोगों को दिनभर में ऐसे कई पल मिल जाते थे, जब दिमाग खुद शांत हो जाता था। लेकिन अब मोबाइल, सोशल मीडिया और लगातार आने वाले नोटिफिकेशन दिमाग को हर वक्त सतर्क बनाए रखते हैं।
डॉक्टरों के अनुसार देर रात तक मोबाइल स्क्रॉल करना या वीडियो देखना लोगों को भले रिलैक्सिंग लगे, लेकिन वास्तव में इससे नर्वस सिस्टम लगातार अलर्ट मोड में बना रहता है। धीरे-धीरे यह आदत ध्यान की कमी, चिड़चिड़ापन, मानसिक थकावट और इमोशनल बर्नआउट जैसी समस्याओं का कारण बन सकती है।
नेशनल इंस्टीट्यूट्स ऑफ हेल्थ की रिसर्च में भी पाया गया है कि जरूरत से ज्यादा स्क्रीन टाइम और देर रात तक डिजिटल एक्टिविटी करने से नींद की गुणवत्ता खराब होती है। साथ ही इससे फोकस करने की क्षमता और इमोशनल बैलेंस पर भी असर पड़ता है।
अरेटे हॉस्पिटल्स के न्यूरोलॉजी विभाग के प्रमुख बताते हैं कि हमारे दिमाग में एक खास सफाई प्रक्रिया होती है, जिसे ग्लिम्फैटिक सिस्टम कहा जाता है। यह सिस्टम गहरी नींद के दौरान सक्रिय होकर दिमाग में जमा हानिकारक पदार्थों को बाहर निकालता है। अगर लगातार नींद पूरी न हो या रातभर स्क्रीन का इस्तेमाल किया जाए, तो लंबे समय में ब्रेन की कार्यक्षमता प्रभावित हो सकती है।
एक्सपर्ट्स का कहना है कि स्वस्थ दिमाग के लिए रोजाना 6 से 8 घंटे की अच्छी और बिना बाधा वाली नींद बेहद जरूरी है। साथ ही रात में मोबाइल और अन्य स्क्रीन का इस्तेमाल कम करना मानसिक स्वास्थ्य के लिए फायदेमंद साबित हो सकता है।




