सेक्टर-32 पीजी अग्निकांड में छह साल बाद खुला मुकदमे का रास्ता, मालिक और संचालक पर तय हुए आरोप

सेक्टर-32 पीजी अग्निकांड में छह साल बाद खुला मुकदमे का रास्ता, मालिक और संचालक पर तय हुए आरोप

चंडीगढ़: सेक्टर-32 में वर्ष 2020 के चर्चित पीजी अग्निकांड मामले में करीब छह साल बाद अब मुकदमे की प्रक्रिया आगे बढ़ेगी। जिला अदालत ने कोठी मालिक गौरव अनेजा और पीजी संचालक नितेश बंसल के खिलाफ भारतीय दंड संहिता की धारा 304ए के तहत आरोप तय कर दिए हैं। दोनों पर लापरवाही के कारण तीन युवतियों की मौत के मामले में मुकदमा चलेगा। अदालत के इस आदेश के बाद अब मामले की सुनवाई मजिस्ट्रेट कोर्ट में होगी।

अदालत ने मुकदमे की सुनवाई के लिए 27 अक्टूबर की तारीख तय की है। इस दिन से दोनों आरोपितों के खिलाफ नियमित ट्रायल शुरू होने की संभावना है। मामला लंबे समय से कानूनी विवाद और आरोपों की धारा को लेकर चली आ रही प्रक्रिया के कारण आगे नहीं बढ़ पा रहा था। अब आरोपों की धारा में बदलाव के बाद मुकदमे की सुनवाई निचली अदालत में होने का रास्ता साफ हुआ है।

यह मामला फरवरी 2020 में सेक्टर-32 स्थित एक कोठी में संचालित हो रहे पीजी में लगी भीषण आग से जुड़ा है। हादसे में तीन छात्राओं की जान चली गई थी, जबकि दो अन्य युवतियों ने कोठी से छलांग लगाकर अपनी जान बचाई थी। हादसे के बाद पीजी में सुरक्षा व्यवस्था, अवैध रूप से व्यावसायिक गतिविधि चलाने और आग से बचाव के इंतजामों को लेकर गंभीर सवाल खड़े हुए थे।

पहले गैर-इरादतन हत्या की धारा में दर्ज हुआ था केस

आग लगने के बाद पुलिस ने कोठी मालिक गौरव अनेजा और पीजी संचालक नितेश बंसल के खिलाफ भारतीय दंड संहिता की धारा 304 के तहत मामला दर्ज किया था। यह धारा गैर-इरादतन हत्या से संबंधित है और इसके तहत मामला अपेक्षाकृत गंभीर श्रेणी में आता है।

दोनों आरोपितों ने पुलिस की ओर से लगाई गई इस धारा को पंजाब एवं हरियाणा हाई कोर्ट में चुनौती दी थी। उनका तर्क था कि घटना की परिस्थितियों के आधार पर उनके खिलाफ गैर-इरादतन हत्या की धारा लागू नहीं होती। आरोपितों की ओर से कहा गया था कि मामले में अधिक गंभीर धारा लगाकर उन्हें कानूनी रूप से कठोर स्थिति में रखा गया है।

मामले की सुनवाई के दौरान हाई कोर्ट ने आरोपितों की दलीलों पर विचार किया और धारा 304 के तहत चल रहे मामले में बदलाव का निर्देश दिया। हाई कोर्ट ने धारा 304 हटाकर धारा 304ए के तहत मुकदमा चलाने को कहा।

धारा बदलने से सेशंस कोर्ट की जगह मजिस्ट्रेट कोर्ट में चलेगा केस

धारा 304 और 304ए में अंतर होने के कारण मुकदमे की सुनवाई की अदालत भी बदल गई। धारा 304 के तहत मामला सेशंस कोर्ट के अधिकार क्षेत्र में आता था, जबकि धारा 304ए के तहत लापरवाही से हुई मौत का मामला मजिस्ट्रेट कोर्ट में सुना जाता है।

हाई कोर्ट के निर्देश के बाद अब जिला अदालत ने दोनों आरोपितों के खिलाफ धारा 304ए के तहत आरोप तय कर दिए हैं। इसके साथ ही मुकदमे की आगे की कार्यवाही के लिए मामला मजिस्ट्रेट कोर्ट में भेजे जाने का रास्ता साफ हो गया है।

इस कानूनी प्रक्रिया के चलते हादसे के लगभग छह वर्ष बाद अब मामले में नियमित सुनवाई शुरू होगी। 27 अक्टूबर से होने वाली कार्यवाही में अभियोजन पक्ष की ओर से मामले से संबंधित साक्ष्य और गवाह पेश किए जाने की प्रक्रिया आगे बढ़ सकती है।

ढाई मंजिला मकान में चल रहा था पीजी

हादसा सेक्टर-32 की कोठी नंबर 3325 में हुआ था। पुलिस जांच के मुताबिक ढाई मंजिला मकान में पीजी संचालित किया जा रहा था और वहां बड़ी संख्या में छात्राएं रह रही थीं।

बताया गया कि कोठी की पहली मंजिल पर छह कमरों में करीब 34 लड़कियां रहती थीं। हालांकि जिस समय आग लगी, उस वक्त पहली मंजिल पर केवल पांच छात्राएं मौजूद थीं। अचानक आग फैलने के बाद वहां अफरातफरी मच गई और युवतियों के सामने बाहर निकलने की चुनौती खड़ी हो गई।

घटना ने उस समय शहर में पीजी में रहने वाले विद्यार्थियों की सुरक्षा को लेकर गंभीर सवाल खड़े कर दिए थे। खास तौर पर उन मकानों में अग्नि सुरक्षा इंतजामों की जांच को लेकर चर्चा शुरू हुई थी, जहां बड़ी संख्या में विद्यार्थियों को ठहराया जाता है।

तीन छात्राओं की आग और धुएं में गई जान

फरवरी 2020 की उस शाम आग ने कुछ ही समय में कोठी के हिस्से को अपनी चपेट में ले लिया। हादसे में कपूरथला निवासी रिया अरोड़ा, कोटकपूरा निवासी पाक्षी और हिसार की मुस्कान की मौत हो गई थी।

दो अन्य युवतियां, जैसमीन और फेमिना, किसी तरह अपनी जान बचाने में सफल रहीं। दोनों ने स्थिति को देखते हुए कोठी से छलांग लगा दी थी। इस दौरान उन्हें चोटें भी आई थीं, लेकिन वे हादसे में बच गईं।

घटना की सूचना मिलते ही दमकल विभाग की टीम मौके पर पहुंची। फायर ब्रिगेड ने करीब 20 मिनट की मशक्कत के बाद आग पर काबू पा लिया था। हालांकि तब तक आग काफी नुकसान कर चुकी थी और तीन युवतियों की जान जा चुकी थी।

अलग-अलग केबिन से बरामद हुए थे शव

पुलिस की शुरुआती जांच के मुताबिक तीनों मृत युवतियों के शव कोठी के अलग-अलग केबिन से बरामद हुए थे। जांच के दौरान शव बेड के नीचे मिले थे। हादसे की भयावहता का अंदाजा इस बात से लगाया गया कि मुस्कान का शव करीब 70 प्रतिशत तक झुलसा हुआ पाया गया था।

वहीं रिया अरोड़ा और पाक्षी के शव अपेक्षाकृत कम जले हुए थे। जांच में सामने आया था कि तीनों की मौत आग की लपटों से जलने के बजाय दम घुटने के कारण हुई थी। आग और उससे निकले धुएं के कारण कमरे के भीतर फंसी युवतियों को सांस लेने में परेशानी हुई और वे बाहर नहीं निकल सकीं।

यह पहलू मामले की जांच में भी महत्वपूर्ण रहा क्योंकि आग से बचाव और आपात स्थिति में बाहर निकलने के रास्तों तथा सुरक्षा व्यवस्था पर सवाल उठे थे।

लैपटॉप चार्जर से शॉर्ट सर्किट को बताया गया था कारण

प्रारंभिक पुलिस जांच में आग लगने की वजह लैपटॉप चार्जर में हुआ शॉर्ट सर्किट बताई गई थी। इसके बाद आग तेजी से फैलने और पीजी में मौजूद छात्राओं के फंसने की परिस्थितियों की जांच की गई।

हादसे के बाद यह सवाल भी उठा था कि पीजी के रूप में इस्तेमाल हो रही इमारत में सुरक्षा के पर्याप्त इंतजाम थे या नहीं। बड़ी संख्या में छात्राओं के एक ही भवन में रहने के कारण अग्नि सुरक्षा व्यवस्था की भूमिका पर विशेष ध्यान गया।

मामले में पुलिस की कार्रवाई के बाद कोठी मालिक और पीजी संचालक पर आपराधिक लापरवाही का आरोप लगाया गया। हालांकि आरोपितों ने शुरुआत से ही उनके खिलाफ लगाई गई अधिक गंभीर धारा का विरोध किया।

कानूनी विवाद के कारण वर्षों तक अटका रहा मामला

अग्निकांड के बाद मामला पुलिस जांच से अदालत तक पहुंचा, लेकिन आरोपों की धारा को लेकर कानूनी चुनौती के चलते इसकी सुनवाई में लंबा समय लगा। आरोपितों की ओर से धारा 304 के तहत दर्ज मामले को चुनौती देने के बाद मामला हाई कोर्ट पहुंचा।

हाई कोर्ट के फैसले के बाद धारा 304 की जगह 304ए के तहत कार्रवाई का रास्ता तैयार हुआ। इसके बाद जिला अदालत में आरोप तय करने की प्रक्रिया पूरी हुई। अब अदालत ने दोनों आरोपितों के खिलाफ धारा 304ए के तहत मुकदमा चलाने का निर्णय लिया है।

इस तरह करीब छह साल बाद मामला ट्रायल के चरण में प्रवेश करने जा रहा है। अब अदालत में यह देखा जाएगा कि अभियोजन पक्ष आरोपितों के खिलाफ लगाए गए लापरवाही के आरोपों को किस तरह साबित करता है और बचाव पक्ष की ओर से इन आरोपों का क्या जवाब दिया जाता है।

पीजी में रहने वाली छात्राओं की सुरक्षा पर उठा था बड़ा सवाल

2020 के इस हादसे ने चंडीगढ़ में पीजी व्यवस्था को लेकर व्यापक बहस छेड़ दी थी। शहर में बड़ी संख्या में विद्यार्थी और कामकाजी युवा पीजी में रहते हैं। ऐसे में आग जैसी आपात स्थिति से निपटने के लिए भवनों में पर्याप्त सुरक्षा उपाय होना बेहद महत्वपूर्ण माना जाता है।

सेक्टर-32 की घटना के बाद इस बात पर भी सवाल उठे थे कि रिहायशी मकानों में बड़ी संख्या में विद्यार्थियों को रखकर पीजी संचालित किए जाने पर सुरक्षा मानकों का पालन किस स्तर तक किया जाता है। आग लगने की स्थिति में बाहर निकलने के सुरक्षित रास्ते, अग्निशमन उपकरण और अन्य इंतजामों को लेकर भी चिंता जताई गई थी।

तीन छात्राओं की मौत ने इस पूरे मुद्दे को और गंभीर बना दिया था। हादसे में दो युवतियों का इमारत से छलांग लगाकर बचना इस बात को भी सामने लाया कि आग के दौरान अंदर फंसे लोगों के लिए सुरक्षित निकासी कितनी महत्वपूर्ण होती है।

अब गवाहों और साक्ष्यों पर होगी सुनवाई

27 अक्टूबर से शुरू होने वाली सुनवाई में मामले के अलग-अलग पहलुओं पर अदालत के सामने साक्ष्य रखे जाएंगे। अभियोजन पक्ष की ओर से हादसे की परिस्थितियों, पीजी संचालन, भवन की स्थिति, आग लगने के कारण और सुरक्षा इंतजामों से संबंधित साक्ष्य पेश किए जा सकते हैं।

इसके अलावा दमकल विभाग की कार्रवाई, पुलिस जांच, पोस्टमार्टम रिपोर्ट और अन्य दस्तावेज भी मुकदमे की कार्यवाही का हिस्सा हो सकते हैं। बचाव पक्ष इन साक्ष्यों पर अपनी दलील रखेगा और आरोपों का विरोध करेगा।

अभी अदालत ने केवल धारा 304ए के तहत आरोप तय किए हैं। मामले में अंतिम रूप से आरोपित दोषी हैं या नहीं, यह ट्रायल पूरा होने और अदालत द्वारा साक्ष्यों के मूल्यांकन के बाद तय होगा।

छह साल पहले हुए इस दर्दनाक अग्निकांड में अब मुकदमे का रास्ता साफ होने से मृत छात्राओं के परिवारों की नजरें भी आगे की न्यायिक प्रक्रिया पर रहेंगी। 27 अक्टूबर से शुरू होने वाली सुनवाई यह तय करने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम होगी कि हादसे में कथित लापरवाही की कानूनी जिम्मेदारी किसकी बनती है।