पंजाब के वित्त मंत्री हरपाल सिंह चीमा ने ग्रामीण रोजगार योजना के नाम और प्रावधानों में बदलाव को लेकर केंद्र सरकार पर निशाना साधा है। उन्होंने आरोप लगाया कि योजना का नाम बदलने के साथ ही रोजगार उपलब्ध कराने वाले इसके कई प्रावधानों में भी बदलाव किया गया है। इसका सबसे अधिक असर ग्रामीण मजदूरों, गरीब परिवारों और वंचित वर्गों पर पड़ रहा है।
चीमा ने पत्रकारवार्ता में कहा कि केंद्र सरकार लगातार यह दावा करती रही है कि योजना का केवल नाम बदला गया है और रोजगार से जुड़े मूल प्रावधानों में कोई बड़ा बदलाव नहीं किया गया। हालांकि, उनके अनुसार रोजगार के ताजा आंकड़े इस दावे पर सवाल खड़े करते हैं। उन्होंने कहा कि ग्रामीण मजदूरों को पहले की तुलना में कम रोजगार मिल रहा है और इसका सीधा असर उनकी आमदनी पर पड़ रहा है।
व्यक्ति-दिवस रोजगार में बड़ी कमी का दावा
हरपाल सिंह चीमा ने दावा किया कि पिछले वर्ष की तुलना में इस वर्ष ग्रामीण रोजगार योजना के तहत करीब 9.56 करोड़ व्यक्ति-दिवस रोजगार कम पैदा हुआ है। उन्होंने कहा कि पिछले वर्ष करीब 30 करोड़ दिहाड़ी रोजगार उपलब्ध कराया गया था, जबकि इस वर्ष यह आंकड़ा घटकर लगभग 20.4 करोड़ रह गया है।
चीमा ने कहा कि रोजगार के अवसरों में इतनी बड़ी कमी ग्रामीण अर्थव्यवस्था के लिए चिंता का विषय है। ग्रामीण इलाकों में बड़ी संख्या में परिवार मजदूरी पर निर्भर हैं। ऐसे में रोजगार के दिनों में कमी आने का सीधा असर परिवारों की आमदनी और उनके रोजमर्रा के खर्च पर पड़ सकता है।
उन्होंने कहा कि ग्रामीण रोजगार योजना का मूल उद्देश्य जरूरतमंद परिवारों को काम का अवसर देकर उनकी आय को सहारा देना है। यदि काम के अवसर ही कम हो जाएं तो योजना की वास्तविक उपयोगिता पर सवाल उठना स्वाभाविक है।
125 दिन रोजगार के वादे पर उठाए सवाल
वित्त मंत्री ने कहा कि केंद्र सरकार ने ग्रामीण रोजगार की गारंटी को बढ़ाकर 125 दिन करने की बात कही थी। लेकिन दूसरी ओर उपलब्ध रोजगार में कमी देखने को मिल रही है। उन्होंने सवाल उठाया कि यदि रोजगार की गारंटी बढ़ाई गई है तो वास्तविक स्तर पर व्यक्ति-दिवस रोजगार में कमी क्यों आई है।
चीमा ने कहा कि रोजगार गारंटी के दिनों की संख्या बढ़ाना एक अलग विषय है, जबकि वास्तव में कितने परिवारों को काम मिला और कितने दिनों तक काम मिला, यह योजना की प्रभावशीलता को समझने के लिए अधिक महत्वपूर्ण है।
उन्होंने केंद्र सरकार से ग्रामीण रोजगार के आंकड़ों में आई गिरावट के कारण स्पष्ट करने की मांग की। उनके अनुसार सरकार को यह बताना चाहिए कि रोजगार के अवसर कम होने के पीछे कौन से प्रावधान जिम्मेदार हैं और आने वाले समय में ग्रामीण मजदूरों के लिए रोजगार के अवसर किस तरह बढ़ाए जाएंगे।
गरीब और मजदूर वर्ग पर असर का आरोप
चीमा ने कहा कि ग्रामीण रोजगार योजना से सबसे अधिक लाभ उन परिवारों को मिलता है, जिनके पास आय के नियमित साधन सीमित हैं। इनमें खेतिहर मजदूर, दिहाड़ी श्रमिक और आर्थिक रूप से कमजोर परिवार शामिल हैं।
उन्होंने आरोप लगाया कि केंद्र के फैसलों का प्रभाव गरीब और मजदूर वर्ग की रोजी-रोटी पर पड़ रहा है। उनके अनुसार जब किसी परिवार को पहले की तुलना में कम दिनों का रोजगार मिलता है तो उसकी कुल मजदूरी आय भी प्रभावित होती है।
वित्त मंत्री ने कहा कि ग्रामीण रोजगार केवल मजदूरी उपलब्ध कराने की योजना नहीं है, बल्कि यह ग्रामीण परिवारों के लिए आर्थिक सुरक्षा का एक माध्यम भी है। ऐसे में इसके प्रावधानों में किसी भी बदलाव का असर बड़ी संख्या में परिवारों पर पड़ सकता है।
एससी-एसटी समुदायों पर अधिक असर का दावा
हरपाल सिंह चीमा ने दावा किया कि योजना से जुड़े मजदूरों में करीब 87 प्रतिशत अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति समुदायों से संबंधित हैं। उन्होंने कहा कि यदि ग्रामीण रोजगार के अवसर घटते हैं तो इसका प्रभाव इन समुदायों के मजदूरों पर भी अधिक पड़ सकता है।
उन्होंने भाजपा सरकार पर गरीब और वंचित वर्गों के हितों को प्रभावित करने वाली नीतियां अपनाने का आरोप लगाया। चीमा ने कहा कि ग्रामीण रोजगार योजना में किसी भी तरह की कमी का असर उन परिवारों पर पड़ता है, जो पहले से ही आर्थिक चुनौतियों का सामना कर रहे हैं।
उन्होंने कहा कि सरकारों की नीतियों का आकलन इस आधार पर किया जाना चाहिए कि उनका लाभ समाज के कमजोर वर्गों तक कितना पहुंच रहा है। ग्रामीण मजदूरों के लिए रोजगार उपलब्ध कराना उनकी आर्थिक स्थिरता से सीधे जुड़ा विषय है।
केंद्र के नए कानून में 125 दिन रोजगार की गारंटी
ग्रामीण रोजगार व्यवस्था में बदलाव को लेकर केंद्र सरकार का पक्ष अलग है। नए ग्रामीण रोजगार कानून के तहत पात्र ग्रामीण परिवारों को एक वित्तीय वर्ष में 125 दिन के वैधानिक मजदूरी रोजगार की गारंटी दी गई है। इससे पहले यह सीमा 100 दिन थी।
नए कानून में ग्रामीण रोजगार को जल संरक्षण, ग्रामीण बुनियादी ढांचे, आजीविका से जुड़ी परिसंपत्तियों और अन्य विकास कार्यों से जोड़ने पर भी जोर दिया गया है। केंद्र सरकार के अनुसार इसका उद्देश्य रोजगार उपलब्ध कराने के साथ ग्रामीण क्षेत्रों में टिकाऊ परिसंपत्तियों का निर्माण करना है।
हालांकि, चीमा का सवाल इस बात पर केंद्रित है कि कानून में रोजगार के दिनों की गारंटी बढ़ाने के बावजूद वास्तविक स्तर पर कुल व्यक्ति-दिवस रोजगार में कमी क्यों दिखाई दे रही है।
नाम से अधिक जरूरी है रोजगार
चीमा ने कहा कि ग्रामीण मजदूर के लिए किसी योजना का नाम बदलना महत्वपूर्ण नहीं है। उसके लिए सबसे अहम यह है कि काम मांगने पर उसे रोजगार मिले और उसकी मजदूरी समय पर उसके खाते में पहुंचे।
उन्होंने कहा कि योजना का नाम चाहे कुछ भी हो, उसका मूल्यांकन इस आधार पर होना चाहिए कि जरूरतमंद ग्रामीण परिवारों को कितने दिनों का रोजगार मिला और उससे उनकी आर्थिक स्थिति में कितना सुधार हुआ।
वित्त मंत्री ने कहा कि केंद्र सरकार को ग्रामीण रोजगार के आंकड़ों को सार्वजनिक करते हुए यह स्पष्ट करना चाहिए कि पिछले वर्ष की तुलना में व्यक्ति-दिवस रोजगार में कथित कमी क्यों आई है। उन्होंने कहा कि गरीब परिवारों की आजीविका से जुड़े मुद्दे पर सरकार को स्पष्ट जवाब देना चाहिए।
ग्रामीण अर्थव्यवस्था पर पड़ सकता है असर
ग्रामीण क्षेत्रों में मजदूरी रोजगार का सीधा संबंध स्थानीय अर्थव्यवस्था से भी है। मजदूरों के हाथ में आय आने से स्थानीय बाजार में खरीदारी बढ़ती है और छोटे कारोबारियों तथा सेवा क्षेत्र को भी इसका लाभ मिलता है। इसलिए रोजगार के अवसरों में कमी का प्रभाव केवल मजदूर परिवार तक सीमित नहीं रहता।
चीमा ने कहा कि ग्रामीण रोजगार को मजबूत करने से गांवों में आर्थिक गतिविधियों को बढ़ावा मिलता है। इसके विपरीत रोजगार के अवसर कम होने पर ग्रामीण परिवारों की खर्च करने की क्षमता प्रभावित हो सकती है।
उन्होंने केंद्र से मांग की कि ग्रामीण रोजगार योजना को मजबूत किया जाए और काम मांगने वाले प्रत्येक पात्र परिवार को पर्याप्त रोजगार उपलब्ध कराने की व्यवस्था सुनिश्चित की जाए।
रोजगार के आंकड़ों को लेकर केंद्र और पंजाब सरकार आमने-सामने
ग्रामीण रोजगार योजना को लेकर केंद्र और पंजाब सरकार के बीच राजनीतिक मतभेद भी सामने आए हैं। चीमा ने जहां व्यक्ति-दिवस रोजगार में कमी का दावा करते हुए केंद्र सरकार की नीतियों पर सवाल उठाए हैं, वहीं केंद्र सरकार नए कानून के तहत रोजगार की गारंटी को 100 से बढ़ाकर 125 दिन किए जाने को प्रमुख बदलाव के रूप में प्रस्तुत कर रही है।
ऐसे में इस मुद्दे पर बहस दो प्रमुख बिंदुओं के आसपास केंद्रित है। पहला, नए कानून के तहत रोजगार की वैधानिक गारंटी कितने दिनों की है और दूसरा, वास्तविक स्तर पर ग्रामीण परिवारों को कितने दिनों का रोजगार मिल रहा है।
चीमा ने कहा कि ग्रामीण मजदूरों के हित में सबसे जरूरी यह है कि रोजगार के अवसर बढ़ें और उन्हें नियमित आय का साधन मिले। उन्होंने केंद्र सरकार से ग्रामीण रोजगार को लेकर अपने फैसलों और आंकड़ों की स्थिति स्पष्ट करने की मांग की।
उन्होंने कहा कि गरीब और मजदूर परिवारों की रोजी-रोटी से जुड़े विषय को केवल योजना के नाम या कागजी प्रावधानों तक सीमित नहीं रखा जाना चाहिए। वास्तविक लाभ तभी माना जाएगा, जब ग्रामीण क्षेत्र में काम मांगने वाले परिवारों को पर्याप्त रोजगार और समय पर मजदूरी मिल सके।




