पंजाब चुनाव में नशे पर आर-पार की लड़ाई, 2027 के लिए सभी दलों ने बनाया सबसे बड़ा सियासी हथियार

पंजाब चुनाव में नशे पर आर-पार की लड़ाई, 2027 के लिए सभी दलों ने बनाया सबसे बड़ा सियासी हथियार

एक दशक पहले राहुल गांधी के बयान पर हुआ था विवाद, अब भाजपा, कांग्रेस और अकाली दल के निशाने पर आप सरकार; अमित शाह ने 2029 तक देश को नशामुक्त करने का लिया संकल्प, एनसीआरबी के आंकड़ों ने बढ़ाई चिंता

चंडीगढ़। पंजाब में वर्ष 2027 के विधानसभा चुनाव की राजनीतिक तैयारियां तेज होने के साथ ही नशे का मुद्दा एक बार फिर सियासत के केंद्र में आ गया है। कभी पंजाब की राजनीति में कांग्रेस और तत्कालीन विपक्ष के बीच तीखी बहस का कारण बना यह मुद्दा अब आम आदमी पार्टी सरकार के खिलाफ सभी विपक्षी दलों का प्रमुख हथियार बनता जा रहा है। भाजपा, कांग्रेस और शिरोमणि अकाली दल ने नशे की समस्या को लेकर भगवंत मान सरकार पर हमले तेज कर दिए हैं। वहीं, सत्तारूढ़ आम आदमी पार्टी भी विपक्ष के आरोपों का जवाब देते हुए भाजपा और पिछली सरकारों को कठघरे में खड़ा कर रही है।

पंजाब में नशे की समस्या लंबे समय से राजनीतिक और सामाजिक चिंता का विषय रही है। वर्ष 2017 के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने इस मुद्दे को जोर-शोर से उठाया था। उस समय उनके एक बयान ने राष्ट्रीय स्तर पर राजनीतिक विवाद खड़ा कर दिया था। अब करीब एक दशक बाद वही मुद्दा फिर चुनावी बहस के केंद्र में है। फर्क केवल इतना है कि उस समय कांग्रेस विपक्ष में थी और भाजपा-अकाली गठबंधन सत्ता में था, जबकि अब आम आदमी पार्टी सरकार चला रही है और कांग्रेस, भाजपा तथा अकाली दल उसके खिलाफ मोर्चा खोले हुए हैं।

राजनीतिक दलों की रणनीति से साफ है कि 2027 के विधानसभा चुनाव में नशे के खिलाफ कार्रवाई, तस्करी पर नियंत्रण, युवाओं को नशे से बचाने और नशा कारोबार से जुड़े नेटवर्क को खत्म करने जैसे सवाल प्रमुख चुनावी मुद्दे बनेंगे। हर पार्टी इस विषय पर अपनी उपलब्धियां और दूसरे दलों की नाकामियां गिनाने की तैयारी में है।

अमित शाह ने 2029 तक नशामुक्त भारत का लक्ष्य रखा

20 अक्टूबर को पंजाब दौरे पर पहुंचे केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने नशे के खिलाफ लड़ाई को बड़ा राजनीतिक और राष्ट्रीय मुद्दा बनाते हुए वर्ष 2029 तक पंजाब सहित पूरे देश को नशामुक्त बनाने का संकल्प जताया था। उन्होंने पंजाब में नशे के कारोबार को लेकर सीधे तौर पर आम आदमी पार्टी सरकार को निशाने पर लिया।

अमित शाह ने कहा कि नशे के खिलाफ लड़ाई केवल कानून-व्यवस्था का विषय नहीं है, बल्कि देश की युवा पीढ़ी और भविष्य को सुरक्षित रखने का सवाल है। भाजपा ने इस मुद्दे को पंजाब की सीमाओं की सुरक्षा, सीमा पार से होने वाली तस्करी और संगठित नशा नेटवर्क से जोड़कर पेश किया है। पार्टी का कहना है कि नशे के कारोबार को खत्म करने के लिए तस्करों और उनके पूरे नेटवर्क के खिलाफ सख्त कार्रवाई जरूरी है।

शाह के बयान के बाद पंजाब की राजनीति में आरोप-प्रत्यारोप तेज हो गए। आम आदमी पार्टी के नेताओं ने भाजपा पर पलटवार करते हुए सवाल उठाया कि यदि केंद्र सरकार नशे के खिलाफ इतनी गंभीर है तो पहले गुजरात में नशे के कारोबार पर लगाम लगाकर दिखाए। आप नेताओं ने भाजपा को दूसरे राज्यों में नशे की समस्या पर भी जवाब देने की चुनौती दी।

इस तरह नशे के खिलाफ अभियान राजनीतिक दलों के बीच एक-दूसरे की जवाबदेही तय करने का मुद्दा बन गया है। भाजपा जहां पंजाब सरकार को विफल बता रही है, वहीं आप केंद्र सरकार और भाजपा शासित राज्यों की स्थिति पर सवाल उठा रही है।

राहुल गांधी ने आप और भाजपा दोनों को ठहराया जिम्मेदार

बुधवार को संगरूर में आयोजित रैली के दौरान कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने एक बार फिर पंजाब में नशे की समस्या को प्रमुखता से उठाया। उन्होंने इस गंभीर चुनौती के लिए भाजपा और आम आदमी पार्टी दोनों को जिम्मेदार ठहराया। राहुल गांधी के इस बयान से स्पष्ट हो गया कि कांग्रेस भी 2027 के चुनाव में नशे के मुद्दे को अपनी राजनीतिक रणनीति का प्रमुख हिस्सा बनाने जा रही है।

कांग्रेस के लिए यह मुद्दा इसलिए भी महत्वपूर्ण है, क्योंकि पार्टी पहले भी नशे के खिलाफ लड़ाई को लेकर पंजाब में राजनीतिक अभियान चला चुकी है। वर्ष 2017 के चुनाव में कांग्रेस ने नशे के कारोबार को खत्म करने और युवाओं को इस समस्या से बाहर निकालने का वादा प्रमुखता से किया था। अब पार्टी आप सरकार के कार्यकाल में नशे की स्थिति को लेकर सवाल उठा रही है।

राहुल गांधी ने भाजपा और आप को एक साथ निशाने पर लेकर यह संदेश देने की कोशिश की कि नशे की समस्या के समाधान में दोनों दल अपेक्षित परिणाम देने में विफल रहे हैं। कांग्रेस इस मुद्दे को केवल तस्करी तक सीमित रखने के बजाय युवाओं के भविष्य, रोजगार, सामाजिक सुरक्षा और सरकार की जवाबदेही से जोड़ना चाहती है।

संगरूर की रैली के बाद नशे का मुद्दा एक बार फिर पंजाब की चुनावी चर्चा में सबसे ऊपर आ गया है। कांग्रेस के लिए यह अवसर है कि वह अपने पुराने चुनावी वादों और मौजूदा सरकार के प्रदर्शन की तुलना करते हुए जनता के बीच अपनी बात रखे।

सुखबीर बादल भी लगातार सरकार पर हमलावर

शिरोमणि अकाली दल के अध्यक्ष सुखबीर सिंह बादल भी नशे के मुद्दे पर आम आदमी पार्टी सरकार को लगातार घेर रहे हैं। अकाली दल का आरोप है कि आप सरकार ने सत्ता में आने से पहले पंजाब को नशामुक्त बनाने के बड़े-बड़े वादे किए थे, लेकिन जमीनी स्तर पर समस्या अब भी बनी हुई है।

अकाली नेताओं का कहना है कि नशे की तस्करी और अवैध कारोबार को रोकने के लिए केवल घोषणाएं पर्याप्त नहीं हैं। इसके लिए पुलिस और प्रशासनिक व्यवस्था को मजबूत करने के साथ तस्करी के पूरे नेटवर्क पर कार्रवाई करनी होगी। अकाली दल सरकार के दावों और वास्तविक स्थिति के बीच अंतर को चुनावी मुद्दा बनाने की तैयारी में है।

अकाली दल के लिए यह विषय राजनीतिक रूप से संवेदनशील भी है, क्योंकि पंजाब में नशे का मुद्दा उसके पिछले शासनकाल के दौरान भी विपक्ष के निशाने पर रहा था। ऐसे में पार्टी अब आप सरकार के कार्यकाल को आधार बनाकर अपनी राजनीतिक स्थिति मजबूत करने की कोशिश कर रही है।

भाजपा भी नशे की समस्या को कानून-व्यवस्था और सीमा पार से होने वाली तस्करी के साथ जोड़कर आप सरकार पर हमलावर है। इस तरह पंजाब की तीनों प्रमुख विपक्षी राजनीतिक ताकतें अलग-अलग राजनीतिक तर्कों के साथ नशे को चुनावी बहस का प्रमुख विषय बना रही हैं।

एनसीआरबी के आंकड़ों ने उजागर की समस्या की गंभीरता

नशे की समस्या को लेकर राजनीतिक बयानबाजी के बीच सरकारी आंकड़े भी चिंता बढ़ाने वाले हैं। केंद्र सरकार की ओर से जारी राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो (एनसीआरबी) के आंकड़ों के मुताबिक, पंजाब में वर्ष 2024 के दौरान एनडीपीएस एक्ट के तहत 8,973 मामले दर्ज किए गए।

इन आंकड़ों के अनुसार नशे की ओवरडोज के कारण वर्ष 2024 में 106 लोगों की मौत दर्ज की गई, जबकि वर्ष 2023 में यह संख्या 89 थी। यानी एक वर्ष में ओवरडोज से होने वाली मौतों में वृद्धि दर्ज की गई।

ये आंकड़े बताते हैं कि नशे की समस्या केवल राजनीतिक दलों के बीच आरोप-प्रत्यारोप का विषय नहीं है, बल्कि इसका सीधा असर लोगों की जिंदगी और परिवारों पर पड़ रहा है। नशे की लत के कारण युवाओं का स्वास्थ्य, शिक्षा, रोजगार और सामाजिक जीवन प्रभावित हो रहा है। इसके साथ ही नशे की तस्करी से जुड़े अपराधों और संगठित नेटवर्क की चुनौती भी बनी हुई है।

एनडीपीएस एक्ट के तहत दर्ज मामलों की संख्या से पुलिस और जांच एजेंसियों की कार्रवाई का पता चलता है, लेकिन केवल मुकदमों की संख्या से नशे की उपलब्धता या समस्या में कमी का पूरा आकलन नहीं किया जा सकता। इसके लिए नशे की आपूर्ति, ओवरडोज से होने वाली मौतों, नशामुक्ति केंद्रों में उपचार, पुनर्वास और तस्करी के बड़े नेटवर्क पर कार्रवाई जैसे पहलुओं को भी देखना जरूरी है।

2017 में राहुल गांधी के बयान से मचा था बड़ा विवाद

पंजाब में नशे को चुनावी मुद्दा बनाने का कांग्रेस का इतिहास करीब एक दशक पुराना है। वर्ष 2017 के विधानसभा चुनाव प्रचार के दौरान राहुल गांधी ने पंजाब में एक रैली को संबोधित करते हुए दावा किया था कि राज्य के 70 प्रतिशत युवा नशे से प्रभावित हैं।

उनके इस बयान पर उस समय काफी राजनीतिक विवाद हुआ था। भाजपा और अन्य राजनीतिक दलों ने राहुल गांधी के दावे की आलोचना करते हुए सवाल उठाए थे। विरोधियों का कहना था कि इस तरह के आंकड़ों के जरिए पंजाब के युवाओं की छवि खराब की जा रही है। वहीं, कांग्रेस ने इसे राज्य में नशे की गंभीर समस्या की ओर ध्यान आकर्षित करने वाला बयान बताया था।

उस समय नशे का मुद्दा तत्कालीन सरकार के खिलाफ कांग्रेस के सबसे प्रभावी चुनावी हथियारों में शामिल था। कांग्रेस ने सत्ता में आने पर नशे के कारोबार को खत्म करने का वादा किया था। अब करीब दस साल बाद राहुल गांधी फिर पंजाब में नशे के मुद्दे को लेकर सक्रिय हैं, लेकिन इस बार उनकी पार्टी को भाजपा और अकाली दल के साथ-साथ आम आदमी पार्टी के खिलाफ भी अपनी रणनीति तैयार करनी है।

राजनीतिक परिस्थितियों में आए इस बदलाव ने नशे के मुद्दे को और दिलचस्प बना दिया है। पहले जिस मुद्दे पर कांग्रेस तत्कालीन सरकार को घेर रही थी, अब उसी मुद्दे पर कांग्रेस समेत सभी विपक्षी दल वर्तमान सरकार से जवाब मांग रहे हैं।

आप सरकार के सामने अपने अभियान के परिणाम दिखाने की चुनौती

आम आदमी पार्टी ने पंजाब में सत्ता हासिल करने से पहले नशे के खिलाफ निर्णायक कार्रवाई का वादा किया था। सरकार बनने के बाद नशे के नेटवर्क के खिलाफ अभियान चलाने और तस्करों पर कार्रवाई करने की घोषणाएं भी की गईं। अब चुनाव नजदीक आने के साथ विपक्षी दल सरकार से यह जानना चाहते हैं कि इन अभियानों से वास्तविक स्थिति में कितना बदलाव आया है।

सरकार के सामने सबसे बड़ी चुनौती केवल नशे के मामलों में कार्रवाई दिखाना नहीं, बल्कि युवाओं तक नशे की पहुंच रोकना और प्रभावित लोगों का प्रभावी पुनर्वास सुनिश्चित करना भी है। इसके लिए पुलिस कार्रवाई के साथ स्वास्थ्य सेवाओं, नशामुक्ति केंद्रों, रोजगार के अवसरों और सामाजिक जागरूकता पर भी ध्यान देना होगा।

वहीं, भाजपा, कांग्रेस और अकाली दल के सामने भी अपनी नशा विरोधी नीतियों और पिछले कार्यकाल के रिकॉर्ड को लेकर जनता के सवालों का जवाब देने की चुनौती होगी। पंजाब के लोग केवल राजनीतिक घोषणाओं के बजाय ठोस परिणाम देखना चाहते हैं।

2027 में नशे पर सभी दलों की परीक्षा

पंजाब में नशे की समस्या अब केवल एक राजनीतिक नारा नहीं रह गई है। यह युवाओं के भविष्य, परिवारों की सुरक्षा और प्रदेश की सामाजिक-आर्थिक स्थिति से जुड़ा गंभीर सवाल है। वर्ष 2027 के विधानसभा चुनाव में राजनीतिक दलों को यह बताना होगा कि सत्ता में आने पर वे नशे के कारोबार को रोकने के लिए क्या ठोस कदम उठाएंगे।

अमित शाह का 2029 तक नशामुक्त भारत का लक्ष्य, राहुल गांधी का भाजपा और आप पर हमला, सुखबीर बादल की लगातार सरकार विरोधी बयानबाजी और आप का पलटवार इस बात का संकेत है कि आने वाले महीनों में यह मुद्दा और गर्माएगा।

चुनावी मंचों पर नशे के खिलाफ बड़े-बड़े वादे और दावे किए जाएंगे, लेकिन पंजाब के मतदाताओं के लिए असली सवाल यही रहेगा कि कौन-सी पार्टी नशे की आपूर्ति रोकने, तस्करी के नेटवर्क को खत्म करने, ओवरडोज से होने वाली मौतों पर अंकुश लगाने और प्रभावित युवाओं को सम्मानजनक जीवन में वापस लाने की प्रभावी योजना पेश करती है। इस बार पंजाब की सियासत में नशे का मुद्दा सभी दलों के लिए बड़ी परीक्षा साबित होने वाला है।