धान छोड़ने वाले किसानों को अब हर साल बढ़ेगा लाभ, पांचवें साल तक 10 हजार रुपये प्रति एकड़ देगी हरियाणा सरकार

धान छोड़ने वाले किसानों को अब हर साल बढ़ेगा लाभ, पांचवें साल तक 10 हजार रुपये प्रति एकड़ देगी हरियाणा सरकार

‘मेरा पानी-मेरी विरासत’ और ‘फसल विविधीकरण एवं जल संरक्षण’ योजनाओं का विस्तार; डीएसआर मशीन पर 40 हजार तक सब्सिडी, हरी खाद के लिए भी मिलेगा प्रोत्साहन

हरियाणा में तेजी से गिरते भू-जलस्तर और खेती में पानी की बढ़ती खपत के बीच प्रदेश सरकार ने किसानों को धान से दूरी बनाने तथा कम पानी वाली फसलों को अपनाने के लिए प्रोत्साहन बढ़ाने का फैसला किया है। सरकार ने ‘मेरा पानी-मेरी विरासत’ और ‘फसल विविधीकरण एवं जल संरक्षण’ योजनाओं का विस्तार करते हुए इनके तहत मिलने वाली प्रोत्साहन राशि को पांच साल की अवधि में क्रमिक रूप से बढ़ाने का प्रावधान किया है।

मुख्यमंत्री नायब सिंह सैनी ने प्रोत्साहन राशि में बढ़ोतरी को मंजूरी दे दी है। इसके बाद कृषि विभाग के अतिरिक्त मुख्य सचिव विजयेंद्र कुमार की ओर से इस संबंध में अधिसूचना जारी कर दी गई है। सरकार का उद्देश्य किसानों को धान की खेती के विकल्प उपलब्ध कराना, भू-जल दोहन कम करना और ऐसी फसलों को बढ़ावा देना है, जिनमें सिंचाई के लिए अपेक्षाकृत कम पानी की जरूरत होती है।

नई व्यवस्था के तहत किसानों को केवल एक बार प्रोत्साहन देकर योजना से बाहर नहीं किया जाएगा, बल्कि वैकल्पिक खेती को लगातार जारी रखने पर हर वर्ष बढ़ी हुई राशि का लाभ मिलेगा। इससे किसानों को लंबे समय तक धान के स्थान पर दूसरी फसलों की खेती जारी रखने के लिए आर्थिक रूप से प्रोत्साहित करने की कोशिश की गई है।

पांच साल में 10 हजार रुपये तक पहुंचेगी प्रोत्साहन राशि

‘मेरा पानी-मेरी विरासत’ योजना के तहत धान की जगह स्वीकृत वैकल्पिक फसल लगाने वाले किसानों के लिए प्रोत्साहन राशि में चरणबद्ध बढ़ोतरी की गई है। पहले साल किसान को प्रति एकड़ 8,000 रुपये दिए जाएंगे। दूसरे साल यह राशि बढ़कर 8,300 रुपये, तीसरे साल 8,800 रुपये, चौथे साल 9,400 रुपये और पांचवें साल 10,000 रुपये प्रति एकड़ हो जाएगी।

इस व्यवस्था का सीधा लाभ उन किसानों को मिलेगा जो लगातार वैकल्पिक फसलों को अपनाते हैं। यानी किसान यदि एक साल धान छोड़कर वैकल्पिक फसल लगाता है और अगले वर्षों में भी उसी व्यवस्था को जारी रखता है तो उसके लिए प्रोत्साहन राशि बढ़ती जाएगी।

सरकार ने दालों, तिलहनों और कपास की खेती को अतिरिक्त बढ़ावा देने के लिए 2,000 रुपये प्रति एकड़ का अलग बोनस भी निर्धारित किया है। इससे इन फसलों की ओर किसानों को आकर्षित करने की कोशिश की गई है।

धान की सीधी बिजाई पर भी बढ़ेगी सहायता

सरकार ने केवल धान छोड़कर दूसरी फसल लगाने वाले किसानों पर ही ध्यान नहीं दिया है, बल्कि पानी की बचत करने वाली धान की सीधी बिजाई यानी डीएसआर पद्धति को अपनाने वालों के लिए भी प्रोत्साहन राशि बढ़ाई है।

डीएसआर के तहत पहले वर्ष 4,500 रुपये प्रति एकड़ दिए जाएंगे। दूसरे वर्ष यह राशि 4,700 रुपये, तीसरे वर्ष 5,000 रुपये, चौथे वर्ष 5,400 रुपये और पांचवें वर्ष 6,000 रुपये प्रति एकड़ तक पहुंच जाएगी।

इस व्यवस्था के जरिए सरकार धान की खेती पूरी तरह छोड़ने के साथ-साथ उन किसानों को भी प्रोत्साहित करना चाहती है जो धान की खेती तो करते हैं, लेकिन पारंपरिक तरीके के बजाय ऐसी तकनीक अपनाते हैं जिससे पानी की खपत कम की जा सके।

एक ही किला नंबर की शर्त जरूरी

बढ़ी हुई प्रोत्साहन राशि का लाभ लेने के लिए किसानों को रिकॉर्ड संबंधी एक महत्वपूर्ण शर्त पूरी करनी होगी। योजना का लाभ उठाने के लिए ‘मेरी फसल-मेरा ब्यौरा’ पोर्टल पर दर्ज किला नंबर वही होना चाहिए, जिस खेत में निर्धारित शर्तों के अनुसार फसल विविधीकरण किया जा रहा है।

इसका मकसद खेत और फसल के रिकॉर्ड को आपस में जोड़कर योजना के तहत पात्रता सुनिश्चित करना है। इसलिए किसानों को पोर्टल पर अपनी भूमि और फसल संबंधी जानकारी दर्ज करते समय विशेष सावधानी बरतनी होगी।

किन फसलों को मिलेगा योजना में स्थान

‘मेरा पानी-मेरी विरासत’ के तहत धान के विकल्प के रूप में किसानों को कई फसलों की खेती करने की अनुमति दी गई है। पहली बार किसी खेत में धान की जगह मक्का, कपास, खरीफ की दालें, खरीफ के तिलहन, चारे की फसलें, कृषि-वानिकी, बागवानी फसलें और सब्जियां लगाने वाले किसान प्रोत्साहन के पात्र होंगे।

खरीफ की दालों में अरहर, मूंग, मोठ, उड़द, ग्वार और सोयाबीन को शामिल किया गया है। इसी तरह तिल, अरंडी और मूंगफली खरीफ तिलहनों की श्रेणी में रखे गए हैं। किसानों को चारे की फसलों तथा कृषि-वानिकी के तहत पापुलर और सफेदा लगाने पर भी योजना का लाभ मिल सकेगा।

इसके अलावा खरीफ की प्याज सहित विभिन्न बागवानी फसलों और सब्जियों को भी धान के विकल्प के तौर पर शामिल किया गया है। इस तरह किसानों को केवल एक या दो विकल्पों तक सीमित रखने के बजाय फसल विविधीकरण के लिए व्यापक विकल्प उपलब्ध कराने की कोशिश की गई है।

खेत खाली छोड़ने वाले किसान भी दायरे में

योजना की एक खास बात यह है कि जिन किसानों ने धान की खेती नहीं की और इसके बजाय अपने खेत को खाली छोड़ दिया, वे भी निर्धारित शर्तों के तहत योजना का लाभ प्राप्त कर सकेंगे। इसका उद्देश्य केवल फसल बदलने को बढ़ावा देना नहीं, बल्कि धान की वजह से होने वाले अत्यधिक भू-जल दोहन को रोकना भी है।

सरकार की कोशिश है कि किसान धान की खेती के स्थान पर पानी की कम आवश्यकता वाली फसलों को अपनाएं या आवश्यकता के अनुसार खेत को खाली रखें, ताकि भू-जल पर दबाव कम किया जा सके।

पिछले साल धान बोया था तो इस साल विकल्प अपनाना होगा

फिलहाल योजना के तहत पात्रता के लिए एक महत्वपूर्ण आधार पिछले साल की खेती को बनाया गया है। वही किसान योजना का लाभ उठा सकेंगे, जिन्होंने पिछले वर्ष संबंधित खेत में धान की खेती की थी और चालू वर्ष में उसी खेत में सरकार द्वारा स्वीकृत वैकल्पिक फसलों में से कोई फसल लगाई है।

हालांकि, ऐसे किसान पात्र नहीं होंगे जिन्होंने पिछले चार वर्षों में से किसी भी वर्ष उसी खेत यानी उसी किला नंबर पर वैकल्पिक फसलें उगाई थीं। इससे योजना का लाभ नए तौर पर फसल विविधीकरण अपनाने वाले किसानों को प्राथमिकता के आधार पर देने की व्यवस्था की गई है।

लगातार फसल बदलते रहने पर बढ़ता रहेगा फायदा

जिन किसानों ने पिछले खरीफ सीजन में ‘मेरा पानी-मेरी विरासत’ योजना के तहत फसल विविधीकरण अपनाया था, वे इस साल भी प्रोत्साहन राशि के पात्र हो सकते हैं। इसके लिए जरूरी होगा कि वे उसी खेत में योजना के तहत मंजूर वैकल्पिक फसलों में से किसी फसल की खेती करें।

यानी योजना का लाभ लगातार बनाए रखने के लिए किसान को फसल विविधीकरण की प्रक्रिया जारी रखनी होगी। जैसे-जैसे वह निर्धारित व्यवस्था के तहत वैकल्पिक खेती करता रहेगा, उसे अगले वर्षों की बढ़ी हुई प्रोत्साहन राशि मिलती जाएगी।

एक साल फसल बदलने के बाद फिर छोड़ा तो लाभ रुक जाएगा

सरकार ने योजना को निरंतरता से जोड़ते हुए यह भी स्पष्ट किया है कि यदि कोई किसान किसी बाद के वर्ष में संबंधित किला नंबर पर वैकल्पिक फसल लगाना बंद कर देता है तो वह उस विशेष वर्ष की प्रोत्साहन राशि का पात्र नहीं होगा।

हालांकि, यदि किसान एक साल के अंतराल के बाद फिर उसी किला नंबर पर वैकल्पिक फसल की खेती शुरू करता है तो इसे नया नामांकन माना जाएगा। ऐसी स्थिति में उसे फिर से पहले वर्ष के स्तर पर 8,000 रुपये प्रति एकड़ का शुरुआती प्रोत्साहन मिलेगा।

इस प्रावधान के जरिए सरकार चाहती है कि किसानों को लंबे समय तक फसल विविधीकरण अपनाने के लिए प्रेरित किया जाए और योजना की बढ़ती प्रोत्साहन राशि का लाभ उन्हीं किसानों को मिले जो लगातार निर्धारित फसल व्यवस्था को अपनाते हैं।

डीएसआर मशीन खरीदने पर 40 हजार तक सहायता

धान की खेती में पानी की बचत करने वाली डीएसआर तकनीक को बढ़ावा देने के लिए सरकार ने मशीनरी पर भी सहायता का प्रावधान किया है। डीएसआर मशीन खरीदने वाले किसानों को मशीन की कीमत का 50 प्रतिशत या अधिकतम 40,000 रुपये तक की सब्सिडी दी जाएगी। दोनों में से जो राशि कम होगी, उतनी ही सब्सिडी मान्य होगी।

इस राशि का भुगतान सीधे लाभार्थी किसानों के बैंक खातों में डायरेक्ट बेनिफिट ट्रांसफर यानी डीबीटी के माध्यम से किया जाएगा। इससे किसानों को मशीन खरीदने के बाद सब्सिडी की राशि सीधे उनके बैंक खाते में प्राप्त होगी।

डीएसआर तकनीक का इस्तेमाल धान की सीधी बिजाई के लिए किया जाता है। सरकार इसे पानी की बचत से जोड़कर देख रही है और इसके जरिए पारंपरिक धान रोपाई की तुलना में सिंचाई की जरूरत को कम करने का प्रयास किया जा रहा है।

हरी खाद को भी मिलेगा बढ़ावा

फसल विविधीकरण के साथ-साथ सरकार ने खेतों में हरी खाद तैयार करने को भी प्रोत्साहन देने का फैसला किया है। किसानों को हरी खाद वाली फसलें उगाने पर 1,000 रुपये प्रति एकड़ की सहायता दी जाएगी।

ढैंचा, गर्मी की मूंग, उड़द, लोबिया, मोठ, अरहर, सोयाबीन और ग्वार जैसी फसलों को इस प्रोत्साहन के दायरे में रखा गया है। इन फसलों के माध्यम से खेतों में जैविक पदार्थ बढ़ाने और मिट्टी की गुणवत्ता सुधारने की दिशा में भी किसानों को प्रोत्साहित किया जाएगा।

भू-जल संरक्षण पर सरकार का जोर

हरियाणा के कई क्षेत्रों में भू-जलस्तर लगातार नीचे जाने के कारण धान की खेती को पानी की उपलब्धता से जोड़कर देखा जाता रहा है। विशेष रूप से धान की फसल में सिंचाई के लिए बड़ी मात्रा में पानी की जरूरत होती है। ऐसे में सरकार फसल विविधीकरण, धान की सीधी बिजाई और वैकल्पिक फसलों के माध्यम से कृषि क्षेत्र में पानी की खपत कम करने की नीति पर जोर दे रही है।

‘मेरा पानी-मेरी विरासत’ के तहत बढ़ती प्रोत्साहन राशि को इसी व्यापक रणनीति का हिस्सा माना जा रहा है। सरकार किसानों को आर्थिक लाभ देकर ऐसी फसलों की ओर ले जाना चाहती है, जिनसे उनकी आमदनी का विकल्प बना रहे और भू-जल पर निर्भरता भी कम हो।

नई व्यवस्था में लगातार वैकल्पिक फसल अपनाने वाले किसानों को पांचवें वर्ष तक 10,000 रुपये प्रति एकड़ तक प्रोत्साहन मिलने से योजना का आर्थिक आकर्षण बढ़ेगा। वहीं दाल, तिलहन और कपास पर अतिरिक्त 2,000 रुपये के बोनस से इन फसलों को विशेष प्रोत्साहन मिलेगा।

इस तरह सरकार ने फसल विविधीकरण को केवल एक सीजन की पहल के बजाय लंबी अवधि की प्रक्रिया के रूप में आगे बढ़ाने की तैयारी की है। किसानों को वैकल्पिक फसलें अपनाने, डीएसआर तकनीक का इस्तेमाल करने और हरी खाद तैयार करने के लिए अलग-अलग स्तर पर आर्थिक सहायता देने से आने वाले समय में हरियाणा की खेती को कम पानी वाली कृषि व्यवस्था की ओर ले जाने की कोशिश की जा रही है।