चंडीगढ़। पंजाब विधानसभा के शून्यकाल में अवैध खनन का मुद्दा उठने के बाद सदन में सत्ता पक्ष और विपक्ष के बीच जोरदार टकराव देखने को मिला। कांग्रेस ने प्रदेश में अवैध खनन की वास्तविक स्थिति का पता लगाने के लिए विधानसभा की एक विशेष कमेटी गठित करने की मांग की, लेकिन मांग पर सहमति नहीं बनने के बाद कांग्रेस विधायक दल ने सरकार के खिलाफ नारेबाजी करते हुए सदन से वॉकआउट कर दिया। विपक्ष ने आरोप लगाया कि सरकार जमीनी स्तर पर अवैध खनन की स्थिति को लेकर पारदर्शी तरीके से जांच कराने से बच रही है। वहीं, सरकार ने आरोपों को खारिज करते हुए खनन क्षेत्र में राजस्व बढ़ने और अवैध गतिविधियों पर नियंत्रण का दावा किया।
मामला उस समय गरमा गया जब नेता प्रतिपक्ष प्रताप सिंह बाजवा ने विधानसभा में अवैध खनन की स्थिति पर चर्चा करते हुए कहा कि केवल सरकारी आंकड़ों के आधार पर स्थिति का सही आकलन नहीं किया जा सकता। उन्होंने मांग की कि सदन की एक कमेटी बनाई जाए, जो उन इलाकों का दौरा करे जहां अवैध खनन की शिकायतें सामने आ रही हैं और स्थानीय लोगों से बातचीत कर वास्तविक स्थिति की रिपोर्ट विधानसभा के सामने रखे।
कांग्रेस के अन्य विधायकों ने भी बाजवा की मांग का समर्थन किया। विपक्ष का कहना था कि यदि सरकार को अपने दावों पर पूरा भरोसा है तो उसे स्वतंत्र रूप से विधानसभा कमेटी को प्रभावित क्षेत्रों का दौरा करने की अनुमति देने में कोई आपत्ति नहीं होनी चाहिए। लेकिन जब कमेटी गठित करने की मांग स्वीकार नहीं हुई तो कांग्रेस विधायक दल ने सदन में नारेबाजी शुरू कर दी। इसके बाद कांग्रेस के विधायक सदन से बाहर चले गए।
खनन एवं भू-विज्ञान मंत्री बरिंदर कुमार गोयल ने विपक्ष के आरोपों का जवाब देते हुए सरकार का पक्ष रखा। उन्होंने कहा कि पंजाब में अवैध खनन की शिकायतों को गंभीरता से लिया जा रहा है और जहां भी शिकायत प्राप्त होती है, वहां संबंधित विभाग की ओर से सर्वे कराया जाता है। यदि जांच में शिकायत सही पाई जाती है तो एफआईआर दर्ज करने सहित कानूनी कार्रवाई की जाती है।
गोयल ने दावा किया कि मौजूदा सरकार के कार्यकाल में अवैध खनन पर काफी हद तक नियंत्रण किया गया है। उन्होंने खनन से मिलने वाले राजस्व के आंकड़ों का उल्लेख करते हुए कहा कि पिछली सरकारों के समय राज्य को खनन से करीब 120 करोड़ रुपये का राजस्व प्राप्त होता था, जबकि मौजूदा सरकार ने इस वित्तीय वर्ष में करीब 825 करोड़ रुपये का राजस्व जुटाया है।
मंत्री ने कहा कि राजस्व में हुई यह वृद्धि केवल सरकारी आय में इजाफा नहीं है, बल्कि यह संकेत देती है कि खनन क्षेत्र को अधिक व्यवस्थित और नियमन के दायरे में लाने का प्रयास किया गया है। उनके अनुसार सरकार की कोशिश है कि प्राकृतिक संसाधनों का दोहन नियमों के तहत हो और राज्य को उसकी उचित आर्थिक हिस्सेदारी मिले।
गोयल ने यह भी दावा किया कि केंद्र सरकार की ओर से करवाए गए खनन क्षेत्र के सुधारों के मूल्यांकन में पंजाब ने अपनी श्रेणी में देशभर में पहला स्थान प्राप्त किया है। इस उपलब्धि के लिए राज्य को करीब 200 करोड़ रुपये का अप्रिसिएशन अवॉर्ड मिलने की बात उन्होंने सदन में कही। मंत्री के अनुसार यह इस बात का प्रमाण है कि राज्य में खनन प्रशासन और नियमन को बेहतर बनाने के लिए कई स्तरों पर काम किया गया है।
अवैध खनन के साथ-साथ मंत्री ने पंजाब के खनिज संसाधनों की संभावनाओं का भी उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि पिछली सरकारों का ध्यान मुख्य रूप से रेत और बजरी तक सीमित रहा और राज्य की धरती के नीचे मौजूद दूसरे खनिज संसाधनों की व्यापक खोज नहीं की गई।
गोयल ने पोटाश का उदाहरण देते हुए कहा कि पंजाब में वर्ष 1989 में पोटाश की मौजूदगी की जानकारी सामने आई थी, लेकिन उसके बाद इस दिशा में पर्याप्त काम नहीं हुआ। उन्होंने कहा कि वर्तमान सरकार ने इस मुद्दे को दोबारा केंद्र के समक्ष उठाया और ओडिशा तथा गुजरात में हुई बैठकों के दौरान पंजाब में पोटाश की संभावनाओं पर चर्चा की गई।
मंत्री के अनुसार इसके बाद केंद्र सरकार की ओर से करीब 19 करोड़ रुपये की राशि मंजूर की गई और राज्य में 10 अलग-अलग स्थानों पर ड्रिलिंग का काम शुरू किया गया है। यदि इन क्षेत्रों में पोटाश का व्यावसायिक स्तर का भंडार मिलता है तो इससे पंजाब को भविष्य में बड़ा आर्थिक लाभ मिल सकता है। उन्होंने कहा कि सरकार केवल पोटाश ही नहीं, बल्कि जमीन के नीचे उपलब्ध अन्य खनिज संसाधनों की भी पहचान करने के लिए प्रयास कर रही है।
विधानसभा में खनन के मुद्दे पर बहस के दौरान भाखड़ा बांध को लेकर भी चर्चा हुई। भाजपा विधायक अश्विनी शर्मा, कांग्रेस विधायक अजयवीर सिंह जाखड़ और विधायक मनप्रीत सिंह अयाली द्वारा उठाए गए विभिन्न मुद्दों का जवाब देते हुए बरिंदर कुमार गोयल ने भाखड़ा बांध की सुरक्षा को लेकर लोगों में फैली आशंकाओं को दूर करने का प्रयास किया।
गोयल ने कहा कि कुछ समय पहले एक समाचार चैनल द्वारा भाखड़ा बांध के झुकने की खबर प्रसारित किए जाने के बाद लोगों में चिंता और भ्रम की स्थिति पैदा हो गई थी। उन्होंने स्पष्ट किया कि बांध की संरचना ऐसी है कि जलाशय में पानी का दबाव बढ़ने पर बांध में मामूली झुकाव आना इंजीनियरिंग की सामान्य प्रक्रिया का हिस्सा है। पानी का दबाव कम होने पर बांध वापस अपनी सामान्य स्थिति में आ जाता है।
मंत्री ने दावा किया कि वर्ष 1995 से 2025 के बीच इस तरह की स्थिति करीब 15 बार सामने आई और प्रत्येक बार बांध सामान्य स्थिति में लौट आया। उन्होंने कहा कि भाखड़ा बांध की इंजीनियरिंग क्षमता का अध्ययन करने के लिए दुनिया के कई देशों के विशेषज्ञ यहां आ चुके हैं और उन्होंने इसकी संरचना की सराहना की है। इसलिए बांध की सुरक्षा को लेकर अनावश्यक भय पैदा नहीं किया जाना चाहिए।
भाखड़ा बांध में सिल्ट जमा होने के मुद्दे पर भी मंत्री ने सरकार का पक्ष रखा। उन्होंने बताया कि बांध में करीब 26 प्रतिशत सिल्ट जमा हो चुकी है, जिसके कारण जल भंडारण क्षमता पर असर पड़ा है। हालांकि उन्होंने स्पष्ट किया कि सिल्ट का जमा होना बांध की संरचनात्मक सुरक्षा से जुड़ा मामला नहीं है।
गोयल के अनुसार सिल्ट हटाने की जिम्मेदारी भाखड़ा ब्यास प्रबंधन बोर्ड यानी बीबीएमबी और केंद्र सरकार की है। पंजाब सरकार की ओर से बीबीएमबी की बैठकों में इस मुद्दे को कई बार उठाया गया है। उन्होंने कहा कि हाल ही में राज्य सरकार ने केंद्र को पत्र लिखकर भी इस समस्या के समाधान की मांग की है। यदि सिल्ट को हटाया जाता है तो बांध की जल भंडारण क्षमता को बढ़ाने में मदद मिलेगी।
खनन को लेकर सरकार के दावों पर भाजपा विधायक अश्विनी शर्मा ने भी सवाल उठाए। मंत्री के जवाब के दौरान शर्मा सदन में मौजूद नहीं थे, लेकिन बाद में वापस आने के बाद उन्होंने सरकार पर निशाना साधा। शर्मा ने आरोप लगाया कि राज्य में अवैध खनन के खिलाफ आवाज उठाने वाले लोगों पर दबाव बनाया जाता है और उन्हें धमकियों का सामना करना पड़ता है।
भाजपा विधायक ने दावा किया कि सरकार ने राज्य में खनन से 20 हजार करोड़ रुपये तक का राजस्व हासिल करने की बात कही थी, लेकिन उस लक्ष्य को पूरा नहीं किया गया। उन्होंने कहा कि यदि सरकार को वास्तव में यह जानना है कि प्रदेश में अवैध खनन की स्थिति क्या है, तो अधिकारियों और मंत्रियों को केवल फाइलों और रिपोर्टों तक सीमित रहने के बजाय प्रभावित इलाकों में जाना चाहिए।
शर्मा ने कहा कि विधानसभा की कमेटी बनाकर वास्तविक स्थिति की जांच करना सबसे बेहतर तरीका हो सकता है। कमेटी प्रभावित क्षेत्रों का दौरा कर सकती है, स्थानीय निवासियों से बातचीत कर सकती है और यह पता लगा सकती है कि सरकारी दावों और जमीन पर मौजूद स्थिति में कितना अंतर है।
उन्होंने राज्य सरकार पर हर मामले में केंद्र सरकार को जिम्मेदार ठहराने का भी आरोप लगाया। शर्मा के अनुसार पंजाब सरकार को अपनी जिम्मेदारियों से बचने के बजाय उन मुद्दों पर जवाब देना चाहिए जो सीधे राज्य सरकार के अधिकार क्षेत्र में आते हैं।
वहीं, खनन विवाद के बीच वित्त मंत्री हरपाल सिंह चीमा ने केंद्र सरकार पर निशाना साधते हुए पंजाब के वित्तीय अधिकारों का मुद्दा उठाया। चीमा ने कहा कि भाजपा नेता केंद्र और राज्य के संबंधों की बात करते हैं, लेकिन केंद्र सरकार पंजाब को मिलने वाला उसका वैधानिक हिस्सा रोक रही है।
उन्होंने भाजपा विधायकों को चुनौती देते हुए कहा कि यदि केंद्र में उनकी पार्टी की सरकार है तो उन्हें पंजाब का बकाया पैसा केंद्र से दिलवाना चाहिए। चीमा ने कहा कि राज्य को उसके हिस्से की राशि मिलने से विकास कार्यों और जनकल्याणकारी योजनाओं को गति मिल सकती है।
वित्त मंत्री ने आंगनबाड़ी कार्यकर्ताओं, आशा वर्करों और मिड-डे मील कर्मचारियों के मानदेय का मुद्दा भी उठाया। उन्होंने सवाल किया कि इन कर्मचारियों के मानदेय में लंबे समय से अपेक्षित वृद्धि क्यों नहीं की गई। चीमा के अनुसार इन कर्मचारियों की सेवाएं ग्रामीण और कमजोर वर्गों तक सरकार की योजनाएं पहुंचाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं।
चीमा ने केंद्र की योजनाओं की फंडिंग व्यवस्था पर भी सवाल खड़े किए। उन्होंने आरोप लगाया कि कई केंद्रीय योजनाओं की शुरुआत के समय केंद्र सरकार बड़ी हिस्सेदारी के साथ योजनाएं लागू करती है, लेकिन बाद में अपनी वित्तीय हिस्सेदारी कम कर देती है। इससे राज्यों पर अतिरिक्त आर्थिक बोझ पड़ता है और उन्हें अपनी ओर से अधिक राशि खर्च करनी पड़ती है।
उन्होंने कहा कि पंजाब देश के खाद्यान्न उत्पादन में महत्वपूर्ण योगदान देता है और लंबे समय से देश के अन्न भंडार की भूमिका निभाता आया है। इसके बावजूद यदि राज्य को वित्तीय संसाधनों में उसका उचित हिस्सा नहीं मिलता तो यह पंजाब के साथ आर्थिक अन्याय है। चीमा ने केंद्र से राज्य के बकाया और वैधानिक हिस्से को जारी करने की मांग की।
विधानसभा में हुई इस पूरी बहस से स्पष्ट है कि अवैध खनन का मुद्दा अब केवल पर्यावरण और कानून-व्यवस्था तक सीमित नहीं रहा, बल्कि यह पंजाब की राजनीति में राजस्व, केंद्र-राज्य संबंध और प्रशासनिक जवाबदेही से भी जुड़ गया है। विपक्ष जहां सरकार के दावों की जमीनी जांच की मांग कर रहा है, वहीं सरकार खनन राजस्व में वृद्धि और सुधारों में बेहतर प्रदर्शन को अपनी उपलब्धि के रूप में पेश कर रही है।
कांग्रेस के वॉकआउट ने इस राजनीतिक टकराव को और तेज कर दिया। विपक्ष का कहना है कि विधानसभा कमेटी के माध्यम से प्रभावित क्षेत्रों की वास्तविक स्थिति सामने आनी चाहिए, जबकि सरकार का तर्क है कि शिकायत मिलने पर विभागीय स्तर पर कार्रवाई की जा रही है और अवैध खनन पर नियंत्रण के लिए कई कदम उठाए गए हैं।
अब देखना यह होगा कि आने वाले दिनों में सरकार विपक्ष की कमेटी संबंधी मांग पर कोई निर्णय लेती है या नहीं। यदि कमेटी का गठन होता है तो उसके क्षेत्रीय दौरे और रिपोर्ट से पंजाब में अवैध खनन की वास्तविक तस्वीर सामने आ सकती है। वहीं, यदि मांग को स्वीकार नहीं किया जाता है तो यह मुद्दा आगामी विधानसभा कार्यवाही में भी सत्ता पक्ष और विपक्ष के बीच टकराव का कारण बन सकता है।
फिलहाल विधानसभा की बहस ने पंजाब में खनन गतिविधियों की निगरानी, प्राकृतिक संसाधनों के इस्तेमाल, सरकारी राजस्व और केंद्र से राज्य को मिलने वाली वित्तीय हिस्सेदारी जैसे कई महत्वपूर्ण सवालों को एक साथ राजनीतिक बहस के केंद्र में ला दिया है।




