चंडीगढ़। पंजाब में सरकारी शिक्षा व्यवस्था को लेकर राज्य सरकार ने बड़े बदलाव का दावा किया है। स्कूल शिक्षा मंत्री हरजोत सिंह बैंस ने विधानसभा में शिक्षा से जुड़े प्रस्ताव पर चर्चा के दौरान कहा कि पंजाब ने स्कूल शिक्षा के क्षेत्र में देश के सामने नई मिसाल पेश की है। उनके अनुसार, राज्य ने ‘नीति आयोग स्कूल एजुकेशन क्वालिटी इंडेक्स 2026’ में केरल को पीछे छोड़ते हुए पहला स्थान हासिल किया है। उन्होंने कहा कि जिन सरकारी स्कूलों में कुछ वर्ष पहले बुनियादी सुविधाओं की कमी को लेकर सवाल उठते थे, उन्हीं स्कूलों के विद्यार्थी अब राष्ट्रीय स्तर की प्रतिस्पर्धी परीक्षाओं में बेहतर प्रदर्शन कर रहे हैं।
विधायक प्रो. जसवंत सिंह गज्जनमाजरा की ओर से लाए गए शिक्षा संबंधी प्रस्ताव पर बहस के दौरान हरजोत सिंह बैंस ने सरकार की ओर से किए गए शिक्षा सुधारों का विस्तृत ब्यौरा सदन के सामने रखा। उन्होंने जुलाई 2022 में शिक्षा मंत्री का पद संभालने के समय सरकारी स्कूलों की स्थिति का उल्लेख करते हुए कहा कि उस समय राज्य के हजारों स्कूलों में बुनियादी सुविधाओं की कमी थी। उनके अनुसार प्रारंभिक सर्वेक्षण में सामने आया था कि 8,000 से अधिक सरकारी स्कूलों में चारदीवारी नहीं थी, जबकि करीब 3,200 स्कूलों में विद्यार्थियों के इस्तेमाल लायक बाथरूम तक उपलब्ध नहीं थे।
बैंस ने कहा कि उस समय लगभग चार लाख विद्यार्थी जमीन या चटाइयों पर बैठकर पढ़ने के लिए मजबूर थे। स्कूलों में पाठ्यपुस्तकों की उपलब्धता भी एक बड़ी समस्या थी। उनके मुताबिक किताबें अकसर अक्टूबर या नवंबर तक स्कूलों में पहुंचती थीं, जिससे शैक्षणिक सत्र का शुरुआती महत्वपूर्ण समय प्रभावित होता था। शिक्षा मंत्री ने दावा किया कि अब व्यवस्था में बड़ा बदलाव किया गया है और पाठ्यपुस्तकें 15 फरवरी तक जिला मुख्यालयों में पहुंच जाती हैं तथा 31 मार्च तक विद्यार्थियों को वितरित कर दी जाती हैं।
उन्होंने कहा कि सरकार ने शिक्षा सुधारों को केवल चंडीगढ़ में बैठकर तैयार नहीं किया, बल्कि जमीनी स्थिति को समझने के लिए उन्होंने स्वयं राज्य के विभिन्न हिस्सों का दौरा किया। बैंस के अनुसार वह पंजाब के 2,000 से अधिक सरकारी स्कूलों में व्यक्तिगत रूप से जा चुके हैं। इनमें सीमावर्ती इलाकों, जीरो लाइन के नजदीक स्थित गांवों और दूरदराज के क्षेत्रों के स्कूल भी शामिल रहे। उन्होंने कहा कि इन दौरों के दौरान उन्हें न केवल स्कूलों की वास्तविक स्थिति समझने का मौका मिला, बल्कि शिक्षकों, विद्यार्थियों और अभिभावकों से सीधे संवाद कर शिक्षा व्यवस्था की चुनौतियों को जानने में भी मदद मिली।
शिक्षा मंत्री ने बुनियादी शिक्षा में सुधार के लिए सरकार के ‘मिशन समर्थ’ कार्यक्रम को प्रमुख उपलब्धियों में शामिल किया। उन्होंने कहा कि यह कार्यक्रम बच्चों की सीखने की क्षमता के आधार पर शिक्षा देने की अवधारणा पर काम करता है। इसमें विद्यार्थियों को केवल उनकी कक्षा के आधार पर नहीं, बल्कि उनकी वास्तविक शैक्षणिक क्षमता के अनुसार समूहों में बांटा जाता है। इसका उद्देश्य बच्चों को पढ़ने, लिखने और गणित की बुनियादी समझ मजबूत कराना है।
बैंस ने विधानसभा में अपने स्कूल दौरों का अनुभव साझा करते हुए कहा कि वर्ष 2022 में उन्हें कई ऐसे विद्यार्थी मिले जो कक्षा आठ में पढ़ रहे थे, लेकिन सामान्य वाक्य तक लिखने में कठिनाई महसूस करते थे। कुछ विद्यार्थी साधारण जोड़ और घटाव भी नहीं कर पा रहे थे। उन्होंने कहा कि ऐसे बच्चों की पहचान कर उन्हें उनकी सीखने की वास्तविक क्षमता के स्तर से पढ़ाना शुरू किया गया। कई मामलों में आठवीं कक्षा के विद्यार्थियों को तीसरी कक्षा के स्तर से पढ़ाई कराई गई, ताकि उनकी बुनियादी समझ मजबूत हो सके।
शिक्षा मंत्री के अनुसार मिशन समर्थ के तहत अब हर वर्ष करीब 12 लाख विद्यार्थियों और 70 हजार से अधिक शिक्षकों को शामिल किया जा रहा है। सरकार का उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि किसी बच्चे की उम्र या कक्षा उसके सीखने में बाधा न बने और कमजोर विद्यार्थियों को उनकी जरूरत के अनुसार अतिरिक्त शैक्षणिक सहायता उपलब्ध हो।
सरकारी स्कूलों में पढ़ने वाले विद्यार्थियों के प्रतिस्पर्धी परीक्षाओं में प्रदर्शन को शिक्षा सुधारों का प्रमुख परिणाम बताते हुए बैंस ने कहा कि वर्ष 2021 में पंजाब के सरकारी स्कूलों से केवल 80 विद्यार्थियों ने NEET-UG परीक्षा पास की थी, जबकि वर्ष 2026 में यह संख्या बढ़कर 882 हो गई। उन्होंने इसे राज्य की शिक्षा व्यवस्था में आए बदलाव का महत्वपूर्ण संकेत बताया।
उन्होंने कहा कि इस सफलता के पीछे ‘पंजाब अकादमिक कोचिंग फॉर एक्सीलेंस’ यानी PACE जैसी पहलों की महत्वपूर्ण भूमिका रही है। इन कार्यक्रमों के जरिए सरकारी स्कूलों के विद्यार्थियों को प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी के लिए बेहतर शैक्षणिक माहौल और अतिरिक्त सहायता उपलब्ध कराने का प्रयास किया गया है।
बैंस ने कहा कि मजीठा क्षेत्र के सरकारी स्कूलों से छह विद्यार्थियों और दीनानगर से 17 विद्यार्थियों का NEET परीक्षा में सफल होना इस बात का प्रमाण है कि सरकारी स्कूलों के बच्चे भी उचित मार्गदर्शन और संसाधन मिलने पर राष्ट्रीय स्तर की परीक्षाओं में शानदार प्रदर्शन कर सकते हैं। उन्होंने कहा कि ये उपलब्धियां किसी निजी कोचिंग संस्थान की नहीं, बल्कि सरकारी स्कूलों में पढ़ने वाले विद्यार्थियों की हैं।
शिक्षा मंत्री ने हरनूरप्रीत कौर का भी विशेष रूप से उल्लेख किया। उन्होंने बताया कि साधारण परिवार से आने वाली इस छात्रा ने अपनी श्रेणी में ऑल इंडिया रैंक 3140 हासिल की। बैंस ने इसे सरकारी शिक्षा व्यवस्था में बढ़ते आत्मविश्वास का उदाहरण बताया और कहा कि ऐसे परिणाम उन परिवारों के लिए उम्मीद पैदा करते हैं जो अपने बच्चों को गुणवत्तापूर्ण शिक्षा दिलाना चाहते हैं लेकिन महंगी निजी शिक्षा का खर्च उठाने की स्थिति में नहीं होते।
विपक्ष की ओर से सरकारी स्कूलों की स्थिति और शिक्षा व्यवस्था को लेकर उठाए गए सवालों का जवाब देते हुए बैंस ने कहा कि यदि राजनीतिक विरोध करना है तो उन्हें व्यक्तिगत रूप से निशाना बनाया जा सकता है, लेकिन सरकारी स्कूलों और वहां पढ़ने वाले बच्चों को राजनीतिक बहस का विषय नहीं बनाया जाना चाहिए। उन्होंने आरोप लगाया कि लंबे समय से सरकारी स्कूलों को लेकर नकारात्मक धारणा बनाई गई, जिसके कारण कई अभिभावकों का सरकारी शिक्षा व्यवस्था पर भरोसा कमजोर हुआ।
सरकारी स्कूलों में विद्यार्थियों की संख्या में कमी को लेकर उठाए गए सवालों पर भी शिक्षा मंत्री ने अपनी स्थिति स्पष्ट की। उन्होंने कहा कि सरकारी स्कूलों में दाखिले में कमी केवल पंजाब की समस्या नहीं है, बल्कि कोविड महामारी के बाद देश के कई राज्यों में ऐसा रुझान देखने को मिला है। उन्होंने राष्ट्रीय स्तर के आंकड़ों का हवाला देते हुए कहा कि महामारी के दौरान सरकारी स्कूलों में विद्यार्थियों की संख्या बढ़ी थी, लेकिन परिस्थितियां सामान्य होने के बाद कई राज्यों में दाखिले कम हुए।
बैंस ने बिहार, उत्तर प्रदेश और महाराष्ट्र के उदाहरण देते हुए कहा कि बिहार में विद्यार्थियों की संख्या पहले करीब 2.49 करोड़ थी, जो घटकर लगभग 2.13 करोड़ रह गई और आगे और कमी का अनुमान है। इसी तरह उत्तर प्रदेश में विद्यार्थियों की संख्या करीब 4.44 करोड़ से घटकर 4.16 करोड़ हुई है। महाराष्ट्र में भी विद्यार्थियों की संख्या में गिरावट का रुझान देखने को मिला है। उनका कहना था कि इसलिए केवल पंजाब के आंकड़ों के आधार पर शिक्षा व्यवस्था की स्थिति का आकलन करना उचित नहीं होगा।
शिक्षा मंत्री ने विद्यार्थियों की संख्या से जुड़े आंकड़ों को अधिक सटीक बनाने के लिए केंद्र सरकार की ‘APAAR ID’ व्यवस्था का भी उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि प्रत्येक विद्यार्थी के लिए विशिष्ट पहचान संख्या उपलब्ध होने से अब स्कूलों में दाखिले के आंकड़ों की वास्तविक स्थिति का पता लगाना आसान हो गया है। पहले एक ही विद्यार्थी का अलग-अलग स्कूलों में नाम दर्ज होने जैसी स्थितियां सामने आती थीं, जिससे वास्तविक नामांकन का सही आकलन करना मुश्किल होता था। उनके अनुसार डिजिटल पहचान व्यवस्था के बाद ऐसे आंकड़ों को अधिक व्यवस्थित और पारदर्शी बनाने में मदद मिली है।
बुनियादी ढांचे को लेकर बैंस ने कहा कि पंजाब के 19,125 सरकारी स्कूलों में करीब 2,638 करोड़ रुपये के विकास कार्य करवाए गए हैं। उन्होंने दावा किया कि भवनों, कमरों, शौचालयों, चारदीवारी और अन्य आवश्यक सुविधाओं में सुधार के लिए बड़े स्तर पर निवेश किया गया है। इसके अलावा उन्होंने बताया कि स्कूल शिक्षा क्षेत्र में आगे के सुधारों के लिए विश्व बैंक से करीब 1,000 करोड़ रुपये की अतिरिक्त मंजूरी भी ली गई है।
उन्होंने कहा कि सरकार का उद्देश्य केवल स्कूल भवनों को बेहतर बनाना नहीं है, बल्कि विद्यार्थियों को ऐसा शैक्षणिक वातावरण उपलब्ध कराना है जिसमें वे आधुनिक शिक्षा और प्रतिस्पर्धी परीक्षाओं दोनों के लिए तैयार हो सकें। इसी सोच के तहत ‘स्कूल ऑफ एमिनेंस’ योजना पर भी काम किया जा रहा है। इन स्कूलों में आधुनिक सुविधाओं, बेहतर प्रयोगशालाओं, डिजिटल संसाधनों और प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी के लिए अनुकूल माहौल तैयार करने पर जोर दिया जा रहा है।
बैंस ने लुधियाना स्थित शहीद सुखदेव थापर के नाम पर बने स्कूल ऑफ एमिनेंस का उदाहरण देते हुए कहा कि जिस संस्थान की पहले स्थिति उपेक्षित थी, उसके कायाकल्प पर करीब 18 करोड़ रुपये खर्च किए जा रहे हैं। उन्होंने यह भी बताया कि इस स्कूल के 17 विद्यार्थियों ने इस वर्ष NEET परीक्षा में सफलता हासिल की है। उनके अनुसार यह उपलब्धि इस बात का उदाहरण है कि सरकारी स्कूलों में बुनियादी ढांचे और शैक्षणिक संसाधनों में निवेश का असर विद्यार्थियों के परिणामों पर पड़ सकता है।
शिक्षा मंत्री ने कहा कि भगवंत सिंह मान के नेतृत्व वाली पंजाब सरकार का लक्ष्य सरकारी स्कूलों को उन परिवारों की पहली पसंद बनाना है, जो अपने बच्चों को बेहतर शिक्षा देना चाहते हैं। उन्होंने कहा कि सरकारी स्कूलों को केवल उन विद्यार्थियों के लिए विकल्प नहीं माना जाना चाहिए जो निजी स्कूल का खर्च नहीं उठा सकते, बल्कि यहां ऐसी शिक्षा उपलब्ध होनी चाहिए कि परिवार स्वेच्छा से अपने बच्चों का दाखिला सरकारी स्कूलों में कराएं।
उन्होंने शिक्षकों की कार्यप्रणाली और स्कूल प्रबंधन से जुड़े पुराने अनुभवों का भी उल्लेख किया। बैंस ने कहा कि पहले कई सरकारी स्कूलों के शिक्षकों और प्रमुखों को छोटी-बड़ी जरूरतों के लिए फंड की मांग को लेकर अधिकारियों के चक्कर लगाने पड़ते थे। उनके अनुसार अब स्कूलों को आवश्यक संसाधनों के लिए पर्याप्त फंड उपलब्ध कराने की व्यवस्था की गई है, जिससे शिक्षकों का समय प्रशासनिक प्रक्रियाओं में खर्च होने के बजाय विद्यार्थियों की पढ़ाई पर लगाया जा सके।
बैंस ने कहा कि शिक्षा सुधार कोई एक साल या एक कार्यकाल में पूरा होने वाली प्रक्रिया नहीं है। स्कूलों की बुनियादी सुविधाओं में सुधार के साथ-साथ शिक्षकों का प्रशिक्षण, बच्चों की सीखने की क्षमता का आकलन, प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी और आधुनिक तकनीक को पाठ्यक्रम का हिस्सा बनाना भी जरूरी है। इसी दिशा में पंजाब में पहली से 12वीं कक्षा तक आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस को मुख्य विषय के रूप में शुरू करने की पहल की गई है।
उन्होंने कहा कि आने वाले समय में विद्यार्थियों के लिए केवल पारंपरिक विषयों का ज्ञान पर्याप्त नहीं होगा। तकनीकी बदलाव के दौर में बच्चों को आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, डिजिटल तकनीक और आधुनिक कौशल की जानकारी देना जरूरी है। सरकार का प्रयास है कि सरकारी स्कूलों में पढ़ने वाले बच्चे भी भविष्य की नौकरियों और उच्च शिक्षा की बदलती जरूरतों के अनुरूप खुद को तैयार कर सकें।
हरजोत सिंह बैंस ने विधानसभा में कहा कि पंजाब की शिक्षा व्यवस्था में बदलाव की प्रक्रिया अभी खत्म नहीं हुई है। सरकार आने वाले वर्षों में और बड़े लक्ष्य तय करने की दिशा में आगे बढ़ रही है। उनके अनुसार NEET जैसी परीक्षाओं में सरकारी स्कूलों के विद्यार्थियों की बढ़ती सफलता, स्कूलों के बुनियादी ढांचे में निवेश, मिशन समर्थ जैसे कार्यक्रम और आधुनिक तकनीक को शिक्षा से जोड़ना इस बदलाव के अलग-अलग पहलू हैं।
उन्होंने कहा कि सरकार का अंतिम उद्देश्य यह है कि पंजाब के किसी भी बच्चे को केवल आर्थिक स्थिति के कारण गुणवत्तापूर्ण शिक्षा से वंचित न रहना पड़े। चाहे बच्चा सीमावर्ती गांव में रहता हो या किसी बड़े शहर में, उसे समान अवसर और बेहतर शैक्षणिक संसाधन उपलब्ध कराना सरकार की जिम्मेदारी है।
शिक्षा मंत्री के दावों के अनुसार पंजाब में सरकारी स्कूलों की तस्वीर बदलने की प्रक्रिया ने अब परिणाम देना शुरू कर दिया है। नीति आयोग के शिक्षा सूचकांक में राज्य की रैंकिंग से लेकर NEET में सफल होने वाले विद्यार्थियों की संख्या तक को उन्होंने इसी बदलाव का प्रमाण बताया। हालांकि इन दावों पर राजनीतिक बहस जारी रह सकती है, लेकिन सरकार का जोर अब इस बात पर है कि सरकारी शिक्षा व्यवस्था को बुनियादी सुविधाओं से आगे बढ़ाकर गुणवत्ता, तकनीक और प्रतियोगी शिक्षा के स्तर पर भी मजबूत बनाया जाए।
विधानसभा में शिक्षा को लेकर हुई इस चर्चा के बाद पंजाब सरकार ने यह संदेश देने की कोशिश की है कि सरकारी स्कूलों को मजबूत करना उसकी प्राथमिकताओं में शामिल है। आने वाले समय में इन योजनाओं के वास्तविक प्रभाव का आकलन विद्यार्थियों के सीखने के स्तर, बोर्ड परीक्षाओं के परिणाम, उच्च शिक्षा में प्रवेश और प्रतियोगी परीक्षाओं में सफलता जैसे मानकों से होगा। फिलहाल सरकार का दावा है कि पंजाब के सरकारी स्कूल अब केवल बुनियादी शिक्षा के केंद्र नहीं रह गए हैं, बल्कि वे उच्च शिक्षा और राष्ट्रीय स्तर की प्रतियोगी परीक्षाओं के लिए विद्यार्थियों को तैयार करने की दिशा में भी तेजी से आगे बढ़ रहे हैं।




