अम्बाला की जमीन पर अपनी ही सरकार से भिड़े अनिल विज, बोले- जनता के हक की लड़ाई में सबसे आगे खड़ा मिलूंगा

अम्बाला की जमीन पर अपनी ही सरकार से भिड़े अनिल विज, बोले- जनता के हक की लड़ाई में सबसे आगे खड़ा मिलूंगा

चंडीगढ़/अम्बाला। हरियाणा की सियासत में एक बार फिर कैबिनेट मंत्री अनिल विज के बगावती तेवर चर्चा में हैं। अम्बाला छावनी की प्रस्तावित फ्री होल्ड लैंड पॉलिसी को लेकर विज ने अपनी ही सरकार के सामने कड़ा रुख अपनाते हुए साफ कर दिया है कि यदि नीति को जनभावनाओं के अनुरूप नहीं बदला गया और इसके खिलाफ लोगों को आंदोलन का रास्ता अपनाना पड़ा, तो वह सरकार के साथ खड़े होने के बजाय अम्बाला छावनी की जनता के साथ दिखाई देंगे। विज ने यहां तक कहा कि जरूरत पड़ी तो वह खुद धरने, प्रदर्शन और आंदोलन में जनता के साथ बैठेंगे।

भाजपा कार्यकर्ताओं और अम्बाला छावनी के स्थानीय नागरिकों की बड़ी पंचायत में बोलते हुए अनिल विज ने कहा कि उनकी पहली कोशिश आगामी कैबिनेट बैठक में इस नीति में जरूरी बदलाव करवाने की होगी। उनका कहना था कि वह चाहते हैं कि प्रस्तावित नीति ऐसी हो जिससे लंबे समय से जमीन और संपत्ति से जुड़े अधिकारों को लेकर परेशान लोगों को राहत मिल सके। यदि सरकार उनकी आपत्तियों और जनता की मांगों पर विचार नहीं करती तो इसके बाद कानूनी रास्ता अपनाने के साथ-साथ जनआंदोलन खड़ा करने से भी पीछे नहीं हटेंगे।

विज ने बताया कि अम्बाला छावनी के लिए प्रस्तावित फ्री होल्ड पॉलिसी को हाल ही में कैबिनेट की बैठक में मंजूरी के लिए लाया गया था। उनके मुताबिक जब अधिकारियों ने एजेंडा पढ़ना शुरू किया और प्रस्ताव को स्वीकृति देने की प्रक्रिया आगे बढ़ाई तो उन्होंने इसका विरोध किया। विज का कहना था कि अम्बाला छावनी से वह सात बार विधायक रह चुके हैं और क्षेत्र की जमीन, संपत्ति तथा लोगों से जुड़े मुद्दों को लंबे समय से देखते आए हैं, इसके बावजूद इतनी महत्वपूर्ण नीति तैयार करते समय उनसे कोई सलाह नहीं ली गई।

उन्होंने कहा कि कैबिनेट बैठक में उन्होंने मुख्यमंत्री नायब सिंह सैनी के सामने यह सवाल रखा कि अम्बाला छावनी के लिए इतनी अहम लैंड पॉलिसी बनाई जा रही है, लेकिन क्षेत्र के निर्वाचित प्रतिनिधि से एक बार भी राय नहीं ली गई। विज के अनुसार उन्होंने स्पष्ट कहा कि नीति को जल्दबाजी में मंजूर करने के बजाय पहले इस पर विस्तृत चर्चा होनी चाहिए। उन्होंने सुझाव दिया कि इस विषय पर अलग बैठक बुलाई जाए, जिसमें नीति तैयार करने वाले अधिकारियों के अलावा अम्बाला छावनी के सभी संबंधित पक्षों को शामिल किया जाए और उनकी बात सुनने के बाद अंतिम फैसला लिया जाए।

विज के मुताबिक उनके विरोध के बाद कैबिनेट में इस एजेंडे को तत्काल आगे बढ़ाने के बजाय डेफर कर दिया गया। उन्होंने दावा किया कि यदि उस समय प्रस्ताव को मंजूरी मिल जाती तो अम्बाला छावनी के हजारों परिवारों के सामने गंभीर आर्थिक और कानूनी परेशानियां खड़ी हो सकती थीं। उनका कहना था कि उनका विरोध किसी व्यक्तिगत या राजनीतिक स्वार्थ के लिए नहीं है, बल्कि वह इस बात को लेकर चिंतित हैं कि नई व्यवस्था का असर आम नागरिकों की संपत्ति और उनके अधिकारों पर किस तरह पड़ेगा।

अनिल विज ने यह भी स्पष्ट किया कि फ्री होल्ड पॉलिसी को केवल अम्बाला छावनी के सदर क्षेत्र तक सीमित करके नहीं देखा जाना चाहिए। उनके अनुसार इसका प्रभाव पूरे अम्बाला छावनी क्षेत्र पर पड़ सकता है। उन्होंने लोगों से अपील की कि वे इस मामले को समझें और किसी भी तरह की गलतफहमी या भ्रम का शिकार न हों। विज ने कहा कि वह अम्बाला छावनी के इतिहास, यहां की भूमि व्यवस्था और प्रशासनिक परिस्थितियों से भली-भांति परिचित हैं और इसी अनुभव के आधार पर उन्होंने प्रस्तावित नीति के कई प्रावधानों पर सवाल उठाए हैं।

विज ने अम्बाला छावनी की भूमि व्यवस्था के पुराने इतिहास का उल्लेख करते हुए कहा कि 5 फरवरी 1977 तक पूरा क्षेत्र कैंटोनमेंट बोर्ड के अधीन था। उस समय तत्कालीन रक्षा मंत्री बंसीलाल के कार्यकाल में लगभग 1063 एकड़ भूमि को कैंटोनमेंट बोर्ड से अलग कर नगर पालिका क्षेत्र में शामिल किया गया था। इस व्यवस्था के तहत भारत सरकार की भूमि का स्वामित्व हरियाणा सरकार को दिए जाने की बात थी, लेकिन इसके बदले सेना की पसंद की लगभग 150 एकड़ जमीन नि:शुल्क उपलब्ध कराने की शर्त रखी गई थी।

विज के अनुसार यह प्रक्रिया लंबे समय तक पूरी नहीं हो सकी और वर्ष 2000 तक किसी सरकार ने इस दिशा में प्रभावी कदम नहीं उठाया। बाद में उनके प्रयासों से सेना को 150 एकड़ जमीन उपलब्ध कराई गई और इस तरह समझौते में निर्धारित शर्त को पूरा किया गया। उनका कहना है कि इसके बावजूद अम्बाला छावनी में जमीन और संपत्ति से संबंधित विवाद पूरी तरह खत्म नहीं हुए और समय के साथ लोगों की परेशानियां बढ़ती गईं।

विज ने बताया कि एक समय तक अम्बाला छावनी में संपत्तियों की सामान्य रूप से रजिस्ट्री होती थी, लेकिन बाद में दस्तावेजों में यह उल्लेख किया जाने लगा कि केवल भवन या निर्माण की रजिस्ट्री होगी, जमीन की नहीं, क्योंकि भूमि का मालिकाना हक सरकार के पास है। उनके अनुसार यहीं से आम लोगों के लिए नई समस्याएं शुरू हुईं। जमीन के स्वामित्व को लेकर अस्पष्टता के कारण बैंक संपत्तियों पर ऋण देने से पीछे हटने लगे और कई लोगों के लिए अपनी संपत्ति का आर्थिक उपयोग करना मुश्किल हो गया।

उन्होंने दावा किया कि संपत्तियों के नक्शे पास कराने, जमीन के विभाजन, उत्तराधिकार से जुड़े मामलों और अन्य प्रक्रियाओं में भी लोगों को परेशानियों का सामना करना पड़ा। विज के मुताबिक इससे केवल मकान मालिक प्रभावित नहीं हुए, बल्कि व्यापारिक गतिविधियों और स्थानीय निवेश पर भी इसका असर पड़ा। उनका कहना था कि दशकों से जिन संपत्तियों में परिवार रह रहे हैं, कारोबार कर रहे हैं और जिन पर उनकी आर्थिक निर्भरता है, उनके अधिकारों को लेकर किसी भी नई व्यवस्था को बेहद सावधानी से लागू किया जाना चाहिए।

अनिल विज ने बताया कि जमीन पर कब्जे से जुड़े एक मामले की सुनवाई के दौरान पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट ने सरकार को अम्बाला छावनी के लिए स्पष्ट लैंड या फ्री होल्ड पॉलिसी तैयार करने की दिशा में कदम उठाने को कहा था। इसके बाद मुख्य सचिव की ओर से अदालत में नई नीति तैयार करने का भरोसा दिया गया। विज के अनुसार इसी प्रक्रिया के तहत अब प्रस्तावित फ्री होल्ड पॉलिसी सामने आई है, लेकिन उन्होंने इसके कुछ प्रावधानों को लेकर गंभीर आपत्ति जताई है।

विज का कहना है कि उन्होंने वकीलों के साथ बैठकर प्रस्तावित नीति का अध्ययन किया और इसमें ऐसे कई प्रावधान पाए, जिनका सीधा असर आम संपत्ति मालिकों पर पड़ सकता है। उनके अनुसार प्रस्तावित व्यवस्था में जमीन को फ्री होल्ड कराने के लिए कलेक्टर रेट के आधार पर भुगतान करना होगा। इसके अलावा आवेदन के समय ही कुल राशि का 25 प्रतिशत जमा कराने और बाकी रकम एक वर्ष के भीतर चुकाने की शर्त बताई गई है।

विज ने इस व्यवस्था के उस प्रावधान पर भी सवाल उठाया, जिसके तहत तय समय में भुगतान नहीं होने की स्थिति में संपत्ति को सील कर सरकार अपने कब्जे में ले सकती है और बाद में उसे किसी अन्य व्यक्ति को बेचने का अधिकार भी सरकार के पास हो सकता है। उन्होंने कहा कि इस तरह की शर्तें उन परिवारों के लिए बेहद मुश्किल पैदा कर सकती हैं, जो लंबे समय से अपनी संपत्तियों में रह रहे हैं लेकिन अचानक करोड़ों रुपये का भुगतान करने की स्थिति में नहीं हैं।

उन्होंने पुराने दस्तावेजों को लेकर भी सवाल खड़े किए। विज ने कहा कि अम्बाला छावनी में कई संपत्तियां और परिवार डेढ़ सौ साल से भी अधिक पुराने इतिहास से जुड़े हुए हैं। ऐसे में यह उम्मीद करना कि हर परिवार के पास उस दौर के मूल दस्तावेज सुरक्षित होंगे, व्यावहारिक नहीं है। यदि मूल दस्तावेज उपलब्ध न होने को फ्री होल्ड का आधार बनाया जाता है तो बड़ी संख्या में लोग अपने वैध अधिकारों से वंचित हो सकते हैं।

विज ने उदाहरण देते हुए कहा कि यदि किसी व्यक्ति के पास 1000 गज जमीन है और उसका कलेक्टर रेट 60 हजार रुपये प्रति गज है तो जमीन को फ्री होल्ड कराने के लिए उसे करोड़ों रुपये की राशि का भुगतान करना पड़ सकता है। उन्होंने सवाल उठाया कि सामान्य मध्यमवर्गीय या निम्न आय वाले परिवार इतनी बड़ी रकम कहां से जुटाएंगे। उनके अनुसार ऐसी स्थिति में फ्री होल्ड पॉलिसी राहत देने के बजाय लोगों पर आर्थिक बोझ डालने वाली साबित हो सकती है।

कैबिनेट मंत्री ने कहा कि वह चाहते हैं कि सरकार इस नीति को अम्बाला छावनी के लोगों की वास्तविक परिस्थितियों को ध्यान में रखकर दोबारा देखे। उनके मुताबिक नीति का उद्देश्य लोगों की समस्याओं का समाधान करना होना चाहिए, न कि नई परेशानियां पैदा करना। उन्होंने संकेत दिया कि वह कैबिनेट की अगली बैठक में भी इस मुद्दे को मजबूती से उठाएंगे और सरकार के सामने अपनी आपत्तियां रखेंगे।

विज ने स्थानीय लोगों से भी कहा कि यदि बातचीत और सरकार के स्तर पर प्रयासों से समाधान नहीं निकलता तो उन्हें संगठित होकर आगे की रणनीति तैयार करनी होगी। उन्होंने संघर्ष समिति बनाने की बात कही, जो एक ओर कानूनी लड़ाई लड़ सके और दूसरी ओर जरूरत पड़ने पर लोगों को एकजुट कर सके। उनका कहना था कि यह लड़ाई किसी राजनीतिक दल की नहीं, बल्कि संपत्ति के अधिकार और आम नागरिकों के हितों से जुड़ी है।

सबसे महत्वपूर्ण बात यह रही कि विज ने खुले तौर पर कहा कि यदि जनता को अपने अधिकारों के लिए सरकार के खिलाफ आंदोलन करना पड़ा तो वह जनता के साथ खड़े होंगे। उन्होंने स्पष्ट किया कि उनके लिए अम्बाला छावनी के लोगों के हित सर्वोपरि हैं। जरूरत पड़ी तो धरना, प्रदर्शन, रैली और अन्य लोकतांत्रिक तरीकों से संघर्ष किया जाएगा और वह खुद इस लड़ाई में लोगों के साथ मौजूद रहेंगे।

अनिल विज के इस बयान को हरियाणा की राजनीति में महत्वपूर्ण माना जा रहा है, क्योंकि वह खुद राज्य सरकार के वरिष्ठ कैबिनेट मंत्री हैं। ऐसे में अपनी ही सरकार की प्रस्तावित नीति पर इस तरह खुलकर असहमति जताना राजनीतिक और प्रशासनिक दोनों स्तरों पर चर्चा का विषय बन गया है। विज पहले भी कई मुद्दों पर अपनी बेबाक राय के लिए जाने जाते रहे हैं, लेकिन इस बार मामला सीधे उनके राजनीतिक गढ़ अम्बाला छावनी की जमीन और संपत्ति से जुड़ा है।

अब सबसे ज्यादा नजर सरकार की अगली कैबिनेट बैठक पर है। यदि सरकार विज की आपत्तियों को स्वीकार करते हुए प्रस्तावित नीति में बदलाव करती है तो इससे अम्बाला छावनी के लोगों को राहत मिलने की उम्मीद है। वहीं यदि मौजूदा प्रावधानों को लेकर सरकार और विज के बीच मतभेद बरकरार रहते हैं तो यह विवाद कैबिनेट की चर्चा से निकलकर अदालत और सड़क तक पहुंच सकता है।

फिलहाल अनिल विज ने जिस तरह जनता के साथ खड़े होने का ऐलान किया है, उससे अम्बाला छावनी की फ्री होल्ड पॉलिसी हरियाणा की राजनीति का एक अहम मुद्दा बनती दिखाई दे रही है। आने वाले दिनों में सरकार किस तरह इस मामले को संभालती है और क्या प्रस्तावित नीति में लोगों की आपत्तियों के अनुरूप बदलाव किए जाते हैं, इस पर सभी की निगाहें टिकी हैं।