करीब पांच साल बाद एनडीए सरकार का जिक्र, बादल परिवार की पार्टी के साथ फिर हाथ मिलाने की संभावना सबसे अधिक; गठबंधन की राह में किसान आंदोलन और कई पुराने मुद्दे बड़ी चुनौती
चंडीगढ़। पंजाब की राजनीति में विधानसभा चुनाव 2027 से पहले एक बार फिर शिरोमणि अकाली दल (बादल) और भारतीय जनता पार्टी के बीच गठबंधन की संभावनाओं को लेकर चर्चाएं तेज हो गई हैं। केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह के हालिया बयान में पंजाब में राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (एनडीए) की सरकार बनाने का जिक्र होने के बाद राजनीतिक गलियारों में नए समीकरणों पर चर्चा शुरू हो गई है। लगभग पांच साल बाद पंजाब के संदर्भ में एनडीए सरकार की बात सामने आने को दोनों दलों के भविष्य के रिश्तों के लिहाज से अहम माना जा रहा है।
एक समय था जब पंजाब में अकाली दल और भाजपा का गठबंधन राज्य की राजनीति का सबसे मजबूत समीकरण माना जाता था। दोनों दलों के नेता सरकार को एनडीए सरकार के रूप में पेश करते थे। हालांकि, किसान आंदोलन के दौरान वर्ष 2020 में कृषि कानूनों के विरोध के बीच अकाली दल ने भाजपा से अपना दशकों पुराना गठबंधन तोड़ दिया। इसके बाद दोनों पार्टियों ने अलग-अलग राजनीतिक राह पकड़ ली और पंजाब में अपने दम पर सरकार बनाने की रणनीति पर काम शुरू कर दिया।
अब अमित शाह के बयान के बाद सवाल उठ रहा है कि क्या भाजपा पंजाब में दोबारा अकाली दल (बादल) के साथ गठबंधन की राजनीति की ओर लौट सकती है या फिर पार्टी एनडीए का विस्तार करने के लिए दूसरे क्षेत्रीय दलों के साथ तालमेल की संभावनाएं तलाश रही है। हालांकि, अभी तक दोनों दलों के बीच गठबंधन को लेकर किसी औपचारिक समझौते की पुष्टि नहीं हुई है, लेकिन राजनीतिक चर्चाओं ने आगामी चुनाव से पहले इस मुद्दे को फिर से केंद्र में ला दिया है।
किन दलों के साथ गठबंधन की कितनी संभावना?
पंजाब में भाजपा के सामने सबसे बड़ी चुनौती ऐसा राजनीतिक सहयोगी तलाशने की है, जिसके साथ मिलकर वह ग्रामीण और शहरी दोनों क्षेत्रों में अपनी चुनावी स्थिति मजबूत कर सके। राज्य में विभिन्न दलों की राजनीतिक विचारधारा, नेतृत्व और चुनावी हितों को देखते हुए गठबंधन की संभावनाएं अलग-अलग नजर आती हैं।
आम आदमी पार्टी के साथ संभावना बेहद कम
आम आदमी पार्टी और भाजपा के बीच राजनीतिक टकराव लगातार बढ़ा है। पंजाब में मुख्यमंत्री भगवंत मान के नेतृत्व वाली सरकार और भाजपा के बीच विभिन्न मुद्दों पर आरोप-प्रत्यारोप होते रहे हैं। राष्ट्रीय स्तर पर भी आप नेतृत्व भाजपा की नीतियों की आलोचना करता रहा है, जबकि भाजपा लगातार आप के नेतृत्व और शासन व्यवस्था को निशाने पर रखती है। ऐसे में दोनों दलों के बीच चुनावी गठबंधन की संभावना फिलहाल बेहद कम दिखाई देती है।
कांग्रेस के साथ गठबंधन की गुंजाइश नहीं
भाजपा और कांग्रेस राष्ट्रीय राजनीति में एक-दूसरे के प्रमुख प्रतिद्वंद्वी हैं। भाजपा लंबे समय से कांग्रेस के खिलाफ राजनीतिक अभियान चलाती रही है। ऐसे में पंजाब में दोनों दलों के बीच गठबंधन की संभावना राजनीतिक परिस्थितियों के लिहाज से लगभग नगण्य है। दोनों पार्टियों के अलग-अलग चुनाव लड़ने और एक-दूसरे को चुनौती देने की संभावना ही अधिक है।
शिअद (अमृतसर) और शिअद वारिस पंजाब दे से दूरी
सिमरनजीत सिंह मान के नेतृत्व वाला शिरोमणि अकाली दल (अमृतसर) और सांसद अमृतपाल सिंह से जुड़ा शिरोमणि अकाली दल वारिस पंजाब दे भी भाजपा के संभावित सहयोगियों की सूची में मजबूत विकल्प नजर नहीं आते। दोनों पक्षों की राजनीतिक विचारधारा, पंजाब से जुड़े मुद्दों और कई राष्ट्रीय विषयों पर भाजपा से मतभेद रहे हैं। इन परिस्थितियों में इनके साथ चुनावी तालमेल की संभावना बेहद कम मानी जा रही है।
शिअद (पुनर सुरजीत) के साथ संभावना सीमित
शिरोमणि अकाली दल से अलग होकर बने शिअद (पुनर सुरजीत) के साथ भी भाजपा के संभावित तालमेल को लेकर चर्चा हो सकती है। इस दल के कुछ नेताओं के भाजपा नेताओं के साथ पुराने संपर्क रहे हैं, जिनके जरिए बातचीत का रास्ता खुल सकता है। हालांकि, केवल व्यक्तिगत संपर्कों के आधार पर गठबंधन की संभावना मजबूत नहीं मानी जा सकती।
इस दल की ओर से संकेत दिया गया है कि भाजपा के साथ किसी भी संभावित समझौते से पहले पंजाब से जुड़े महत्वपूर्ण मुद्दों पर स्पष्ट चर्चा जरूरी होगी। इनमें चंडीगढ़ को पंजाब को सौंपने और बंदी सिंहों की रिहाई जैसे विषय शामिल हैं। यदि इन मुद्दों पर सहमति नहीं बनती तो गठबंधन आगे बढ़ना मुश्किल हो सकता है। भाजपा के लिए इन शर्तों पर सहमति बनाना भी राजनीतिक रूप से चुनौतीपूर्ण होगा। इसलिए फिलहाल इस विकल्प की संभावना सीमित दिखाई देती है।
अकाली दल (बादल) के साथ गठबंधन की संभावना सबसे अधिक
सुखबीर सिंह बादल के नेतृत्व वाला शिरोमणि अकाली दल (बादल) भाजपा के लिए सबसे स्वाभाविक संभावित सहयोगी माना जा रहा है। दोनों दलों के बीच दशकों पुराने राजनीतिक संबंध, कार्यकर्ताओं का जमीनी नेटवर्क और चुनावी अनुभव इस संभावना को अन्य विकल्पों की तुलना में अधिक मजबूत बनाते हैं।
अकाली दल का प्रभाव पारंपरिक रूप से ग्रामीण क्षेत्रों और सिख मतदाताओं के बीच रहा है, जबकि भाजपा को शहरी क्षेत्रों और हिंदू मतदाताओं के बीच समर्थन मिलता रहा है। दोनों दलों के मतदाता आधार में इस अंतर ने अतीत में गठबंधन को चुनावी लाभ पहुंचाया था। हालांकि, किसान आंदोलन के बाद राजनीतिक परिस्थितियां बदल चुकी हैं और पुराने समीकरणों की वापसी अपने आप में आसान नहीं होगी।
जनसंघ के दौर से शुरू हुई गठबंधन की कहानी
अकाली दल और भाजपा के रिश्तों की जड़ें कई दशक पुरानी हैं। भाजपा के पूर्ववर्ती भारतीय जनसंघ के समय से ही दोनों दल पंजाब की राजनीति में अलग-अलग परिस्थितियों में एक-दूसरे के साथ आते रहे हैं। वर्ष 1967 और 1969 में अकाली दल ने जनसंघ के सहयोग से सरकार बनाने में भूमिका निभाई। वर्ष 1977 में जनता पार्टी के गठन के दौरान भी दोनों राजनीतिक धाराएं एक व्यापक राजनीतिक मंच पर साथ आईं।
हालांकि, अकाली दल और भाजपा के बीच औपचारिक चुनावी गठबंधन को वर्ष 1996 में निर्णायक रूप मिला। उस समय प्रकाश सिंह बादल और अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्व में दोनों दलों ने सीटों के बंटवारे पर सहमति बनाई। पंजाब विधानसभा की कुल 117 सीटों में से अकाली दल ने 94 और भाजपा ने 23 सीटों पर चुनाव लड़ने का समझौता किया।
लोकसभा चुनाव में भी दोनों दलों ने मिलकर चुनाव लड़ा। पंजाब की 13 लोकसभा सीटों में से अकाली दल 10 और भाजपा तीन सीटों पर उम्मीदवार उतारती थी। भाजपा को अमृतसर, गुरदासपुर और होशियारपुर जैसी सीटों पर चुनाव लड़ने का अवसर मिलता था, जबकि अकाली दल शेष सीटों पर अपना प्रभाव आजमाता था।
यह व्यवस्था दोनों दलों के लिए लंबे समय तक उपयोगी साबित हुई। सीटों के बंटवारे में एक-दूसरे के प्रभाव वाले क्षेत्रों को ध्यान में रखा जाता था, जिससे दोनों दलों को अपने-अपने पारंपरिक मतदाता वर्ग तक पहुंचने का अवसर मिलता था।
क्या था अकाली-भाजपा गठबंधन की सफलता का फॉर्मूला?
अकाली दल और भाजपा के गठबंधन की सबसे बड़ी ताकत उनके अलग-अलग सामाजिक और भौगोलिक आधार को माना जाता था। अकाली दल को ग्रामीण पंजाब, सिख मतदाताओं और किसान समुदाय के एक हिस्से में समर्थन मिलता था। दूसरी ओर, भाजपा का आधार मुख्य रूप से शहरी क्षेत्रों और हिंदू मतदाताओं के बीच मजबूत माना जाता था।
इस अंतर के कारण दोनों दल कई सीटों पर एक-दूसरे के मतदाताओं को जोड़ने में सफल रहते थे। गठबंधन के समर्थकों के लिए यह एक ऐसा चुनावी समीकरण था, जिसमें दोनों पार्टियां अपनी पहचान बनाए रखते हुए साझा राजनीतिक लाभ हासिल करती थीं।
वर्ष 2007 से 2017 तक अकाली दल-भाजपा गठबंधन ने लगातार दो विधानसभा चुनाव जीतकर पंजाब में सरकार बनाई। यह गठबंधन राज्य की सबसे लंबी और सफल चुनावी साझेदारियों में गिना गया। हालांकि, तीसरे कार्यकाल की कोशिश में वर्ष 2017 के विधानसभा चुनाव में गठबंधन को बड़ा झटका लगा। वर्ष 2020 में कृषि कानूनों को लेकर पैदा हुए विवाद ने दोनों दलों के रिश्तों को निर्णायक मोड़ पर पहुंचा दिया।
अकाली दल ने केंद्र सरकार में अपनी भागीदारी समाप्त की और भाजपा से अलग हो गया। इसके बाद वर्ष 2022 के विधानसभा चुनाव में दोनों दलों ने अलग-अलग चुनाव लड़ा। दोनों को इसका राजनीतिक नुकसान उठाना पड़ा। आम आदमी पार्टी ने 117 में से 92 सीटें जीतकर सरकार बनाई, जबकि अकाली दल और भाजपा अपनी पुरानी चुनावी स्थिति हासिल नहीं कर सके।
अलग होने के बाद दोनों दलों की स्थिति
गठबंधन टूटने के बाद भाजपा ने पंजाब में अपने संगठन का विस्तार करने और अकेले चुनाव लड़ने की रणनीति पर काम किया। पार्टी ने शहरी क्षेत्रों से आगे बढ़कर ग्रामीण इलाकों में भी अपना आधार बढ़ाने की कोशिश की। वहीं, अकाली दल ने अपने पारंपरिक मतदाता वर्ग के बीच समर्थन दोबारा हासिल करने का प्रयास किया।
वर्ष 2024 के लोकसभा चुनाव ने दोनों दलों के सामने नई राजनीतिक वास्तविकताएं रखीं। पंजाब में भाजपा और अकाली दल अलग-अलग चुनाव मैदान में उतरे, लेकिन दोनों ही लोकसभा में कोई सीट नहीं जीत सके। इसके बावजूद विधानसभा क्षेत्रों में मिले मतों के आधार पर भाजपा ने कुछ क्षेत्रों में अपनी स्थिति बेहतर होने का दावा किया, जबकि अकाली दल का प्रभाव पहले की तुलना में सीमित दिखाई दिया।
विधानसभा क्षेत्रवार मतों के विश्लेषण में भाजपा लगभग 23 सीटों पर आगे रही, जबकि अकाली दल करीब नौ सीटों पर बढ़त बनाने में सफल रहा। ये आंकड़े अपने आप में विधानसभा चुनाव के परिणाम की गारंटी नहीं हैं, लेकिन इनसे यह संकेत जरूर मिलता है कि दोनों दलों के अलग-अलग चुनाव लड़ने की स्थिति में उनके सामने चुनौतियां बनी हुई हैं।
इसी वजह से 2027 के विधानसभा चुनाव से पहले गठबंधन की चर्चा को राजनीतिक महत्व मिल रहा है। दोनों दलों के लिए यह आकलन जरूरी होगा कि अलग-अलग चुनाव लड़ने की स्थिति में उनकी जीत की कितनी संभावना है और साथ आने पर उन्हें कितना लाभ मिल सकता है।
गठबंधन की राह में किसान आंदोलन और पुराने मुद्दे चुनौती
अकाली दल और भाजपा के बीच गठबंधन की संभावनाएं भले ही बढ़ती दिखाई दे रही हों, लेकिन दोनों दलों के लिए साथ आना आसान नहीं होगा। किसान आंदोलन के दौरान गठबंधन टूटने से राजनीतिक और सामाजिक स्तर पर कई सवाल पैदा हुए थे। अकाली दल को अपने उस फैसले और किसान हितों से जुड़े रुख को लेकर मतदाताओं के सामने जवाब देना पड़ सकता है। वहीं, भाजपा को भी पंजाब में किसानों के बीच अपना विश्वास मजबूत करने की चुनौती का सामना करना होगा।
इसके अतिरिक्त चंडीगढ़, पंजाब के अधिकारों, कृषि नीतियों और बंदी सिंहों की रिहाई जैसे मुद्दे भी राजनीतिक बातचीत में अहम भूमिका निभा सकते हैं। अकाली दल के लिए इन विषयों पर अपना रुख स्पष्ट रखना जरूरी होगा, जबकि भाजपा को यह तय करना होगा कि वह क्षेत्रीय सहयोगी की मांगों के साथ किस हद तक आगे बढ़ सकती है।
दोनों दलों के बीच सीटों का बंटवारा भी महत्वपूर्ण मुद्दा रहेगा। वर्ष 1996 में तय हुआ 94-23 का फार्मूला मौजूदा राजनीतिक परिस्थितियों में जस का तस लागू करना आसान नहीं होगा। भाजपा अब पहले की तुलना में अधिक सीटों पर चुनाव लड़ने की आकांक्षा रख सकती है, जबकि अकाली दल अपने पारंपरिक प्रभाव और पुराने गठबंधन के आधार पर अधिक सीटों की मांग कर सकता है। ऐसे में सीटों का बंटवारा किसी भी संभावित समझौते की सबसे अहम शर्त बन सकता है।
2027 से पहले क्या होगा अगला कदम?
अमित शाह के बयान ने पंजाब में एनडीए सरकार को लेकर चर्चा जरूर तेज कर दी है, लेकिन इसे अकाली दल और भाजपा के बीच गठबंधन की औपचारिक घोषणा मानना जल्दबाजी होगी। फिलहाल दोनों दलों के सामने अपने संगठन को मजबूत करने, मतदाताओं के बीच समर्थन बढ़ाने और चुनावी रणनीति तैयार करने की चुनौती है।
राजनीतिक रूप से अकाली दल (बादल) भाजपा का सबसे संभावित सहयोगी दिखाई देता है, क्योंकि दोनों दलों के पास पुराना अनुभव, कार्यकर्ताओं का नेटवर्क और पहले सफल रह चुका सीट-बंटवारे का मॉडल है। इसके बावजूद किसान आंदोलन के बाद बदली परिस्थितियों, नेतृत्व की महत्वाकांक्षाओं और पंजाब से जुड़े मुद्दों पर सहमति बनाना जरूरी होगा।
आगामी महीनों में दोनों दलों के नेताओं के बयानों, संगठनात्मक गतिविधियों और संभावित बातचीत पर नजर रहेगी। यदि गठबंधन की दिशा में कोई ठोस पहल होती है तो पंजाब की चुनावी राजनीति में बड़ा बदलाव देखने को मिल सकता है। लेकिन यदि दोनों पार्टियां अकेले चुनाव लड़ने का फैसला करती हैं, तो उन्हें अपने-अपने दम पर ग्रामीण और शहरी मतदाताओं को साधने की चुनौती का सामना करना पड़ेगा।
फिलहाल इतना स्पष्ट है कि 2027 का चुनाव करीब आने के साथ पंजाब में गठबंधन की राजनीति फिर चर्चा में है। अब देखना यह होगा कि एनडीए सरकार का जिक्र केवल चुनावी संदेश तक सीमित रहता है या अकाली दल और भाजपा अपने पुराने रिश्तों को नए राजनीतिक समझौते में बदलने की दिशा में कदम बढ़ाते हैं।




