भाजपा के सांसद, राष्ट्रीय कार्यालय प्रभारी और गुजरात भाजपा प्रभारी तरुण चुग ने पंजाब की आम आदमी पार्टी सरकार पर शिक्षा व्यवस्था और सरकारी कर्मचारियों से जुड़े मुद्दों को लेकर तीखा हमला बोला है। उन्होंने भगवंत मान सरकार के ‘शिक्षा क्रांति’ के दावों पर सवाल उठाते हुए आरोप लगाया कि जमीनी स्तर पर सरकारी स्कूलों की स्थिति सरकार के प्रचार से बिल्कुल अलग नजर आ रही है।
चुग ने कहा कि राज्य सरकार की ओर से शिक्षा क्षेत्र में बड़े बदलाव के दावे किए जा रहे हैं, लेकिन स्कूलों में शिक्षकों और प्रिंसिपलों के बड़ी संख्या में पद खाली पड़े हैं। ऐसे में सरकार के शिक्षा मॉडल की वास्तविक स्थिति पर सवाल उठना स्वाभाविक है। उन्होंने कहा कि केवल विज्ञापनों और प्रचार अभियानों के जरिए शिक्षा व्यवस्था में सुधार का दावा नहीं किया जा सकता।
भाजपा नेता के अनुसार, पंजाब में 31,370 से अधिक शिक्षक पद रिक्त हैं। इसके अलावा करीब 1,150 सरकारी सीनियर सेकेंडरी स्कूल नियमित प्रिंसिपलों के बिना संचालित हो रहे हैं। उन्होंने कहा कि इतने बड़े पैमाने पर पदों का खाली होना विद्यार्थियों की पढ़ाई और स्कूलों के प्रशासनिक कामकाज दोनों को प्रभावित कर सकता है।
तरुण चुग ने फाजिल्का में सामने आई स्कूल व्यवस्था से जुड़ी तस्वीरों और घटनाओं का उल्लेख करते हुए कहा कि यदि विद्यार्थियों को खुले आसमान के नीचे पढ़ाई करने जैसी परिस्थितियों का सामना करना पड़ रहा है तो इसे किसी भी सूरत में आधुनिक शिक्षा व्यवस्था की मिसाल नहीं कहा जा सकता। उन्होंने कहा कि स्कूलों में सामने आ रही बुनियादी कमियां सरकार के दावों और वास्तविक स्थिति के बीच अंतर को उजागर करती हैं।
उन्होंने आरोप लगाया कि आम आदमी पार्टी सरकार शिक्षा के क्षेत्र में उपलब्धियों का प्रचार करने पर ज्यादा जोर दे रही है, जबकि स्कूलों में आवश्यक मानव संसाधन और बुनियादी सुविधाओं को मजबूत करने की जरूरत है। उन्होंने कहा कि बच्चों को बेहतर शिक्षा देने के लिए सबसे पहले स्कूलों में पर्याप्त शिक्षक होने चाहिए और संस्थानों का संचालन नियमित प्रिंसिपलों के माध्यम से किया जाना चाहिए।
चुग ने कहा कि शिक्षा व्यवस्था की स्थिति के साथ-साथ सरकारी कर्मचारियों और पेंशनर्स के लंबित महंगाई भत्ते का मुद्दा भी गंभीर है। उनके मुताबिक, कर्मचारी लंबे समय से अपने लंबित DA की मांग कर रहे हैं और अब उन्हें अपने अधिकारों के लिए आंदोलन का रास्ता अपनाना पड़ रहा है।
उन्होंने दावा किया कि 27 अगस्त को करीब चार लाख सरकारी कर्मचारी और लगभग 3.5 लाख पेंशनर्स लंबित DA के मुद्दे को लेकर सामूहिक अवकाश पर जाने की तैयारी में हैं। कर्मचारियों की ओर से 18 प्रतिशत लंबित महंगाई भत्ता जारी करने की मांग की जा रही है। चुग ने कहा कि इतने बड़े वर्ग के कर्मचारियों और पेंशनर्स की ओर से उठाया जा रहा मुद्दा सरकार के लिए गंभीरता से विचार करने का विषय होना चाहिए।
भाजपा नेता ने कहा कि सरकारी कर्मचारियों ने राज्य के प्रशासनिक ढांचे को चलाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। ऐसे में उनके लंबित वित्तीय अधिकारों को लेकर सरकार को स्पष्ट नीति और समयबद्ध समाधान सामने रखना चाहिए। उन्होंने कहा कि कर्मचारियों और पेंशनर्स को लगातार आंदोलन के लिए मजबूर करना शासन व्यवस्था की अच्छी तस्वीर पेश नहीं करता।
तरुण चुग ने भगवंत मान सरकार से सवाल किया कि यदि राज्य सरकार शिक्षा क्षेत्र में बड़े बदलाव की बात करती है तो हजारों शिक्षक पद अब तक क्यों खाली हैं। उन्होंने यह भी पूछा कि बड़ी संख्या में सरकारी सीनियर सेकेंडरी स्कूलों को नियमित प्रिंसिपल के बिना चलाने की स्थिति क्यों बनी हुई है। उन्होंने कहा कि सरकार को इन सवालों का जवाब आंकड़ों और जमीनी कार्रवाई के साथ देना चाहिए।
उन्होंने कहा कि पंजाब के सरकारी स्कूलों में पढ़ने वाले विद्यार्थियों का भविष्य राज्य की शिक्षा व्यवस्था की गुणवत्ता पर निर्भर करता है। ग्रामीण और आर्थिक रूप से कमजोर परिवारों के बच्चे सरकारी स्कूलों पर अधिक निर्भर रहते हैं। ऐसे में यदि स्कूलों में पर्याप्त शिक्षक और नेतृत्व व्यवस्था नहीं होगी तो इसका सीधा असर विद्यार्थियों की शिक्षा और उनके भविष्य के अवसरों पर पड़ सकता है।
चुग ने कहा कि शिक्षा किसी भी राज्य के विकास की बुनियाद होती है। यदि सरकार वास्तव में शिक्षा के क्षेत्र में बदलाव लाना चाहती है तो उसे स्कूलों में रिक्त पद भरने, शिक्षकों को आवश्यक संसाधन उपलब्ध कराने, प्रिंसिपलों की नियुक्ति करने और बुनियादी सुविधाओं को बेहतर बनाने पर ध्यान केंद्रित करना चाहिए।
उन्होंने पंजाब सरकार के प्रचार खर्च को लेकर भी सवाल उठाए। उनका आरोप था कि सरकार को करोड़ों रुपये प्रचार अभियानों पर खर्च करने के बजाय उपलब्ध संसाधनों का इस्तेमाल स्कूलों की जरूरतें पूरी करने और कर्मचारियों के लंबित भुगतान के लिए करना चाहिए। उन्होंने कहा कि जनता को विज्ञापनों में दिखाई जाने वाली तस्वीर से अधिक महत्व स्कूलों और सरकारी संस्थानों में दिखाई देने वाले वास्तविक बदलाव का है।
भाजपा सांसद ने कहा कि सरकार की प्राथमिकता यह होनी चाहिए कि पंजाब के प्रत्येक सरकारी स्कूल में पर्याप्त संख्या में शिक्षक उपलब्ध हों। स्कूलों का संचालन योग्य और नियमित प्रिंसिपलों के माध्यम से हो तथा विद्यार्थियों को पढ़ाई के लिए उचित वातावरण मिले। उन्होंने कहा कि किसी भी शिक्षा नीति की सफलता का आकलन विज्ञापन देखकर नहीं, बल्कि कक्षाओं में मौजूद विद्यार्थियों और शिक्षकों की स्थिति देखकर किया जाना चाहिए।
उन्होंने कर्मचारियों और पेंशनर्स के मुद्दे पर भी सरकार को तत्काल कदम उठाने की मांग की। चुग ने कहा कि लंबे समय से लंबित DA को लेकर कर्मचारियों में असंतोष बढ़ रहा है। यदि सरकार के पास कर्मचारियों की मांग को लेकर कोई वित्तीय या प्रशासनिक बाधा है तो उसे सार्वजनिक रूप से स्पष्ट किया जाना चाहिए और समाधान के लिए ठोस समयसीमा बताई जानी चाहिए।
तरुण चुग ने कहा कि पंजाब की जनता अब सरकार के दावों और वास्तविक परिस्थितियों की तुलना खुद कर रही है। उनके अनुसार, एक तरफ ‘शिक्षा क्रांति’ की बात की जा रही है, जबकि दूसरी तरफ हजारों शिक्षक पद रिक्त हैं और बड़ी संख्या में स्कूल नियमित प्रिंसिपलों के बिना चल रहे हैं। इसी तरह सरकारी कर्मचारी और पेंशनर्स अपने लंबित DA के लिए संघर्ष कर रहे हैं।
उन्होंने कहा कि सरकार को राजनीतिक प्रचार से आगे बढ़कर प्रशासनिक जवाबदेही पर ध्यान देना चाहिए। शिक्षा व्यवस्था को मजबूत करने और कर्मचारियों की समस्याओं का समाधान करने के लिए घोषणाओं के बजाय जमीन पर काम दिखाई देना चाहिए।
चुग ने कहा कि पंजाब को इस समय बड़े-बड़े विज्ञापनों की नहीं, बल्कि कक्षाओं में शिक्षकों की जरूरत है। स्कूलों को नियमित प्रिंसिपलों की आवश्यकता है और सरकारी कर्मचारियों तथा पेंशनर्स को उनके लंबित वित्तीय अधिकार मिलने चाहिए। उन्होंने कहा कि सरकार यदि इन बुनियादी मुद्दों पर गंभीरता से कार्रवाई करती है तो इससे राज्य की शिक्षा व्यवस्था और प्रशासन दोनों को मजबूती मिलेगी।
भाजपा नेता ने अंत में कहा कि भगवंत मान सरकार को अब अपने दावों की समीक्षा करते हुए शिक्षा और कर्मचारी कल्याण से जुड़े मुद्दों पर ठोस कदम उठाने चाहिए। उन्होंने कहा कि पंजाब की जनता को प्रचार और दावों से अधिक स्कूलों, सरकारी कार्यालयों और कर्मचारियों की वास्तविक स्थिति में सुधार चाहिए। उनके मुताबिक, सरकार की कार्यप्रणाली का असली मूल्यांकन इसी आधार पर होगा कि वह इन समस्याओं का समाधान कितनी जल्दी और कितनी प्रभावी तरीके से करती है।




