पंजाब में नशे के मुद्दे को लेकर राजनीतिक बहस एक बार फिर तेज हो गई है। केंद्र सरकार की ओर से राज्य के छह जिलों—अमृतसर, गुरदासपुर, तरनतारन, फिरोजपुर, फाजिल्का और लुधियाना—को ‘अल्ट्रा सेंसिटिव’ ड्रग जोन की श्रेणी में शामिल किए जाने के बाद कांग्रेस ने आम आदमी पार्टी सरकार के साथ-साथ केंद्र की भाजपा सरकार पर भी सवाल उठाए हैं। पंजाब कांग्रेस प्रभारी सचिन पायलट ने कहा कि छह जिलों का देश के अति संवेदनशील ड्रग जोन में शामिल होना पंजाब में नशे की स्थिति की गंभीरता को दर्शाता है। उन्होंने कहा कि इस समस्या का समाधान केवल राजनीतिक बयानबाजी और एक-दूसरे पर आरोप लगाने से नहीं होगा, बल्कि नशे की पूरी सप्लाई चेन और उसके पीछे काम कर रहे नेटवर्क पर प्रभावी कार्रवाई करनी होगी।
केंद्र सरकार ने देशभर में नशे की तस्करी और उससे जुड़े जोखिम के आधार पर कुल 73 जिलों को ‘अल्ट्रा सेंसिटिव’ और 274 जिलों को ‘सेंसिटिव’ श्रेणी में चिन्हित किया है। पंजाब के छह जिलों के अति संवेदनशील श्रेणी में आने के बाद राज्य में नशे को लेकर चल रही राजनीतिक बहस को नया मुद्दा मिल गया है। कांग्रेस का कहना है कि इन जिलों की सूची यह सवाल खड़ा करती है कि पिछले कई वर्षों से नशे के खिलाफ चलाए जा रहे अभियानों के बावजूद समस्या पर पूरी तरह नियंत्रण क्यों नहीं पाया जा सका।
सत्ता में आने से पहले तीन महीने में नशामुक्ति का वादा
सचिन पायलट ने आम आदमी पार्टी सरकार के पुराने चुनावी वादों का जिक्र करते हुए कहा कि वर्ष 2022 के विधानसभा चुनाव से पहले आप ने पंजाब को तीन महीने के भीतर नशामुक्त करने का दावा किया था। सत्ता में आने के बाद सरकार ने नशे के खिलाफ कई अभियान चलाने और कार्रवाई करने की बात कही, लेकिन कांग्रेस के अनुसार प्रदेश के कई हिस्सों में नशे की समस्या अभी भी गंभीर बनी हुई है।
पायलट ने कहा कि सरकार के दावों और जमीनी स्तर पर सामने आ रही स्थिति के बीच अंतर को लेकर जवाबदेही तय होनी चाहिए। उनका कहना है कि अगर राज्य के छह जिले आज भी ‘अल्ट्रा सेंसिटिव’ श्रेणी में हैं, तो यह केवल प्रशासन के लिए ही नहीं, बल्कि राजनीतिक नेतृत्व के लिए भी गंभीर चिंता का विषय होना चाहिए।
उन्होंने कहा कि नशे की समस्या को केवल पुलिस कार्रवाई तक सीमित करके नहीं देखा जा सकता। इसके साथ युवाओं के स्वास्थ्य, रोजगार, शिक्षा, परिवारों की सामाजिक स्थिति और राज्य की कानून-व्यवस्था भी जुड़ी हुई है। इसलिए नशे के खिलाफ अभियान में पुलिस और प्रशासन के साथ सामाजिक संगठनों, शिक्षण संस्थानों और आम लोगों की भागीदारी भी जरूरी है।
भाजपा की नशा विरोधी यात्राओं पर भी निशाना
कांग्रेस प्रभारी ने भाजपा की ओर से पंजाब में निकाली जा रही ‘नशा मुक्त पंजाब यात्राओं’ को लेकर भी सवाल उठाए। भाजपा की ओर से 18 सितंबर से चार अलग-अलग यात्राएं शुरू की जा रही हैं। इन यात्राओं को राज्य के अलग-अलग हिस्सों से शुरू कर 30 सितंबर को जालंधर में समाप्त करने की योजना है। भाजपा के अनुसार इन यात्राओं के जरिए प्रदेश के सभी 117 विधानसभा क्षेत्रों को कवर किया जाएगा।
पायलट ने कहा कि नशे के खिलाफ जागरूकता अभियान चलाना अपनी जगह जरूरी है, लेकिन केवल यात्राएं निकालने से समस्या का समाधान नहीं होगा। उन्होंने कहा कि राजनीतिक दलों को नशे के खिलाफ लड़ाई को चुनावी गतिविधि या राजनीतिक प्रचार तक सीमित रखने के बजाय समस्या के स्थायी समाधान पर ध्यान देना चाहिए।
उन्होंने भाजपा से यह भी सवाल किया कि केंद्र सरकार के पास देशभर में नशे की तस्करी और बड़े ड्रग कंसाइनमेंट पर कार्रवाई करने के लिए केंद्रीय एजेंसियां और संसाधन हैं। ऐसे में पंजाब के साथ-साथ देश में नशे की सप्लाई को नियंत्रित करने के लिए अब तक क्या प्रभावी कदम उठाए गए हैं, इसका भी जवाब दिया जाना चाहिए।
‘आरोप-प्रत्यारोप से नहीं निकलेगा समाधान’
पायलट ने कहा कि नशे के मुद्दे पर पंजाब सरकार और केंद्र सरकार को एक-दूसरे पर जिम्मेदारी डालने के बजाय मिलकर काम करना होगा। उन्होंने कहा कि पंजाब में नशे की समस्या की वास्तविक चुनौती केवल नशे का सेवन करने वालों तक सीमित नहीं है, बल्कि इसके पीछे मौजूद तस्करी के नेटवर्क और सप्लाई चेन को खत्म करना ज्यादा महत्वपूर्ण है।
उन्होंने सवाल उठाया कि यदि नशे के खिलाफ लगातार अभियान चलाए जा रहे हैं और गिरफ्तारियां हो रही हैं, तो इसके बावजूद नशे की सप्लाई कई इलाकों में किस तरह जारी है। उनके अनुसार कार्रवाई का फोकस केवल छोटे स्तर के मामलों तक सीमित नहीं रहना चाहिए, बल्कि उन लोगों तक पहुंचना जरूरी है जो नशे की तस्करी के बड़े नेटवर्क को संचालित करते हैं।
कांग्रेस प्रभारी ने कहा कि नशे के खिलाफ कार्रवाई में सप्लाई नेटवर्क, वित्तीय लेन-देन, तस्करी के रास्तों और बड़े स्तर पर जुड़े लोगों की पहचान करना महत्वपूर्ण है। इसके लिए केंद्र और राज्य की एजेंसियों के बीच बेहतर तालमेल की जरूरत है।
सीमा से जुड़े जिलों पर विशेष ध्यान की जरूरत
पंजाब के जिन छह जिलों को ‘अल्ट्रा सेंसिटिव’ ड्रग जोन में शामिल किया गया है, उनमें अमृतसर, गुरदासपुर, तरनतारन, फिरोजपुर और फाजिल्का जैसे सीमावर्ती जिले भी शामिल हैं। इन जिलों को लेकर लंबे समय से नशे की तस्करी और सीमा पार से आने वाले नशीले पदार्थों को लेकर सुरक्षा एजेंसियां चिंता जताती रही हैं। वहीं लुधियाना जैसे औद्योगिक और बड़े शहरी जिले का इस सूची में शामिल होना भी नशे की समस्या के व्यापक स्वरूप की ओर संकेत करता है।
पायलट ने कहा कि पंजाब की भौगोलिक स्थिति को देखते हुए सीमा पार से होने वाली तस्करी पर नियंत्रण के लिए केंद्रीय एजेंसियों और राज्य पुलिस के बीच लगातार समन्वय जरूरी है। उन्होंने कहा कि केवल सीमा पर निगरानी बढ़ाने से काम पूरा नहीं होगा। राज्य के भीतर नशीले पदार्थों के वितरण और स्थानीय नेटवर्क पर भी समान रूप से कार्रवाई करनी होगी।
युवाओं और परिवारों पर पड़ रहा असर
सचिन पायलट ने कहा कि नशे की समस्या को केवल कानून-व्यवस्था के नजरिए से देखना पर्याप्त नहीं है। इसका सीधा असर पंजाब की युवा पीढ़ी पर पड़ रहा है। कई परिवार नशे के कारण सामाजिक और आर्थिक संकट का सामना कर रहे हैं। उन्होंने कहा कि नशे की गिरफ्त में आने वाले युवाओं के पुनर्वास और उन्हें मुख्यधारा में वापस लाने के लिए भी व्यापक स्तर पर प्रयास किए जाने चाहिए।
उन्होंने कहा कि नशामुक्ति के लिए उपचार और पुनर्वास व्यवस्था को मजबूत करना भी उतना ही जरूरी है जितना तस्करों के खिलाफ कार्रवाई करना। जो युवा नशे की लत से बाहर निकलना चाहते हैं, उन्हें चिकित्सा सहायता, परामर्श और रोजगार के अवसर उपलब्ध कराने की आवश्यकता है।
117 विधानसभा क्षेत्रों तक पहुंचेगा राजनीतिक अभियान
भाजपा की चार ‘नशा मुक्त पंजाब यात्राओं’ के जरिए सभी 117 विधानसभा क्षेत्रों तक पहुंचने की योजना ने नशे के मुद्दे को राजनीतिक तौर पर भी महत्वपूर्ण बना दिया है। पंजाब में आगामी विधानसभा चुनाव को देखते हुए विभिन्न राजनीतिक दल पहले से ही नशे को प्रमुख मुद्दे के रूप में उठा रहे हैं। ऐसे में कांग्रेस, भाजपा और आम आदमी पार्टी के बीच इस विषय को लेकर आरोप-प्रत्यारोप और तेज होने की संभावना है।
कांग्रेस की ओर से जहां राज्य सरकार की नीतियों और उपलब्धियों पर सवाल उठाए जा रहे हैं, वहीं भाजपा प्रदेश में नशे के खिलाफ अपने अभियान को लेकर जनता के बीच पहुंच बनाने की कोशिश कर रही है। दूसरी ओर आम आदमी पार्टी सरकार नशे के खिलाफ अपनी कार्रवाई और अभियानों को प्रमुखता से सामने रख रही है।
पायलट ने कहा कि राजनीतिक दलों के बीच मतभेद अपनी जगह हो सकते हैं, लेकिन नशे जैसे गंभीर सामाजिक मुद्दे पर सरकारों को साझा रणनीति के साथ आगे बढ़ना चाहिए। उन्होंने कहा कि केंद्र और राज्य के बीच बेहतर तालमेल से ही नशे की सप्लाई चेन पर प्रभावी प्रहार किया जा सकता है।
कार्रवाई का दायरा बड़े नेटवर्क तक बढ़ाने की मांग
पायलट ने कहा कि पंजाब को नशे से मुक्त करने के लिए सरकारों को यह सुनिश्चित करना होगा कि कार्रवाई केवल नशे की छोटी खेप पकड़े जाने या नशे के सेवन करने वालों की गिरफ्तारी तक सीमित न रहे। बड़े तस्करी नेटवर्क, उनके वित्तीय स्रोतों और नशीले पदार्थों की आपूर्ति से जुड़े पूरे तंत्र पर कार्रवाई की जानी चाहिए।
उन्होंने कहा कि छह जिलों की ‘अल्ट्रा सेंसिटिव’ सूची में शामिल होना सरकारों के लिए चेतावनी की तरह है। इस स्थिति को राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप से आगे बढ़कर गंभीर प्रशासनिक चुनौती के रूप में लिया जाना चाहिए।
पायलट ने कहा कि पंजाब के युवाओं और परिवारों को नशे से बचाने के लिए दीर्घकालिक नीति की जरूरत है। उनके मुताबिक नशे के खिलाफ लड़ाई में राजनीतिक बयानबाजी से ज्यादा महत्वपूर्ण परिणाम हैं और केंद्र तथा राज्य सरकारों को मिलकर ऐसे कदम उठाने चाहिए, जिनसे नशे की सप्लाई, तस्करी और खपत—तीनों पर प्रभावी नियंत्रण स्थापित हो सके।




